करीब 10500 फुट की ऊंचाई पर यह स्थान है जहां रहने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है ,बताओ कैसा दिखता है? शायद किसी का भी मन मचल पड़ता होगा ऐसी जगह पर कुछ दिन रुकने के लिए ,है ना। आज मैं एक ऐसी गंभीर मुद्दे पर पोस्ट करना चाहता हूं जिसमें इस बात पर फोकस करना चाहता कि हमारी जिंदगी सिर्फ और सिर्फ शिकायत करने के लिए नहीं है ।हमारी व्यक्तिगत सोच ही इस बात का द्योतक है कि हमें जीवन जीने की कला आती भी है या नहीं।

मैं तो बेवजह ही खुश हो लिया करता हूं ।कभी यह नहीं शर्त नही लगाता कि ऐसी वस्तु मेरे पास होगी तभी जाकर के मैं खुश रहूंगा ।क्योंकि मुझे पता है कि जो इंसान शर्त के आधार पर जीवन जीना चाहता है वह कभी खुश हो नहीं सकता और अगर हुआ भी तो उसकी खुशी लंबे दिनों तक नहीं टिकने वाली। मैं बहुत सस्ते में खुश हो जाया करता हूं कभी रात में छत पर बैठकर आसमान में मुस्कुराते  चांद को निहारता हूं और उससे कुछ गुमसुम सी बातें किया करता हूं।कभी नदी के किनारे बैठ कर के उसके लहरों को और उसकी मधुरम संगीत को सुना करता हूं ।कभी झड़ना के जल को भी उसी आनंद से उठाकर पी लिया करता हूं जिस उत्साह के साथ लोग फिल्टर्ड पानी पीते हैं ।कभी कोई प्यारा सा बच्चा मिले तो उसे गोद में उठाकर प्यार कर लिया करता हूं। कभी किसी हरियाली से भरे हुए स्थान पर जाकर जाकर वहां कोई उम्दा सी ग़ज़ल गुनगुना लिया करता हूं। कभी सुबह निकलते हुए लाल-लाल सूरज को देख कर के सस्ते में खुश हो जाया करता हूं। कभी पक्षियों के कलरवों में जीवन का वासंती संगीत श्रवण कर लिया करता हूं ।मुझे इन सब काम को करने के लिए पैसे की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती ।अब आप पूछोगे आपको नहीं पड़ती लेकिन हमे में तो पड़ती है। वास्तव में धन जितनी  आवश्यकता है और जितनी हमारी बेसिक नीड्स है वह प्रकृति हमें अवश्य पूरा करती है ।

           बात फिर वही घूम फिर कर आती है की इच्छा और तृष्णा में अंतर है ।शालिनी दीदी ने एक पोस्ट लिखा था जिसके माध्यम से वह कहना चाहती थीं कि हद से अधिक जब महत्वाकांक्षा हो जाती है तो वह हमारे लिए बर्बादी का कारण बनती है ।मैं बहुत प्रभावित हुआ था उनके इस लेख से ।मनुष्य अपने आप को समाज में कुछ दिखाना चाहता है, एक ऐसी लाइफस्टाइल के साथ खुद को पेश करना चाहता है कि उसके भड़कीले और विलासिता पूर्ण जीवन शैली को देखकर के लोग उसकी तरफ अदब से झुके ,,,,,,,,,मेरी नजर इसी सोच को तो  मानसिक गुलामी कहते हैं ।कोई आपको कुछ कहे तब जाकर के आप खुश हो यही तो मानसिक गुलामी है ,क्योंकि आप खुश रहने के लिए किसी अन्य पर निर्भर हो। किसी के कमेंट पर ,किसी वस्तु पर किसी व्यक्ति पर ,या पैसे पर ।  हमने देखा है कि शादियों में और पार्टियों में लोग सिर्फ दिखावा करने के लिए सिर्फ यह शो करने के लिए कि मैं बहुत बड़ा आदमी हूं न जाने कितना बड़ा कर्ज उठा लेते हैं ।खूब सारे खर्च करते हैं ताकि लोग उनकी खूब तारीफ करें। एक रात की बात है खुशी उनके जीवन में कर्ज का एक ऐसा बोझ बना कर चला जाता है कि बाद में वह पछताते रहते हैं ,और तकलीफ है उठाते रहते हैं कोई  आपकी 2 मिनट के लिए तारीफ कर दें और फिर आप उस तारीफ के बदौलत कितनी देर तक खुश रह पाओगे ,फिर तकलीफ में चले जाओ तो वह 2 मिनट की खुशी और लंबे समय का तकलीफ जरा तुलना करके देखो कितने बुद्धिमान हो आप ज्यादातर लोग अपने प्रसन्नता के लिए कम दूसरों को दिखाने के लिए अधिक जीते हैं मैंने देखा है ऐसे लोग जब किसी रेस्टोरेंट में बैठते हैं तो पड़ोसी के मैन्यू को देख करके वह अपना आर्डर देते हैं।  पड़ोसी ने अगर 350 का आर्डर किया तो अब यह पक्का 450 का ऑर्डर करेगा ताकि पड़ोसी समझे कि यह भी हमसे कोई बड़ा आदमी है ।उसे किस वस्तु को खाने से खुशी मिलेगी यह बात वह नहीं सोचता उसे पड़ोसी की नजर में बड़ा बनना है इसलिए वह अपनी खुशी का गला घोट करके दूसरों की नजर में कुछ दिखना चाहता है। पड़ोसी का बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है और अपना बच्चा अगर साधारण स्कूल में पढ़े तो हमेशा मन में एक चिढ़ रहती है और इस चीज की वजह से घर में हमेशा तनाव का माहौल रहता है। यह क्या है वास्तव में यही तो प्रतिस्पर्धा है ।हमें जीवन जीने की कला  मालूम हो तो हम इन उलझन में ना जीकर सहज रूप से जीना शुरु कर दें । हद है ऐसी सोच को। आप अपने अंतःकरण पर तो निर्भर नहीं होना चाहते जबकि खुशी का संबंध अपने अंतःकरण से है। स्वामी जी भी कहते हैं कि हम कितना भी कुछ कर ले पर हमें जो वास्तविक आनंद प्राप्त होता है वह हमारे अंतः करण से हमें मिलता है ।पर अज्ञानी जीव बाहर की वस्तुओं में मुंह मारता फिरता है उसे लगता है कि इतनी सारी चीजें इकट्ठी कर लूंगा तब जाकर खुशी मिलेगी।

