• किसी ने मुझसे उनकी बेटी के लिए लड़का तलाशने के लिए कहा। उनकी पहली शर्त है कि उनकी बेटी सास- ससुर का कुछ भी काम नहीं करेगी ।सुनकर… मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और दुख भी।
    मुझे समझ नहीं आया कि क्या कहूं ,क्योंकि वह अपनी बेटी की बात से पूर्णतः सहमत थी ।
    परन्तु मैंने उनसे इतना अवश्य कहा कि यदि आपकी बहू भी इसी मत की पक्षधर हो तो आप क्या करेंगी?क्योंकि उनका एक छोटा बेटा भी है ।
    उनकी एक शर्त और भी है कि वह दहेज नहीं देंगे क्योकि उनकी बेटी नौकरी करती हैं ।
  • मुझे तो दोनो पीढ़ियों को देख कर ऐसा ही लगता है जैसे-
  • शेर शिकारी से डरता है,और शिकारी शेर से।
  • दोनों ही निशाना साधें पहले आक्रमण करने का अवसर तलाश रहे है। 
    अब प्रश्न यह उठता है कि बेटियों की इस सोच का दोषी कौन है? बेटी की माता या बेटी या कोई और ।
    मुझे ऐसा लगता है कि दोनों ही पूर्णता दोषी नहीं है ,कहीं ना कहीं दोष हमारी पहली पीढ़ियों का भी है ।उनकी दकियानूसी सोच, विचारधारा और रीति-रिवाजों का है ।जहां पुत्र की शादी करने पर पुत्र की माता को तानाशाही का अधिकार मिल जाता है।
    वह भी अपनी बहू से वैसा ही व्यवहार करने लगती है जैसे कि शायद पहले कभी उनके साथ हुआ था ।यदि वह विचार करे कि जिस व्यवहार से उनको दु:ख होता था ,आज किसी और को भी हो सकता है तब शायद वह अपने व्यवहार में कुछ परिवर्तन करने का प्रयास अवश्य करेंगी।
    कुछ दोष तो घर के पुरूषों का भी है,जो यह सब होता देख भी आँखे बंद किये रहते है।
    मुझे ऐसा लगता है कि इस सोच और विचारधारा को बदलने और समाज के नवनिर्माण में हमारी पीढ़ी के योगदान व प्रयास की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।यदि सभी बेटियों की यही विचारधारा हो जाएगी तो समाज कहां जाएगा?कौन सोच सकता है?
    विचार करें, प्रयास करें ।
    ।। श्री हरि भगवान की जय ।।

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Karuna Om

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