ये हैं थोड़े
ग़ुस्सेबाज़
पर दिल के हैं
एकदम साफ़

बचपन में बच्चे थर्राते
पड़ोसी कहीं गुम हो जाते
पत्नी रहती दबी सहमी
साथी घर आते शर्माते

पर मजाल है रुतबा हो कम
गुस्सा होना उनका था धर्म
बात सही कौन बताएगा
आपको सच पर कौन चलाएगा

शास्त्रों के गूढ़ ज्ञाता
विज्ञान में आइंस्टाइन के भ्राता
हिंदी में लीला अपरम्पार
अंग्रेज़ी व्याकरण तेज़ तलवार

किसका सच है सच
क्या है कुछ भी
सच

अब बच्चे कम घर जाते हैं
काम है ज़्यादा या मन है कम
अलग फ़ोन पे यूँही
माँ से चुपचाप बतियाते हैं

ये अकेले सोचते हैं कभी
ग़लत था मैं या मैं सही
पर खाली मैं क्यों हँसू
जीवन गंभीर है अभी

अकेलापन पर है सालता
क्या सब था मुग़ालता
क्या चखे सब जीवन के मैंने रंग
सत असत छोड़ कुछ और मैं पालता

अब कोई घर भूले से आता
माँ को अकेला कमरे में पाता
धीमे से वो अंदर इशारा करती
जा कर उनसे बात को कहती

ये हैं थोड़े
ग़ुस्सेबाज़
पर दिल के हैं
एकदम साफ़

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Manas Misra

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