कहते हैं कि जब हमारा मन निर्मल हो जाता है ,तभी भगवान की प्राप्ति होती है।जब भगवान के सिवाय कोई चाह न रहे ,मन में कोई द्वेष न रहे ,कोई मोह न रहे तब हम भगवान को पाने के योग्य होते हैं ।

यहा दो बाते हैं जो द्वंद पैदा करती हैं ।वो ये की उपर्युक्त योग्यताएं ही तो प्राप्त करनी ही तभी तो व्यक्ति भगवान की ओर चलता है ।अगर ये सभी गुण इंसान में हो तो भगवान को पाने की लालसा उसके मन में उठेगी ही नहीं ।

दूसरी बात मन की उपर्युक्त स्थिति को प्राप्त करने का बल मनुष्य में नहीं तभी तो वह भगवान से निवेदन करता है की मुझे इस मोह माया से मुक्त करो ।

प्रश्न ये है की पहले निर्मल बने तब भगवान स्वेकारेगे या पहले भगवान स्वीकार करले तो हम स्स्वतः ही निर्मल बन जाएंगे ।

कोन सा मार्ग सही है ,?Will you be my mother? Doing

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Kshama Devtale

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