“प्रभु, मंगल अभिषेक का समय निकट आ रहा है। लेकिन आपकी आज्ञा अभी तक प्राप्त नही हुई।” महादेव के इशारे पर नंदी ने कुछ ऐसे नाटकीय ढंग से प्रार्थना की कि देवी माँ उनके सारे संवाद को सुन भी ले और ऐसा भी लगे की यह बात माँ के सामने नही की जा रही।

मंगल अभिषेक वो शुभ महूर्त होता हैं जब स्वयं महादेवी, १५ नित्याये, योगिनियाँ, सभी प्रकार के गण, प्रेत- पिशाच और सभी चिंतामणि गृह के निवासी महादेव का अभिषेक करते थे। इस अभिषेक को अर्पित करने का अधिकार देवतायों, दैत्यों या अन्य किसी लोक के निवासियों का नही था। यह विशेष अधिकार केवल शिव प्रजा का था जो कि सब तरफ़ से बहिष्कृत थी। केवल अतिथि के रूप में भगवान विष्णु माँ लक्ष्मी सहित और श्री ब्रह्मा माँ सरस्वती सहित आमंत्रित किए जाते थे, जो कि स्वयं शिव-शक्ति का ही स्वरूप थे।

उत्सव 2मंगल अभिषेक की परंपरा देवी माँ ने ही आरम्भ की थी। यह अभिषेक महादेव के कैलाश पर जाने से पहले एक महासेवा और उत्सव के रूप में किया जाता था। इसलिए भी ताकि सभी को समान भाव से महादेव के अभिषेक का सुअवसर प्राप्त हो सके। यह अभिषेक श्रावण मास के सोमवार से आरम्भ होता था। सबसे पहले देवी माँ भगवान पशुपती की जटायें खोलती थी, और उनको सुलझा कर नाना प्रकार के सुगंधित द्रवयों से स्नान करवाती। फिर महादेव के सुकोमल अंगों का अभिषेक किया जाता था।

देवी पार्वती के पिता हिमवान १००००८ प्रकार की हिमायल की दुर्लभ जड़ी-बूटीयां उपहार स्वरूप में अपने पूज्य जमाता महादेव के अभिषेक के लिए प्रस्तुत करते थे। इन्हीं जड़ी-बूटीयों से भिन्न भिन्न प्रकार के सुगंधित उपटन बनाये जाते थे। यह उपटन इतनी भारी मात्रा में बनाए जाते थे कि महादेव का प्रसाद सभी को प्राप्त हो ताकि सभी जन सदैव नित्य यौवन में और निरोग रहे।

अभिषेक के समय बहुत प्रकार की क्रीड़ायें की जाती थी, दिव्य संगीत का आयोजन होता था। इस संगीत में केवल मृदंग, डमरू, सितार और भिन्न भिन्न प्रकार के नगाड़े बजाए जाते थे। और सबसे दिव्य संगीत स्वर वो होता था, जब देवी गंगा केवल जटायों में ना बह कर एक झरने के स्वरूप में भगवान महादेव के शीश पर गिरती थी। केवल झरने और महादेव के डमरू के संयोग से ऐसा संगीत उत्पन्न होता था कि उस समय वो दृश्य देख कर वहाँ का हर कण, जल चर, सभी जन और यहाँ तक की पेड़ पौधे तक समाधिष्ट हो जाते थे।

तभी तो शिवलोक में शिवशक्ति के सान्निध्य में सभी विरक्त और समाधि में स्थित रहते थे।

“नंदी, मैं सोच रहा हूँ, इस बार मंगल अभिषेक ना ही किया जाए। देवी ज़्यादातर खिन्न रहती है। तो ऐसे में उत्सव मनाना शोभा नही देता। और देवी के समान कोई दूसरा नही है जो मेरी जटायों को स्पर्श भी कर सके, तो॰॰॰”

“क्यों, उत्सव क्यों नही होगा?” माँ ने बिना किसी औपचारिक्ता के दोनो की बातचीत में बोला “मैं खिन्न नहीं हूँ, बस थोड़ा चिंतन कर रही हूँ। आपका मंगल अभिषेक तो अवश्य होगा।“

पहला तीर निशाने पर लगा देख कर महादेव और नंदी के मुख पर एक छोटी सी मुस्कुराहट आ गयी।

“नंदी, आप महाराज हिमवान के यहाँ वासुकि को विशेष उपहार देकर भिजवाए और मंगल अभिषेक की सूचना प्रदान करें।

१५ नित्यायें विष्णु लोक और ब्रह्म लोक में आमंत्रण लेकर जाएँगी। और आप स्वयं यहाँ रह कर अभिषेक की तैयारी आरम्भ कीजिए।“ माँ ने अपनी गृहस्ती का दायित्व संभालते हुए कहा

