अधूरापन, पांच अक्षर वाला यह शब्द बहुत छोटा है,लेकिन उसकी परिपूर्णता के लिए जीवन की व्यथा से गुजर कर आज इस कथा को प्रस्तुत कर रही हूं ।

मैं कोई बड़ी लेखिका नहीं, साधारण सी घरेलू औरत हूं ,जिसके जीवन में पति और बच्चों के सिवा कुछ नहीं ऐसा समझती थी। मगर बचपन से ही कुछ तो पूर्ण नहीं है इसका एहसास था।क्या था वह????

यह जानने के लिए मुझे 40 साल लगे। जीवन के साधारण से रास्ते पर चलते चलते ,कंकड़ पत्थरों पर चलकर अध्यात्म के रास्ते पर चलना कोई आसान काम  नही।उसके लिए निस्वार्थ होना,अपने जीवन मे वैराग्य का होना,संसार से  त्याग करना भी जरूरी है।नियति ने मेरे लिए कुछ सच्चाई , कुछ रहस्य  रखे थे ।जिनको जानना और उस रास्ते पर अग्रसर होना ही मेरे जीवन का लक्ष्य था।

लेकिन इस रास्ते पर चलने से पूर्व मुझे ऐसे ऐसे कर्मों से गुजरना था ,जहां पर मुझे निस्वार्थ होकर धर्म का रास्ता चुनना था ,ऐसी विकट परिस्थितियां मेरे सामने आने वाली थी जिसका चयन मेरी अंतरात्मा को करना था ।तभी मैं अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर हो सकती थी।

तभी मुझे मां जगदंबे का अनुग्रह और मां स्वामी जी का मार्गदर्शन प्राप्त होने वाला था ।

यह सब जानने के लिए मेरे अतीत के पन्नों को भी जानना जरूरी है। इसलिए यह कथा लिख रही हूं ।बचपन साधारण सा था। लेकिन पता नहीं क्यों बार-बार ऐसी  जिंदगी जीने के लिए मैंने जन्म नहीं लिया ऐसे सोचती थी ।मां बाप का प्यार ,भाई बहन से लड़ना ,फिर एक होकर खेलना, सब कुछ अच्छा था। फिर भी मैं आत्महत्या की प्रवृत्ति रखती थी ।

क्या कहूं? किससे कहूं ?मैं खुद नहीं जानती थी कि मैं क्या चाहती हूं ?सब कुछ होते हुए भी यह अधूरापन क्यों? जिंदगी नीरज सी थी ।

18 साल की उम्र में ही शादी हो चुकी थी। शादी के बारे में, सांसारिक जीवन से बिल्कुल अंजान थी। खाना बनाना, घर संभालना  पति से कैसे व्यवहार करना है ?कुछ भी नहीं जानती थी।

कोरे कागज की तरह अपने पति के साथ चल पड़ी। शादी के दूसरे दिन ही पति ने कहा, कि मैं किसी और से शादी करना चाहता था  जो नौकरी करती हो,लेकिन घर वालों के खिलाफ जाना नहीं चाहता था, इसलिए मैंने तुमसे मजबूरी में शादी की। यह सुनकर मुझे पत्नी का दर्जा कम और पति पर अपना बोझ ज्यादा लगने लगा ।

पापा के मौत के बाद, मा ने जैसे कहा, वैसे ही ,हम दोनों बहनों ने किया।

मां पर बोझ नहीं बनना चाहती थी इसलिए शादी के लिए हां कही थी ।अब  मां का बोझ हल्का करके अपने पति का बोझ बन चुकी थी ।शादी तो विश्वास पर टिकी होती है ,लेकिन यहां विश्वास कम और बोझ बहुत ज्यादा था ।

पति एक अच्छी कंपनी में नौकरी करते हैं। नदी के किनारे बसा यह गांव ,पहाड़ों के बीच ,सृष्टि सौंदर्य से भरपूर, जैसे अपना बद्रिकाश्रम है ।वैसे ही यहां सुंदर सी एक टाउनशिप कॉलोनी है।जहा हमे अपना संसार बसाना था।

