कौन है यहाँ किसी का,
बहुत जल्दी यह एहसास हुआ।
कहने को तो सब है अपने,
पर क्या कभी कोई ख़ास हुआ।
बड़े ही बेदर्द है यहाँ सब,
जखम देकर पूछे क्या दर्द का एहसास हुआ।
कैसे ब्यान करूँ उस दर्द को ,
जो खुद मेरे अपनों का दिया हुआ।
अब दिल कहता है छोड़ सबको ,
जिनसे यह मोह – माया का एहसास हुआ।
सुना था बड़ी मतलबी है ये दुनिया,
लगी थोड़ी देर पर चलो यह एहसास तो हुआ।
ये एहसास भी अपने आप में ख़ास है ,
जिससे अपने अस्तित्व का एहसास हुआ।
वो सच जो ना जान पाए हर कोई,
और जिसने जाना फिर कोई ना उसके लिए ख़ास हुआ।
है सब ये मोह- माया ,
इन बंधनो से वो आज़ाद हुआ।
बस अब है हर कोई अपना है,
ना कभी परायेपन का एहसास हुआ।
है बस अपने “स्वामीजी”,
जिनसे ये तुच्छ भी ख़ास हुआ।

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Jasmeet Kaur

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