Jai Shri Hari, Pariwar

तलाश रहा था मैं नाम वहां
जहां था  भीड़ का उबाल
सुरूर था कि बनूंगा एक हिस्सा
पर परिणाम ने कर दिया उसे एक किस्सा ||

थे ना जाने कितने संग मेरे
जिन्हें मिल गया एक किनारा
बांधे मन की डोर
    मैं  निहारू उनकी राह  ||

गोते खाऊं मझधार में
धिक्कारते  अपनी असफलता को
कोई किनारा मिल जाए
  बस  तराशु अपनी मंजिल को  ||

अब तो  साथी है तू जीवन का
बन गया बेमंजिल है
देख जरा रंग महफिल के
    उनकी भी एक भाषा है  ||

प्रयोजन है गहराई का
यह ना जाने दुनिया की रीत
मंजिल तो एक बहाना है
   जीवन का अपना तराना है  ||
 
                                                                      DIVYAM 
 
 

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Vijay Singh

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