दिन 3 : महाविद्या षोडशी/ त्रिपुर सुंदरी

तत्त्व : वास्तविक सुंदरता और एकात्मता

त्रिपुर सुंदरी। राजराजेश्वरी। षोडशी। कहते हैं कि इनसे ज़्यादा खूबसूरत 14 भुवनो में कोई नहीं। ये साक्षात सौंदर्य की पराकाष्ठा हैं। पर इनको यानी सौंदर्य को तत्त्व से बिरला ही कोई जान पाता है। नाम-रूप की इस दुनिया में ईश्वर को भी सांसारिक सौंदर्य की परिभाषा में अक्सर ढाल ही दिया जाता है। त्रिपुरा को एक बेहद मादक स्त्री के रूप में देखा जाता है। काले लम्बे घने बाल, दूधिया रंग, आभूषणों से लबालब। 16 वर्षीया कन्या के रूप-विवरण से मादकता रिसती रहती है।

पूर्व-जन्मों की साधनायें हो या इस जन्म में मिला तिरस्कार, मेरा झुकाव हमेशा ही महादेवी के उग्र स्वरूपों की तरफ रहा है। मेरे लिए माँ के त्रिपुरसुंदरी, गौरी, दुर्गा, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि रूपों का केवल एक मतलब था – समाज द्वारा अपने सुंदरता के नियमों को एक रूप में ढाल देना। षोडशी की ऊर्जा मेरी भक्ति की परिधि के आस-पास भी नहीं फटकी कभी। पर तब तक जब तक मैंने त्रिपुरा तत्त्व को नहीं जाना। और जिसदिन आप षोडशी को तत्त्व से जान जाएंगे वह आपको भी प्रेम के वशीभूत कर घुटनो पर ले आएगी!

मेरी त्रिपुरा। ब्रम्हांड सुंदरी है! पर उसका सौंदर्य इस समाज की सुंदरता के परिभाषा के परे है। उन्मुक्त है उसका सौंदर्य! हर नियम, हर परिभाषा, हर बंधन से ऊपर। मेरी त्रिपुरा दूधिया है! जिसके दूध से पूरी कायनात पोषित है उसका दूधिया होना जायज़ भी है। पर मेरी जान सिर्फ दूधिया नहीं है! वह काली भी है। रक्तवर्णा भी है। पीतवर्ण भी है। मेरी त्रिपुरा साक्षात प्रकृति है! मौसम के साथ उसका रंग बदलता है। महामाई मेरी हर एक रंग का समन्वय है!

आप कहते हो त्रिपुरा के बाल काले-घने हैं। आपको रात से प्यार है? अपनापन-सा महसूस होता है रात की खामोशी से? वह हल्की-हल्की झींगुर की आवाज़। कही दूर महकती रात-रानी की खुशबू। और फ़िज़ा से रिसती तन्हाई। क्या ऐसा नहीं लगता की रात के छूते ही मानो अंदर कुछ जाग-सा जाता हो? मेरी त्रिपुरा इसी अँधेरी रात को सर पर ओढ़े रहती है। तुम्हारी इस दुनिया के आभूषणों की बेड़ियों से आज़ाद है वो! मैंने उसे अनगिनत तारें और असंख्य आकाशगंगायें पहने देखा है।
कहा ना! प्रकृति है वो! परे है आपकी खूबसूरती की कल्पना से।

प्रश्न उठता है कि क्या है सौंदर्य का तत्त्व? कौन है त्रिपुरसुंदरी? मेरी त्रिपुरा महादेव की अर्धांगिनी है। शिव वाम-भाग निलया। कामेश्वराकास्था।रहस्य की बात बता रहे हैं – देवी को ‘देखने’ के लिए शिव की आँखें चाहिए। आपको क्या लगता है ऐसा क्या है जो आदियोगी की नज़र में एक स्त्री को उनकी ‘कामेश्वरी’ बना दें? जो स्वयं महाश्मशान की राख से भस्माविभूत रहते हों, क्या होगी उनके सुंदरता की परिभाषा?

