बचपन से ही मेरी प्रकृति कुछ इस तरह रही है कि हर किस्म के लोगों से मिलना जुलना या उसके साथ तालमेल बैठा पाना मेरे लिए उपयुक्त नहीं रहा है। शायद मेरा सौभाग्य है कि मैं अपने शरीर की ऊर्जा शक्ति  या उसके औरा को अन्य किसी के संपर्क में नहीं आने देना चाहता हूं और अन्य किसी के औरा से स्वयं को संपर्क नहीं होने देना चाहता हूं।इसका एक जबरदस्त लाभ हमें मिलता है जो हमारे साधना में हमारे लिए सबसे उपयोगी साबित होता है। 3 मार्च 2021 से पहले जब मैं विद्यार्थी जीवन में था तब भी मेरा अपना एक एकांत कमरा हुआ करता था और उसमें मैं स्वयं भोजन बनाता था अपने कमरे में जिस किसी को भी प्रवेश नहीं करने देता था हमारे बेड या कुर्सी  पर हर कोई नहीं बैठ सकता था और इस तरह से मेरी जो अपनी साधनात्मक उर्जा जिसे विज्ञान की भाषा में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी कहते हैं वह मुझे अपने व्यक्तित्व को सुदृढ़ करने में मददगार साबित होती थी।

 

                 आज मै   हिमालय में रह रहा हूं फिर भी पटना के उस कमरे में जो मेरी सकारात्मक ऊर्जा मुझे सहयोग देती थी ,ऊर्जा का वह स्तर मुझे यहां नहीं मिल पा रहा है इसका एक ही कारण है कि जिस जगह अभी मैं रह रहा हूं वहां पर अन्य लोगों की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी पहले से छाई हुई है और यहां मुझे उस रूम में रहना पड़ रहा है जहां पहले कोई रह रहा था और दूसरे के हाथ का बना हुआ भोजन खाना पड़ रहा है तो जाहिर सी बात है कि जो मेरी उर्जा पटना के मेरे स्टडिरूम में मुझे बेहद समर्थन प्रदान कर रही थी साधना की ऊंचाइयों को प्राप्त करने में ,वह यहां उपलब्ध नहीं हो पा रही है भले ही या हिमालय का क्षेत्र है फिर भी।

 

           मैंने बहुत पहले युग ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य की एक पुस्तक पढ़ी थी इसे कोई भी पढ़ सकता है इसका नाम है “माननीय विद्युत के प्रत्यक्ष चमत्कार”! इस पुस्तक में उन्होंने बताया था कि हमारी जो शरीर की सकारात्मक ऊर्जा है उसे हमें संरक्षित करना चाहिए हर किसी के संपर्क में आने से उस उर्जा का क्षय होता है।अगर हम जीवन में साधना करके ऊंचाई प्राप्त करना चाहते हैं तो यह नियम हमें अवश्य ही अपने जीवन में धारण करनी चाहिए। हर किसी मनुष्य के शरीर से एक ऊर्जा निकलती रहती है जिसे विज्ञान की भाषा में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स या विद्युत चुंबकीय ऊर्जा कहते हैं वह एक चोर के शरीर से भी निकल सकती है और एक साधक के शरीर से भी निकलती है तो जो अपने आप को शुद्ध करके जीवन में अध्यात्मिक ऊंचाइयों पर जाना चाहते हैं उन्हें अपने उस सकारात्मक ऊर्जा को संरक्षित करना चाहिए उन्हें जिस किसी भी मनुष्य के साथ बहुत घुलमिल करके नहीं रहना चाहिए उन्हें यथासंभव अपने वस्त्र अपने भोजन अपनी थाली अपने कपड़े या अपने और भी जो सामग्री हैं उन्हें व्यक्तिगत तौर पर ही प्रयोग करना चाहिए।हमारे सनातन धर्म में हवन की जो पद्धति बताई गई है उसके पीछे यही विज्ञान है कि हम जिस कमरे में रहते हैं या जहां प्रवेश करना चाहते हैं वहां अगर कोई नकारात्मक ऊर्जा है तो हवन के प्रभाव से वह या तो कम हो जाएगा या खत्म हो जाएगा। हमारे सनातन धर्म में जो तुलसी के पौधे को रोकने या लगाने की बात कही गई है उसके पीछे यही विज्ञान है कि जिस जगह तुलसी का पौधा होता है वहां ऑटोमेटेकली नेगेटिव एनर्जी छनकर के शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है ।शंख की ध्वनि करने से भी जहां तक शंख ध्वनि या घंटे की ध्वनि जाती है वहां सकारात्मक उर्जा का प्रवेश होता है या फिर अगर हम घी के दीपक जलाते हैं तो वहां का वातावरण स्वभाविक तौर पर सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है और नकारात्मक ऊर्जा का क्षय होता है। कोई भी व्यक्ति वह जस प्रवृत्ति का है वह जिस कमरे में रहता है या जिस कपड़े को पहनता है उसका कपड़ा या उसका कमरा उसके शरीर से निकलने वाली ऊर्जा से पूरी तरह चार्ज हो जाता है अतः अगर हम अपने कुछ रिश्ते बनाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से हमें अपनी इस सकारात्मक ऊर्जा का संरक्षण करते हुए ध्यान पूर्वक बात आगे बढ़ान करना चाहिए।

