आखिर तुम चाहते क्या हो?

रोज रोज का मेरा रोना सुन,

भगवान् ने मुझे पूछ ही लिया।

जो भी माँगते हो, मै दे ही देता हूँ,

हाँ हो सकता है कभी देर हुई हो,

पर तुमने जो हट कर के माँगा,

वो तो तुम्हे मिल ही गया है।

पर जो माँगा वो पाके भी,

कीमती चीजों के बीच,

आई फ़ोन पे स्क्रॉल करते हुए,

अंत में तुम उदास ही बैठ जाते हो।

और फिर ये उदासी, अकेलापन,

छिपाने के लिए,

अपना समय, ऊर्जा और धन, खर्च करके,

भीड़ का हिस्सा बन जाते हो।

सोचते हो, की ये भीड़ तुम्हारी सराहना करेगी,

तुम्हारे खालीपन का इलाज बनेगी।

पर ये पार्टी में जमी भीड़,

कैसे तुम्हे कुछ दे सकती है,

क्योंकि पूरी भीड़ तुम्हारी ही तो परछाई है,

सब लेने ही आये है, कुछ दिखाने ही आये है। 

फिर तुम थोड़े चिचिड़ाये,

थोड़ा और ही खाली, घर लौटते हो।

फिर भी स्टेटस पे फोटो लगाके,

उसकी आड़, खुश होने का ढोंग करेते हो।

दो दिन बाद, फिर मेरी तरफ देखते हो,

रोते हो, कुछ नया माँगते हो, 

और फिर ये माँगने का, पाने का,

खुश हो ने का, उदास बैठने का,

वर्तुल जीवन भर चलते ही रहता है।

अब बस भी करो,

कितने चक्कर और लगाओगे,

तुम इस वर्तुल के?

अब बंद करो ये माँगना और रोना,

तुम नींद में हो, थोड़ा खुद को झिंझोड़ो,

और जाग जाओ।

और जानो, की तुम्हारे माँगने  में ही,

तुम्हारा रोना, खोना, उदासी और पीड़ा छिपी है।

आँखे खोलो और देखो,

एक नया सूरज,

एक नयी धरती,

तुम्हारे अंदर ही है।  

जहाँ कुछ माँगना नहीं, चाहना नहीं,

बस जागते हुए महसूस करना है,

की जो भी तुम्हे चाहिए,

पहलेसेही तुम्हारे पास है।

और जानना है,

की तुम पुरे हो,

हमेशा से ही,

मेरी तरह ।।

Om Shanti !

PS: Observe yourself and people around you closely and you may find some truth in above lines. Think about it! 

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Nandkumar

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