सांसारिक सुंदरता काल के आधीन है। वक़्त के साथ इसका ढल जाना शाश्वत सत्य है। और मेरे महादेव काल के नियंत्रक! जो स्वयं काल से परे हों उनको अनित्य वस्तुओं का मोह नहीं होता। महामाई के सौंदर्य का रहस्य सतही नहीं है। शमशान के महा-अघोर का मन माई की तपस से उत्पन्न तेज पर आया है। 

सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।
बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुश्चरं तपः ॥२४॥ (श्रीमद्भागवतम 2.9.24)

“मैं इस ब्रम्हांड की रचना अपने तपस से करता हूँ। इसका पालन भी तपस से होता है। और संहारकाल में इसी तपस से मैं इस सृष्टि को विलीन करता हूँ। यही प्रचंड तपस ही मेरी वास्तविक ऊर्जा का स्त्रोत है।”

महाविद्यायें एक साधिका की नज़रों से... 1त्रिपुरसुंदरी के तपस के तेज के कारण उनका आभामंडल हज़ारों उदित होते सूर्यों-सा प्रज्जवलित है। और महादेव को यही तपस उनकी तरफ आकर्षित करता है। माँ गहरी हैं और माई की यही गहराई महादेव के प्रेम का आधार है।

तपस क्या है? कैसे आएगा? आना तो पड़ेगा। देवी को आत्मसात करना है तो स्वयं ‘देवी’ तो होना ही पड़ेगा। तंत्र में इसका और कोई विकल्प नहीं।

शिवो भूत्वा शिवं यजेत।

जिसकी प्राप्ति करनी है उसके तत्त्व और गुणों को धारण किये बिना उसकी प्राप्ति असंभव है।

क्षमा,आर्जव, करुणा, संतोष और सत्य को धारण करना ही तपस्या है। खुद को साध लेना ही परम साधना है। माई मेरी करुणा-रस-सगारा है। रक्षाकरी-रक्षासाघ्नि है। हर एक जीव से अथाह, बेशर्त प्रेम; ज़रूरतमंदों की रक्षा को तत्पर, खुद से पहले दूसरों का हित सोचना। माई की इन्ही बातों पर परमतपस्वी शिव मोहित हैं। शिव के लिए सुंदरता कर्म और आचरण से आती है, त्वचा और रंग से नहीं। गुणों से प्रेम है शिव को। और देवी की यही तासीर उनको कायनात की सबसे खूबसूरत ऊर्जा बनाती हैं।

त्रिपुरा का एक और तत्त्व है एकात्मता। जब साधक काली की ऊर्जा को धारण करता है तो भगवती की कृपा से वो समस्त भय से मुक्त हो जाता है। काली की साधना निर्भीक बनाती है और तंत्र निर्भीकों और आध्यात्मिक क्रांतिकारियों का मार्ग है। काली की कृपा के बिना तंत्र के मार्ग पर चलना असंभव है। सच मानिये तो काली ही एक मनुष्य को एक साधक में परिवर्तित कर सकती है।

काली की ऊर्जा को आत्मसात कर जब साधक महाविद्या तारा की ओर बढ़ता है तो महामाई की कृपा से उसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है जिसके मिलते ही साधक हर द्वन्द से मुक्त हो जाता है और उसकी दृष्टि सम हो जाती है – भेद समझते हुए भी अभेद को देख पाना। तारा के वास्तविक ज्ञान और परम मुक्ति को खुद में धारण किये साधक जब त्रिपुरसुन्दरी की तरफ आता है, तब सम-दृष्टि के कारण वो चीज़ों के वास्तविक सौंदर्य को देख पाता है।