महादेव यह सारा दृश्य मौन हो प्रसन्नचित्त होकर देख रहे थे। जब पुरुष प्रसन्न हो और मौन भी तो यह समझ लेना चाहिए कि वो अपनी आगे की योजना पर चिंतन कर रहा है।

मंगल अभिषेक की सूचना सारे चिंतामणि ग्रह में आग की तरह फैल गयी। सभी निवासियों में इतनी उमंग थी कि ऐसा लग रहा था कि यहाँ कई करोड़ों वर्षों के बाद बसंत आयी थी।

अगर कोई चीज़ बिना किसी संघर्ष के साथ मिल जाए तो वो चीज़ सामान्य ही लगती है, लेकिन कई प्रयत्नों के परिश्रम से जो चीज़ प्राप्त होती है, उसका मूल्य कितने गुना होता है। प्रकृति का यही नियम प्रसन्नता के पलों पर भी चलता है।

माँ अपने सौम्य स्वरूप में पुनः आ चुकी थी। समय बहुत ही कम था और दायित्व बहुत ही अधिक, तो किसी के पास सोचने का समय ही नही था। सभी मुख्य सेवक न्यौते आदि के लिए प्रस्थान कर चुके थे। कुछ सेवक महा अभिषेक की सामग्री जुटाने के लिए लग गये थे। नगर निवासी नगर की सफ़ाई और साज सज्जा में लग गये थे। महादेव के गण उस स्थान को तैयार करने में लग गये थे जहाँ अभिषेकम समारोह होना था।

स्त्रियाँ उस दिन के मंगल गान की तैयारी में लग गयी थी और उनकी अध्यक्ष कालिंदी थी। दिन रात गायन का अभ्यास चल रहा था।

सारे चिंतामणि ग्रह में अगर कोई व्यस्त नही था तो वो सिर्फ़ महादेव थे। क्यों कि वे ही तो इस पावन समारोह के नायक थे। सभी को इतना व्यस्त करके, महादेव स्वयं मौन में इन क्षणों का आनंद उठा रहे थे। अभी किसी के मुख पर कोई उदासी नही थी, भय नही था और सबसे अच्छी बात यह थी कि कोई भी छोटा-बड़ा मुद्दा लेकर महादेव को के पास नही आ रहा था, सभी माँ के पास ही जा रहे थे। कुछ इसलिए भी कि माँ बहुत देर के बाद सभी के लिए उपलब्ध थी। बहुत लम्बी उदासी और संघर्ष के पलों के बाद अब उत्सव का समय आया था। 

महादेव अगर औपचारिक्ता में किसी को कुछ कहने भी लगते तो एक ही उत्तर मिलता, “ अभी नही नाथ, बाद में सेवा में हाज़िर होता हूँ। अभी अत्यधिक व्यस्त हूँ।”उत्सव 3

एक दिन संयोग वश कुछ ऐसा हुआ कि माँ ने महल के सभी सेवक-सेविकायों में भी इतनी सेवा बाँट दी थी कि भोग बनाने के लिए भी रसोई घर में कोई ना रहा। आज माँ को ही स्वयं महादेव, कार्तिक और गणेश के लिए भोग बनाना था। सुन कर महादेव तो बहुत प्रसन्न हुए, गणेश की माँग सूची बढ़ती ही जा रही थी और कार्तिक माँ की मदद के लिए उपस्तिथ था।

आज माँ ने अरसे के बाद सभी के लिए बहुत ही अच्छा भोजन बनाया था। रसोई घर में सिर्फ़ चार लोग थे। महादेव, माँ, कार्तिक और गणेश। महादेव, अपने अभिन्न अंग सब बाहर ही छोड़ कर आए थे- अपना त्रिशूल, डमरू, रुद्राक्ष की मालाए, गंगा और अर्धचन्द्र। रसोई घर में केवल महादेव ही खड़े नज़र आ रहे थे। वह माँ की कुछ मदद करना चाहते थे लेकिन छोटे से गणेश से प्रेम से बलपूर्वक महादेव को आसन पर बिठा दिया और पीछे से महादेव के गले में अपनी दोनो बाजुए डाल कर बच्चों जैसे खेलने लगे।

माँ और कार्तिक जल्दी जल्दी सुगंधित भोजन को परोसने की तैयारी में लग गये। गणेश ने अपनी बुद्धिमता से चार पहियों वाली चौंकी ली। फिर उस पर सारा समान रख कर परोसने वाली जगह पर बिना किसी परिश्रम के ले आया। गणेश की कार्य करने की फुर्ती देख कर महादेव और माँ हँस पड़े।

माँ महादेव को खीर परोसने लगी, कार्तिक को दही और चावल और गणेश को तिल के मोदक।

“माँ, यह मोदक को बहुत ही स्वादिष्ट बने है। मुझे लगता है ऐसे मोदक मैं पहली बार खा रहा हुँ।”

To be continued…

           सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके। 

           शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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