उस दिन स्मिता को चुपके से अपने घर में घुसने का मौका मिल गया. शायद दो तीन महीने बाद. उसके पास एक extra चाबी थी. वह जल्दी से अंदर enter कर गई. उसने एक उड़ती उड़ती नज़र डाली चारों ओर. सोफा जगह जगह से फटा हुआ था. पूरी तरह से चीथड़े . कहीं कहीं तो नीचे की लकड़ी भी नाक सिकोड़ रही थी. ये ज़रूर शेरू का कारनामा था. लेकिन फर्श बिल्कुल साफ़ था. धूल मिट्टी भी नहीं दिखी. चमकता हुआ फर्श, और बिना धूल मिट्टी का माहौल देख उसे थोड़ी राहत महसूस हुई.

किचन ज़रा बिखरी बिखरी थी. “चल कोई न…” उसने ख़ुद को दिलासा दिया.

दूसरा room भी ठीक ठाक हाल में ही दिखा.

हाँ, कार्नर वाले room का दरवाजा अभी भी वैसा ही था. आधा हिस्सा टूटा हुआ एक बहुत बड़ा सुराख़ लिए. स्मिता के दिल के सुराख़ भी जग गए.

Side के कमरे में भी झाँक ही लिया जल्दी से. वहाँ जगह जगह पीले निशान थे.एक तीखी गंध भी. अब वो कमरा शायद शेरू का वाशरूम बन चुका था. भरे मन से उसने दरवाजा बंद कर दिया.

वो अपने को बालकनी में जाने से रोक न पाई. टाइम कम था पर फिर भी..

जैसे ही उसने जल्दी से छोटे गमलों पर नज़र डाली तो पाया सब पौधे सूख चुके थे. मनी प्लांट भी, वो गुलाबी लकीरों भरी सुन्दर पत्तियों वाला भी और तुलसी माँ भी. और तो और इतना लम्बा और हमेशा हरा भरा रहने वाला मीठी नीम का पौधा भी. जिसकी पत्तियाँ वह सांबर में डाल लिया करती थी. बस एक लम्बी, सूखी टहनी बची थी, ठूठ भर. रुलाई आना तो लाज़मी था, इतनी रुखाई देख . लेकिन अभी उसके पास टाइम ही कहाँ था मातम मनाने का.

उसे एक आखिरी बालकनी भी देखनी थी, जहाँ उसका प्यारा सा, था तो छोटा पर उसके लिए बहुत बड़ा, एक पेड़ था वो नीम का पेड़ – 24 by 24 इंच वाले इकलौते बचे बड़े गमले में . वह लगभग 3-4 फुट ऊँचा था जब स्मिता ने आखिरी बार उसे देखा था.

इसी नीम की ऊपर की ताज़ी गुलाबी दो चार छोटी छोटी पत्तियाँ वो हर रोज़ सुबह बड़े चाव से खाली पेट ले लिया करती थी., अपने अंतर में आयुर्वेद के लिए बसे गहरे प्यार को समर्पित करते हुए. इस गमले को उसने बड़ी शिद्दत से संभाला हुआ था. लगभग सारे 100 गमले, कुछ बहुत सुन्दर, हरे भरे और 8-10 तो बहुत बड़े बड़े और विकसित, सभी एक पौधशाला वाले को दे दिए थे फ्लैट में जगह के अभाव में.

लेकिन ये क्या? आज नीम की एक टहनी पर पूरी गहरी लेयर बनी हुई थी, भूरे रंग के किसी कीड़े की. थोड़ा पास जाकर गौर से देखा तो और हैरान हो गई. एक नहीं सारी टहनियाँ उस एक ही तरह के जीरे जैसे bug से भरी हुई थीं. (किचन वाला जीरा ). और कुदरत की खूबी देखो की ऐसा लग रहा था मानो कोई सजावट हो रखी हो, इतनी बखूबी से वे एक के साथ एक सटे हुए लम्बी कतार बनाये हुए थे, बिना हिले डुले. वो अचंभित थी. लेकिन बहुत उदास.

विचारों की एक नई लहर चल पड़ी स्मिता के मन में.

देखो पूरा पेड़ कीड़ों से भरा पड़ा है.आसानी से तो किसी को दिखाई तक नहीं देंगे….

ख़ुद नीम है पर बच नहीं पाया कीड़ों से…

लेकिन फिर भी….

फिर भी पत्तियाँ अभी बची हुई हैं, हरी भी हैं, इतना सब होने पर भी…

मायने – उम्मीद अभी भी बरकार है….

स्मिता को अचानक ही एक बहुत बड़ा सहारा मिल गया. एक नया नज़रिया.

यदि मैंने इस पेड़ को बचा लिया, तो ये घर भी……

और उसके निर्जीव से शरीर में न मालूम कैसे और कहाँ से एक नई शक्ति भर गई. अब उसे अभी इसी समय कुछ न कुछ तो करना ही होगा. उसने नजदीक से देखा कीड़े तो बहुत ज़्यादा हैं. क्या करूँ? इस वक्त क्या कर सकती हूँ. गमला बहुत बड़ा और भारी है. इसे साथ भी नहीं ले जा सकती. उसने आसपास नज़र दौड़ाई तो पास रखी spray bottle दिखी. और ये क्या उसमें अभी भी थोड़ा सा liquid बचा हुआ था. स्मिता सारी उदासी भूल गई. मानो किसी बच्चे को अपना मन पसंद खिलौना दिख गया. झट से उसने बोतल हाथ में ली और जो थोड़ी सी दवाई थी, सारी टहनियों पर छिड़क दी. उसे अपनी आशा को हर हाल में जिंदा रखना था. तभी उसे एक और आईडिया आया. वो किचन में गई और चाकू ले लाई. उसने बस ऐसे ही कोशिश की…तने की ऊपर वाली पूरी layer ही हटाने की. और ये क्या, लेयर हट रही थी. कीड़े अभी भी चिपके हुए ही थे लेकिन अब वो उन्हें अपने छोटे से पेड़ से अलग कर पा रही थी.

और जैसे ही तने की ऊपरी लेयर हटने लगी, उसने देखा नीचे का हिस्सा साफ़ था, कुछ कुछ ताजा सा, थोड़ा जिंदा सा…..

हाँ, अब ये ज़रूर ठीक हो जाएगा, वो मुस्कुरा उठी ……

और, वाकई

उसके घर का आखिरी पौधा बच गया.

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