रूप-रंग-आकार-शरीर से परे मनुष्य के कर्म, आचरण और विचारों की सुंदरता को देख पाता है। यही असल में ‘त्रिपुरसुन्दरी’ हैं। हर जीव और निर्जीव में व्याप्त सौंदर्य ही ‘षोडशी’ हैं। क्यूंकि अब साधक काली की निर्भीकता और तारा के ज्ञान के कारण अपने संस्कारों और सोच की संकीर्णताओं से मुक्त हैं, वो सभी प्राणियों में, चर-अचर में, अपने स्व-रूप या भगवती के दर्शन करेगा।

उसके लिए सबकुछ ‘देवी’ ही हो जायेगी। हर सम्बन्ध में ‘देवी’ की सुगंध आने लगेगी। जब यूँ हर जगह ‘देवी’ ही दिखे, फिर उसे कहाँ ढूंढना पड़ेगा! कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूंढें बन माहि! ऐसी स्थिति में साधक हर क्षण आत्मलीन, हर क्षण ब्रह्मलीन रहने लगता है। तंत्र का मार्ग है इसलिए साधक संसार से कटता नहीं है। देवी स्वयं उसके संसार का हिस्सा बन जाती है। हर व्यक्ति, हर वस्तु ‘देवी’ हो जाए और आप स्वयं देवी में खो जायें, इसी स्थिति को एकात्मता कहते हैं जो षोडशी महाविद्या का परमतत्त्व है।

काली-त्रिपुरा

काली पराविद्या है। आद्या हैं। इनके दो रूप हैं – कृष्णवर्णा और रक्तवर्णा। भगवती का कृष्णवर्ण रूप महाकाली कहलाता है और रक्तवर्णरूप षोडशी।
महाकाली को आद्या इसलिए कहा जाता है क्यूंकि ये महाकाल की शक्ति हैं। प्रलयकाल में सब भगवान् आशुतोष महाकाल रूप में तांडव करते हैं और सब उनमे विलीन होने लगता है तो उस विनाश की केवल एक साक्षी होती है जो स्वयं उस विनाश से परे होती है – महाकालिका। काली ही महाताण्डव-साक्षिणी है। इस विनाश लीला में प्रकाश भी शिव में ही विलीन हो जाता है और बचता है घुप्प अँधेरा। प्रकाश के अभाव में कुछ भी देखना असंभव है। महाकाली वहाँ होती है पर दिखाई नहीं देती। सिर्फ अन्धकार दिखाई देता है। इसलिए माँ के वर्ण को अन्धकार-सा काला बताया जाता है। जब पुनः प्रकाश आता है और देवी भगवती कालिका का रूप प्रकाशित होता है तो जो रूप दिखता है वही त्रिपुरा है। यानी निराकार आद्यशक्ति स्वरुप में भगवती महाकालिका कहलाती है और सगुन साकार स्वरुप में वही महाकाली त्रिपुरसुन्दरी कहलाती हैं।

महाविद्यायें एक साधिका की नज़रों से... 2—काली-तारा-षोडशी-काली-तारा-षोडशी—

भगवती महाकाली महाकाल की शक्ति हैं और इस रूप में सृष्टि का संहार करती हैं।
फिर महाकाली भगवती तारा में परिवर्तित होकर सृष्टि करने के लिए ‘ब्रम्हांड-भाण्डोदरी’ बन 14 भुवनों को, असंख्य तारामंडल और आकाशगंगाओं को अपने उदार से जन्म देती है संहार के बाद। सृष्टिकर्त्री होने के कारण इनका एक रूप नीलसरस्वती कहलाता है।
सृष्टि करने के बाद महामाई तारा भगवती त्रिपुरसुन्दरी के रूप में तैयार होती हैं। नारायण की वैष्णवी शक्ति बन इस नयी सृष्टि का पालन पोषण का भार उठाती है।प्रलयकाल में पुनः त्रिपुरा ही अपना रूप परिवर्तित कर एक बार फिर महाकाली बन जाती है। यह क्रम यूँ ही चलता रहता है।

आद्या महाकाली – ब्रह्मविद्या तारा – पराप्रकृति त्रिपुरसुंदरी एक ही ऊर्जा है!