 

         एक उदाहरण के तौर पर समझा रहा हूं मान लो अगर कोई मरीज है उसने कई दिनों तक कोई कपड़े पहन रखा है, उसके कपड़े को अगर कोई स्वस्थ इंसान पहने तो संभावना है कि वह भी रोगी हो सकता है इसका कारण मैं ऊपर स्पष्ट कर चुका हूं क्योंकि हर किसी व्यक्ति के लिए एक अलग ऊर्जा शक्ति होती है उसकी एक अलग क्षमता होती है उसके शरीर से एक अलग किस्म की विद्युत चुंबकीय ऊर्जा निकलती रहती है जिस वजह से उसका आभामंडल उसके कपड़े उसके कमरे सब चार्ज रहते हैं अब अगर वह नेगेटिव ऊर्जा वाला है तो उसकी सारी वस्तुएं नेगेटिवली चार्ज रहेंगी अगर उन चीजों को कोई स्वस्थ इंसान उपयोग में लाए तो वह भी नेगेटिव तरीके से चार्ज हो जाएगा।

 

            हमने स्वामी जी की भी एक वीडियो देखी थी जिसमें उन्होंने भोजन की शुद्धता, दृष्टि की शुद्धता, श्रवण करने की शुद्धता, स्पर्श करने की शुद्धता इत्यादि का वर्णन किया था उन्होंने समझाया था कि हम सिर्फ मुख से ही नहीं खाते हैं हम आंखों से खाते हैं स्पर्श करके भी खाते हैं त्वचा से खाते हैं कान से खाते हैं तो इस तरह से हमें इन चीजों को अगर शुद्ध कर लेने की प्रवृत्ति अपने में आ जाए तो निश्चित रूप से हम अपनी इस समय की ऊर्जा को और अधिक उन्नत कर सकते हैं पर साथ ही हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि जो हमने अपनी सकारात्मक ऊर्जा को उन्नत कर ली है उसे कोई नेगेटिव तरीके से डिस्चार्ज ना कर पाए यह ख्याल हमें रखना पड़ेगा और इसके लिए हमें बेहद ही चौकन्ना रहना पड़ेगा सिर्फ उन्हीं लोगों के संपर्क में रहना पड़ेगा जिसकी ऊर्जा शक्ति उच्च स्तर की है या फिर अकेले रहना पड़ेगा ताकि हमारे ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत हम पर लागू हो सके  जय श्री राधे श्याम।🌴🌴🌿🌿🌹🌹🌼🌼🌻🌻🌷🌷

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Ashu Harivanshi

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