बंदि वो खास है ,
मेरे दिल के पास है ।
जब भी कलम उठाती है ,
एक नई रचना बनाती है ।
हर बार नई , हर बार अनोखी
उसकी कविताओं का क्या कहना ,
अध्यात्मिकता उसके कण कण में है ।
अपने शिव की है वो लाडली दुलारी
स्वामीजीं की है वो गुडिया सयानी ❤️❤️

जब से यशोधरा ने चूड़ामणि उतार दिया और भिक्षुणी हो गयी है , इसके मन में अंतर्द्वंद्व चल रहा है ।
धधकती लाश के उपर रेंगते उस धूसर धूएँ में सच सबसे साफ़ नज़र आता…है उसे ।
भीषण वैराग्य में हर समय मृत्यु को याद रखती हैं वो ।
सहज समाधी में लीन प्रेम से मोक्ष की ओर चली जाती है ।

वो ,
किसी अतृप्त आत्मा-सी ,
कल्पों से भटक रही हैं ।
निज मन में ब्रह्माण्ड समाये,
विष प्याले से गटक रही हैं ।

जीवन-मृत्यु चक्रव्यूह की अभिमन्यु बन बैठी हैं ,
इच्छाओं को पोषित कर रक्तबीज जन बैठी हैं ।

सेवा परमो धर्मः है उसका सत्य संकल्प ।
संसार, प्रेम, धन चाहने जाती हैं वो और माँग बैठती हैं ध्यान, वैराग्य, त्याग, ज्ञान । वह जानना चाहती है , कौन सी माया है यह उस भुवनेश्वरी की? !
ब्रह्म – ज्ञान से माया से महामाया की ओर चल पडि है वो ।
आइना : ख़ुद से ख़ुद की मुलाकात करवाती है वो ।
खुद से बाँधी ज़ंजीरो और समाज की लादी उम्मीदों से परे हमारा असली स्वरुप क्या है? समझाती है वो ।
कहती है प्रेम संपूर्ण समर्पण नहीं तो प्रेम और कुछ भी नहीं ।
अपने गुरू से वो कहती है ,
अगर मेरे सामने तुम बुद्ध-रूप में रहो,
तो मुझे १०० जनम आनंद होना मंज़ूर है ।

एकांत और भक्ति में उसके शब्द है ,
मुझपे करम सरकार तेरा, अरज तुझे कर दे मुझे, मुझसे ही रिहा ।
उसके अनमोल वचन है ,
भीतर की अनंतता ही एक मात्र सत्य है । जीवन और मृत्यु दोनो भ्रम है ।
उसके मौन और एकांत की सांझा रचना है ,
गुरु : एक परम चेतना 🙏
गुरु में ईश्वर की पूर्णता होती है । वरना वो गुरु नहीं होते ।

रहस्यों का शहर है , उसका जबलपुर !
शिव उसे हमेशा ही अचंभित कर देते हैं । उसकी भावना का त्रिशूल-भेद है , कैसी अद्भुत शक्ति है शिव ! नंगे शरीर में भस्म की चादर ओढ कर ज़िंदगी का सच बता रहे हैं ना जाने कितने ही कालों से ।
वीरानों की खूबसूरती उसके मन में उतरती है ।

वो ,
जाने किस मौन में यूँ बहा करती है ,
भरे बाजार अकेले में रहा करती है ।

तत्- त्वं- असि ( उसके शब्द )

भक्ति अपने चरम में अद्वैत हो जाती है । भक्त और भगवान उस चरम पर अभिन्न हैं ।

पुरुष-प्रकृति और प्रेम ( उसके शब्द )

प्रेम में आप किसी को बांधते नहीं । यह वह बंधन है जो आपको हर बंधन से मुक्त कर देता है ।

अपने गुरूदेव को खत में वो लिखती है ,
मैं कुछ भी नहीं जो मैं “तुम” नहीं ।
भीड़ से परे हट कर अब, भीतर खुद के झाँक लेती है वो फिर बोलती है …और ज़िन्दगी सुलझ गयी !
माँ की बातें सुनाती है , स्वामीजी जानें स्वामी की माया कहती रहती है वो ।
कैसा नाच रहा इंसान! दिखाती है वो ।
मोक्ष की आकांशा नहीं, सानिध्य का वरदान दो! – अपने स्वामी से मांगती है वो । इसी में उसके जीवन की सार्थकता है ।
अपने मां का गुणगान करती है वो ।
सरल प्रेम की जटिल कहानी ! सुनाती है वो ।
परम पुरूष की व्याख्या बताती कभी कभी Chatterbox ‘मौनी-बाबा’ बन जाती है वो ।
‘स्व’ से विद्रोह। ‘अहम’ से विद्रोह। स्वयं से विद्रोह कर साधना, संन्यास और मोक्ष का रहस्य बताती है वो ।

उसने ,
स्व से स्व की
तिलांजलि दे दी ।
खुदको खोकर,
शिव पाया !   

सचमुच वो बडि किस्मतवाली है ।

गेरुआ आसमान ओढ़े, उसका मालिक रूहानी है !
उसके लिए गुरु प्यार है…गुरु प्यार है !
उसे माँ तो चाहिए पर कैसे ये कौन बताये ! 
एकांत में आध्यात्मिक खिचड़ी पकाती है वो ।
रूह सवारती हैं । कर्म सवारती हैं । मिज़ाज और conduct सवारती हैं ।
गुरूदेव के ‘गब्बर’ सवाल पर विचार करती है वो ।
मैं उसे कहना चाहती हूं , स्निग्धा तुम गज़ब Paradox मचायी हुई हो । जरूर तेरा और मेरा एक अनकहा रिश्ता है ❤️❤️

प्रिय स्निग्धा , मैं आप हि के शब्द आपको समर्पित कर रहि हूं 🙏 मैं कई बार आपके बारे में विचार करती हूं और मेरे मन में भी वहि सवाल आता है , “इतनी छोटि उमर में ऐसा गहरा वैराग्य कहाँ से आ जाता है तुम में?” मुझे आपकी अध्यात्मिक रचनाएं बहुत पसंद है । आप ऐसे हि हमारे साथ आपके विचार share करते रहिए यहि मेरी आपसे प्रार्थना है 🙏🌷🌷🌷🌷🌷

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Amruta

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