हमने देखा है कितनी सारी स्त्रियां अपने पड़ोस के लोगों की आर्थिक स्थिति को अच्छा देख कर जलते रहती हैं और अपने पति से भी बिल्कुल वैसे ही लाइफस्टाइल के लिए जिद करते रहती हैं। कहने का अर्थ यह है कि उस तरह की लाइफ स्टाइल को पाने के लिए वह एक लंबा इंतजार करती हैं और खुशी के इंतजार में उनका जीवन एक लंबे तनाव और प्रतिस्पर्धा में बीत जाता है ।जीवन रेस नहीं है जीवन यह भी नहीं है कि हम पड़ोसियों और मोहल्लों वाले के सामने अपने वैभव का प्रदर्शन करके बड़ाई  लूट लें ।जीवन इस बात के लिए मिला है कि हमारे पास जो है उसी में संतुष्ट रहें और एक सामान्य भाव से कर्म करते रहें ।आप बहुत जोर लगा करके या बहुत जिद करके किसी भी कीमत पर अपने अंतःकरण को प्रसन्न नहीं रख सकते ।यह बात आप लोगों में सबने जो कि पढ़ रहे होंगे सबको पता होगी ।हम में से अधिकांश पढ़े-लिखे मनुष्य प्रतिस्पर्धा में और दूसरों की नजर में कुछ बनकर दिखाने में ही अपनी पूरी जिंदगी व्यतीत कर देते हैं ।खुशी के इंतजार में जीवन एक लंबा सा दुख बन कर रह जाता है अगर हम स्वामी जी जैसे महान गुरुओं के संपर्क में हो तो हमें सहज ही जीवन जीने की कला आ जाएगी। फिर हम किसी व्यक्ति और वस्तु पर खुश रहने के लिए निर्भर नहीं रहेंगे ,फिर आनंद का बहुत स्रोत जो हमारे अंदर है वही प्रस्फुटित हो जाएगा ,फिर तो शिकायतें कम हो जाएंगी और सहजता अधिक आ जाएगी ।जीवन जीने की कला हम वास्तव में सीख पाएंगे और इतने सस्ते में खुश हो लिया करेंगे फिर तो साधारण सी वस्तु भी हमें बहुत आनंद प्रदान करने वाली हो जाएगी। इसके विपरीत अगर हमें जीवन जीने की कला का ज्ञान नहीं होगा तो दुनिया भर की सारी भोग सामग्री उपस्थित रहने पर भी हम अंदर से घुटते और जलते रहेंगे। यह सब तो व्यक्तिगत अनुभव की बात है हर कोई जिसने अपने जीवन में उम्र के  जिस पड़ाव पर हैं देखा होगा। वहां से अगर पीछे मुड़कर देखें तो सबको यही एहसास हो रहा होग की प्रसन्नता या खिन्नता का संबंध किसी व्यक्ति या वस्तु से नहीं हमारे अंतर की स्थिति से है ।एक ही स्पीड ब्रेकर है एक ठेले पर सवार इंसान को उसे पार करने में जोर का झटका लगता है और मर्सिडीज में सवार आदमी को कोई खास झटका नहीं लगता। बिल्कुल ऐसे ही स्थिति हमारे मानस की होती है ।हम किसी भी समस्या को या किसी भी खुशी के पल को किस प्रकार से लेते हैं। अगर हम खुशी में बेकाबू हो जाते हैं तो निश्चित रूप से दुख के समय में हाय हाय मचाने लग जाएंगे क्योंकि हमारी स्थिति अगर समता में रहने वाली नहीं है तो ना हमें खुशी बर्दाश्त होगी ना दुख बर्दाश्त होगा ।तो स्वामी जी ने कहा था जब हमारे पास अध्यात्म का बल होता है तो हम इन दोनों ही स्थितियों में बराबर भाव से रहना सीख लेते हैं और जिसने इस समभाव से रहना सीख लिया वह गृहस्थ होते हुए भी योगी होने का आनंद प्राप्त कर सकता है ।जितना अपनी समझ में आता है लिख दिया । आगे os.me के आप सभी स्नेही लोगों  के स्वास्थ्य और प्रसन्नता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए आज का लेख समाप्त करता हूं ।जय श्री हरि🌳🌳🌴🌴🌻🌻🌼🌼🌿🌿🥀🥀🌾🌾🌲🌹🌻💐

 

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Ashu Harivanshi

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