मोनिष अब 12 साल का हो चुका था। अचानक ही शाम को उसे उल्टियां होने लगी ,कारण पीलिया।

पीलिया 7या8 कारणों से होती है ।उसमें से एक शरीर में ताम्र (copper)की मात्रा ज्यादा होना भी है। जब यकृत से ताम्र का उत्सर्ग नहीं होता तब अवयवों  की गति धीमी हो जाती है ।कोई भी कार्य करने के लिए दिक्कत आती है ।जोड़ों में कठोरता आती है ।इस बीमारी को विल्सन डिसीज कहते हैं।

इसके कारण मोनीष 94% मार्क्स लेने वाला बच्चा 2% या 3% मार्क ले पा रहा था। अब स्कूल में पहले बेंच से पिछली बेंच पर बैठने लगा ।दोस्तों ने उसकी दोस्ती तोड़ी, कारण ,ना तो वह ठीक तरह से पढ़ पा रहा था, ना ही उसके चेहरे पर तेज था। उसके शरीर का रंग चेहरे का रंग काला पड़ चुका था।

समाज सिर्फ सफल इंसान के साथ ही रहना चाहता है। बाहरी सौंदर्य तो अति आवश्यक है। यह बात वह समझ चुका था। वो यह अपमान  सहन नहीं कर पा रहा था। आठवीं की  परीक्षा वह लिख नहीं सका ,कारण उसके हाथ में कंपकंपाहट होने लगी थी। पढ़ाई में दिक्कत आने लगी तो हमने उसे सीबीएसई से निकालकर स्टेट सिलेबस में पढ़ाना शुरू कर दिया।

ठिक तरह से बात नहीं कर सकता था, ना ही लिख कर अपनी बात बता सकता था ।कितनी मजबूरी हर बात अपने मन में ही दबा कर रखता था। फिर भी अपना मनोबल उसने नहीं तोड़ा। धीरे-धीरे करके अब 12वीं की परीक्षा उसने पास की और तांत्रिक विद्यालय में उसने प्रवेश पा लिया।

छोटी सी उम्र से ही खाने-पीने पर निर्बंध लग चुके थे ।बहुत सारी औषधि खानी पड़ती थी। सब कुछ करके भी उसके शरीर में ताम्र की मात्रा बढ़ती जा रही थी ।

एक दिन उसने मुझसे कहा,” मां मैं कितने दिनों तक यह तकलीफ उठाता रहूंगा ?मुझे भी जीना है ,मुझे अपने तरीके से जीने दो ।”पढ़ाई भी करना चाहता था ।वह वैज्ञानिक बनना चाहता था ।ISRO में काम करना चाहता था ।इसलिए उसने हॉस्टल जाने की जिद की। क्योंकि, घर में ऐसा वातावरण नहीं था कि वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सकें। हॉस्टल चला गया, जहां पर उसने अपनी जिंदगी के  3 साल खुशी से बताएं।

अब वह वक्त आ चुका था ,उसकी तबीयत ज्यादा खराब रहने लगी। टेस्ट करने से पता चला कि उसका लिवर सिरोसिस हो चुका था ।यह बात मैं उसे कह नहीं पा रही थी। वह अब मौत के मुंह में जा रहा था।   20 साल का बच्चा, मैं खोना नहीं चाहती थी ।आयुर्वेद से भी कुछ नहीं हो पाया ।उसे भी पता चल गया प था कि उसका लिवर पूरी तरह से खराब हो चुका है ।हमने लिवर ट्रांसप्लांट करने की ठानी। लेकिन वह नहीं चाहता था कि उसकी वजह से मुझे तकलीफ हो। मैं अपना लीवर उसे देने वाली थी मैं लाईव डोनर  बन रही थी ।इसलिए उसने मुझे मना कर दिया। मैंने उसे समझाया कि मुझे सिर्फ एक या 2 महीने तकलीफ होगी। लेकिन तुम 30 साल बच जाओगे।30 साल तुम्हें कुछ नहीं होगा ।इससे ज्यादा किसी मां को क्या चाहिए? मैं चाहती थी, इतने होनहार बच्चे के सपने पूरे हो जाए ।इसलिए हमारे आग्रह के कारण वह ऑपरेशन के लिए तैयार हो गया। मेरा 50% का यकृत उसे देने का तय हो गया।

मोनीष का हाथ अपने हाथों में लेकर ,मैंने कहा ,”हम दोनों हाथ पकड़कर ऑपरेशन थिएटर में जाएंगे और दोनों हाथ पकड़ कर वापस भी आएंगे ।मेरा विश्वास मत तोड़ना ।”उसने सिर्फ हामी भरी।

