शायद ईश्वर एक अभिनय में है, जैसे अपने को भूल रहा हो,

और भुला भटका ईश्वर, अभिनेता हो कर संसार डाली से झूल रहा हो.

 

अभिनय कर रहा है वह अशंख्य आकर में,

प्रकट हो रहा निराकार, साकार में.

 

यह संसार सब उसी का परिचय है,

यह वासनाये सब उसी का अभिनय है.

 

तृष्णाएं ना हो तो,  कैसे हो प्रकृति  निर्मित,

वासना बिन,  विश्व  हो जाता  सिमित.

 

दोषी में भी अभिनयकर्ता, वही निर्दोष है,

असंतोष उसका अभिनय है,  वह तो परम संतोष है.

 

कण कण में है, वह व्यापक एक समान,

दृष्टिगोचर नहीं है वह अभिनेता, वह है अंतर्ध्यान.

 

चाक में वह घूम रहा है, धुरी में वह मौन है,

गम्य है यह अभिनेता पल पल , लेकिन वह अगम्य कौन है.

 

बीज में वह वृक्ष का अभिनय करता है,

पुष्प डालियों को झुका कर, निवेदन सविनय करता है.

 

साधु में वह अभिनय करता साधु का, चोर में वह चोर है,

वह है एक मौन सत्ता, उसी के अभिनय का सब शोर है.

 

बदलियों में वह गरज रहा है, अमृत बन वह बरस रहा है,

खुद ही किया अपने से अपने को दूर उसने, अब अपनी ही प्यास में तरस रहा है.

 

विभाजन करता है, वह अभिनय में,  अपने को अनेक में,

तभी झाँक रहा है वह कण कण प्रत्येक में.

 

अपने को अपने से जन्माता है,  वह सृष्टि का नटराज है,

खुद को खुद से ग्रसित करता है, वह अपना ही यमराज है.

 

इस रंगमंच में अभिनय यहाँ है,  सूत्रधार कहीं और  है,

भांति भांति के रंग यहाँ है, रंगरेज़ कहीं और है.

 

भक्त के ह्रदय में वह अभिनय छोड़ता है,

भक्त और भगवान की दूरियों को तोड़ता है.

 

होश में जो भी इस अभिनय को अपनाता है,

निसंदेह वह उस अभिनेता को पाता है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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