1. खंडहर …(भाग -2)

जुलाई का महीना था। बारिश बस हो के गयी थी। सारा वातावरण ठंडा और शांत था, पूरी धरती हरियाली साड़ी पहने सजी हुई थी , मैं छत में आ के दूर आकाश में भागते बादलों को देख रहा था ।  खेतों में पानी लबालब भर चुका था, जिसमे सूर्य देव तैर रहे रहे थे। मेरे हाथ मे मेरे कौतूहल का कीमती खिलौना था। मैनें किताब  ली और सुखासन में बैठ कर किताब को गोदी में रख लिया।

किताब का नाम था ” सामाजिक विज्ञान” कक्षा 6 , ये पुस्तक विक्रय हेतु नहीं है 😜😜

मैंने पुस्तक खोली और जल्दी-जल्दी उन रंगीन, किलों, महलों, स्मारकों, के चित्रों को उलट-पलट देखने लगा।

अरे ! वाह ,इतना मस्त खंडहर देखो तो!  ,और ये सिक्का तो देखो कितना अजीब है!  ये महल किसने बनवाया? ये कौन सा पत्थर है आखिर! ऐसे अनगिनत प्रश्नों के कपोत(कबूतर) मेरी चेतना के आकाश में उड़ने लगे । हर तस्वीर के साथ सौ- सौ प्रश्न उठते। 

मेरे सामने एक नए संसार का द्वार खुल चुका था, बिल्कुल नॉर्निया मूवी के जैसे । जिसके सारे पात्र मेरे लिए आश्चर्य थे। जिज्ञासा की अथाह प्यास मुझे उस ओर खींच रही थी।

खण्डहर ,महल, किले, राजा ,महाराजा ,कला, संगीत, और भबन जाने क्या-क्या। यहां से शुरू हुआ मेरा इतिहास, और रहस्य के प्रति प्रेम।

               स्कूल और इतिहास विषय

मेरे हाथ मे सामाजिक विज्ञान की पुस्तक थी। जिज्ञासा के उस अथाह सागर में मैं दिन-रात डुबकियां लगाता रहा। किसी और से इस विषय मे बात करूं तो सबको ये विषय बोरिंग लगता अक्सर सब किनारा कर देते। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि मुझे एकांत से गहरा लगाव हो गया। सुबह से दोपहर तक मैं स्कूल में उसके बाद अपनी गायों को लेकर मैदान में चला जाता वहां मंदिर ,पक्षी,पानी, हवा ये सभी मेरे सहचर होते थे। दिन भर में में हज़ार प्रश्न उठते..चंद्रगुप्त मौर्य अगर सारे अखंड भारत का राजा था तो उसका महल कैसा रहा होगा?…कैसा पौरुष वाला व्यक्तित्व! वाह! लेकिन ये पौरुष आया किसकी वजह से ….” आचार्य चाणक्य ”  हाँ, वही तो थे जिसके कारण एक साधारण ग्रामणी चन्द्रगुप्त चक्रवर्ती सम्राट बन पाया, वाह! गुरु हों तो आचार्य चाणक्य जैसे। अरे! हाँ तो फिर चाणक्य कहाँ के थे? उनका जन्म कहा हुआ? 

इस तरह फिर मेरा मन इतिहास के हर एक पात्र के जीवन सागर में गहराई में गोते लगाने लगता। ऐसे करते-करते घंटो मैं अपने आप से ही प्रश्न करता और कल्पना की ऊंची-ऊंची उड़ाने भरता इसका सीधा लाभ यह हुआ कि इन विषयों को पढ़ना मेरे लिए खिलवाड़ हो गया। बाकी अन्य विषयों को भी मैं पढ़ता था क्यों कि अच्छे नम्बर लाने के लिए उनका भी बराबर का योगदान था। स्कूल नियमित चालू था हमारी क्वार्टरली परीक्षा नजदीक आ चुकी थी, हमारे मेन क्लास टीचर थे “सिंह सर” ऊंचे कद के भरे पूरे “हैग्रिड” की तरह😜 संयोगवश वो सिविक्स पढ़ाते थे और मैं इस विषय मे माहिर था।  इस तरह अनायास ही मैं उनका चहेता बन गया था। चॉक ,डस्टर कुछ भी लाना हो मेरा ही नाम अदब से पुकारा जाता , मैं किसी युवराज की तरह गर्व से सीना चौड़ा कर लेता और बाकी बच्चों के मुँह की ओर अभिमान  से निहारता। मुझे हंसी आती है जब मैं उन लम्हो की ओर झांकता हूँ। ।

मैं कुछ-कुछ जेठा लाल जैसे रिएक्ट करता था, क्लास के बाकी बच्चे मुझे भिड़े ,अय्यर ही लगते थे जिनकी धोती खुलने में मुझे गहरा आनंद आता था 😄😄😄😁😁😁😜 मुझे पता है अब आप बबिता जी के बारे में सोच रहे …..सब्र रखिये सब का नम्बर आएगा

Thanks for reading🌺🌼🌼😊

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Satyam Tiwari

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