ऑपरेशन सवेरे 6:00 बजे शुरू हुआ।। मुझे 18 घंटे लगे ऑपरेशन के लिए ।उसके बाद होश आ गया  छाती से लेकर पेट तक चीर दिय  गया था। दर्द इतना था कि नारकोटिक दवाई मार्फिन देने के बावजूद दर्द सहन करना मुश्किल हो गया था। सोच रही थी क्या इतना दर्द लेना जरूरी था ।एक नकारात्मक सोच मेरे मन में आ गई अगर ऑपरेशन टेबल  के ऊपर ही मर जाती तो अच्छा था।

मोनीष के ऑपरेशन के लिए 21 घंटे लगे ।डॉक्टर मुझे मिलने के लिए आ गए। मैने पूछा, मोनीष कैसा है ?उन्होंने कहा कि ऑपरेशन फेल हो चुका है ।उसका रीट्रांसप्लांट करना पड़ेगा ।मैं सन्न रह गई ।क्यों??

इतना सब कुछ वह बच्चा झेल रहा था ।10 साल उसने तकलीफ झेली है। “अब तो भगवान उसे बख्श दो।”कहने लगी। डॉक्टर ने कहा दूसरे लीवर का इंतजाम करना पड़ेगा ।मेरा भाई बहन सामने आ गए कि अब हम उसे अपना लिवर देंगे।तुमने अपना कर्तव्य निभाया है।अब हम अपना निभायेंगे।मैं पहले से ही दर्द सहन नही कर पारही थी। अभी मेरे भाई या बहन को इस दर्द से मैं गुजरने नहीं दे सकती थी। उनके बच्चों को ,मेरी भाभी को, मेरे जीजाजी को क्या कहूंगी ?मैंने उनसे लीवर लेने के लिए मना कर दिया।

कर्नाटक में कहीं भी ब्रेनडेड हैं तो पहले मोनष को लिवर दिया जाए, ऐसी सिफारिश की गई ।मैंने भी पहले हामी भरी थी ।मुझे लगा किcadavor का अर्थ होता है जो मर चुका है ।तो उसका लीवर लेना मेरे लिए ठीक था। लेकिन जब मैंने जाना कि ब्रेनडेड मतलब, जिसका मस्तिष्क काम नहीं कर रहा, लेकिन बाकी का शरीर कार्यरत है। इसका मतलब वह जिंदा है ।एक जिंदा आदमी का यकृत निकालकर मेरे बेटे को दिया जाएगा। यह सुनकर मैं दंग रह गई ।मैं ऐसा पाप नहीं कर सकती थी, ना ही मेरे बेटे को ऐसे पाप का भागी बनाना चाहती थी ।जो ब्रेनडेड डोनर होगा उसके परिवार की स्थिति क्या होगी? सोच कर मैंने डॉक्टर से यह करने के लिए मना कर दिया।

मैं और मेरे पति अपना कर्तव्य निभा चुके थे। अब जो भी है मां की इच्छा,जो भी होगा उसका मैं स्वीकार कर लूंगी। सोच कर मैंने मां से प्रार्थना की,” मां, इन 15 दिनों में कृपा करके कोई अपघात या किसी को भी ब्रेनडेड मत करना ।कृपा करके हमारे हाथ से कोई ऐसा कर्म मत करवाना जिसका प्रायश्चित करना कठिन हो जाए।” मां की कृपा से,15 दिनों में हमें कोई  लीवर नहीं मिला। लिस्ट से मोनीष का नाम हटा दिया गया ।

उस दिन मेरे ही अंदर से आवाज आई ,”मैं यही देख रहा था कि तुम्हें अपने प्रिय जनों के प्रति करुणा है ।लेकिन दूसरों के प्रति तुम्हारे मन में करुणा का भाव है या नहीं ।”

यह क्या था?? मैं समझी नहीं ।

लेकिन उस दिन जहां मोनीष के लीवर को रक्त नहीं मिल रहा था वही उसे आराम से  रक्त मिल रहा था ।डॉक्टर भी अचंभित हो गए थे। कहां से उसको ब्लड सप्लाई हो रहा है। यह नहीं जान पा रहे थे ,की, आर्टरी ब्लॉक होने के बावजूद लीवर को ब्लड सप्लाई कैसे हो रहा है?

यही मेरी पहली परीक्षा थी। जहां भगवान ने मुझे धर्म संकट में डाल कर अपना निर्णय पूछा था,” कि मैं स्वार्थ से अपने ममता को ,अपने बच्चे को बचा लूंगी ,या निस्वार्थ होकर करुणा का स्वीकार करूंगी।”

यह मेरा पहला कदम था अध्यात्म के रास्ते पर ।

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Mrunalini

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