बस से उतरते ही सामने टूटा फूटा सा घर था। मेरे पति ने मुझे कहा ,कि ,यही घर है जहां हमें रहना है। मैं चुपचाप अपना सामान उठा कर चलने लगी ,तो वह हंस पड़े ,अनपढ़ सी मैं उनको देखने लगी ,मेरे पति बोले ,”पगली मैं तुझे ऐसे घर में रखूंगा ?कैसे सोच लिया ?उनको समझने में मैं असमर्थ थी ।एक अनचाही शादी बताने वाले, मेरे लिए लग्जरी घर, आराम दायक जिंदगी, भरपूर प्यार करना चाहते थे।

दो पहियों की हमारी गाड़ी में मेरा टायर तो पहले से ही पंचर हुआ पड़ा था ।शादी का कोई सपना या पूर्व नियोजन तो  मैने नही किया था।

टाउनशिप आ गए ।जहां पर मेरे पति के पास कंपनी का 2 बैडरूम ,हॉल और किचन वाला घर था ।यहां से हमारी गृहस्थी की शुरुआत होने वाली थी ।मैंने भी, पहले, शादी से इनकार किया था ।क्योंकि, मैं जिंदगी में बदलाव नहीं चाहती थी ।मेरी कमजोरी यह थी ,कि ,मैं एक क्लास से दूसरी क्लास जाने से भी डरती थी ।यह तो फिर जीवन है ।मायका छोड़कर पति के साथ जीना मेरे लिए आसान नहीं था ।

मेरे मन में शक पैदा करके मेरे पति मुझे ऐसे बनाना चाहते थे, कि ,मैं सिर्फ उनके बारे में ही सोचूं और हुआ भी ऐसा ।शक के कारण मैं उनको अपने से दूर होने नहीं देना चाहती थी ।वह आग में घी डालते रहे ,और मैं जलती रही ।उनको लगता था कि, जब तक मैं शक करूंगी ,पूरी तरह से उनके नियंत्रण में रहूंगी ।लेकिन यह तो प्रेम नहीं था ।

शादी के 3 महीने बाद ही मैंने गर्भ धारण कर लिया ।अभी कुछ समझ पाती तब तक यह गर्भ—-डॉक्टर ने कहा ,पहला बच्चा है गर्भपात करने से बाद में कठिनाइयां  आ सकती है। कहते हैं कि गर्भावस्था में मां को खुश रहना चाहिए। लेकिन मेरी मानसिक परिस्थिति ठीक नहीं थी ।शादी निभाना मेरे लिए कर्तव्य से ज्यादा कुछ नहीं था ।

मेरे मोनीष का जन्म 6 जून 1996 में हुआ ।सुंदर सा बच्चा, नाजुक सा गोलगप्पे जैसे गालोवाला। लेकिन मैं भी कैसी मां थी, उसे खाना खिलाना भी मुझे नहीं आता था। छोटे बच्चों को नरम नरम खाना खिलाते हैं और मैं दानोवाला चावल खिलाने की कोशिश करती थी।वह बिचारा रोने लगता ।यह क्यों रोता है? मैं नहीं जानती थी और उसे डांट देती थी ।कभी-कभी मार भी देती थी ।एक बार एक दोस्त ने मुझे समझाया कि बच्चों को किस तरह खाना खिलाना चाहिए। तब से मैं उसका ठीक से ख्याल रख पा रही थी ।मोनीष के साथ पूरा दिन खेलना, उसको सजाना ,सुलाना, पढ़ाना इसमें ही ,दिन से महीने, महीनों से साल गुजर गए ।

बेटा अब 9 साल का हो चुका था और बेटी ने जन्म लिया।

मैं कौन हूं ?मेरा अस्तित्व इस धरती पर क्यों है? सब भूल चुकी थी ।संसार में लिप्त हो चुकी थी ।मगर नियति तो अपना कार्य करती रहती है। अपने कर्म ,प्रारब्ध को अजीब सी परिस्थितियां बनाकर सामने लाती है।

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Mrunalini

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