ओ कबूतर… जा हिमाचल।💕

धरती की जन्नत पर जा, 

एक सुंदर दुनिया बसती जहां।

उस पावन धरा पर उड़कर जा,

कल कल बहती शीतल गिरी नदी जहां।

ओ कबूतर ….. जा हिमाचल।💕

जाकर करले अपना बसेरा ,

वहां किसी एक झाड़ पर।

हों जाएगी धन्य वहां पाकर,

मेरे स्वामी और श्री हरि के दर्शन।

ओ कबूतर……जा हिमाचल।💕

प्यारी सी है उनकी सूरत,

भाव सरल सा, मुख चन्द्र सा।

प्रेम और करुणा की मूरत,

बरसाते सब पर अपनी कृपा रस।

ओ कबूतर……जा हिमाचल।💕

मै तो हूं बंधन मे यहां,

चाहूं फिर भी जा ना सकूं।

तू तो है मुक्त मगर,

कर ना व्यर्थ समय अपना।

ओ कबूतर…..जा हिमाचल।💕

ईर्ष्या होती मुझे तुम सबसे,😏

जब उड़ते देखूं तुम्हे मुक्त गगन पर,

काश मेरे भी पर लग जाते,

मै भी भरती अपनी उड़ान फिर।

ओ कबूतर….जा हिमाचल।💕

यदि बन जाऊं मै तुझ जैसी तो,

जाकर के उस दिव्य धरा पर,

करूं शुक्रिया उनको बार बार।🙏🙏

करती बसेरा उस वृक्ष पर,

जो होता ठीक उनके घर के पास।

ओ कबूतर….जा हिमाचल।💕

जब वो करते रहते काम अपना तो,

चुपके से निहारती उनको बैठे एक मेज पर।

जब वो चलते, संग संग उनके उड़ती चलती ।

जब वो खाते, तो मुझे भी अपना खाना देते।

जब वो सोते, तो मै उनकी करतीं देखभाल।

ओ कबूतर….जा हिमाचल।💕

अपनी इन दोनों आंखो से,

आरती करती उनकी शामो – सहर।

वो है मेरे सपनो का शहर😍,

जहां रहते मेरे प्रियवर❤️।

ओ कबूतर…..जा हिमाचल।💕

मत कर अपना व्यर्थ समय अब,

ओ कबूतर……जा हिमाचल।💕

Thank you for reading 🙏😊.

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Abha

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