सब जानते हैं इस बात को कि ईश्वर ने हमें यह मनुष्य का जन्म कुछ विशेष उपलब्धि प्राप्त करने के लिए दे रखा है पर कुछ ही इंसान इस सत्यता को अपने जीवन में स्वीकार कर पाता है और स्वीकार भी कर ले तो उस सत्य के मार्ग पर चलना हर किसी के लिए संभव नहीं हो पाता। क्योंकि यह मार्ग भी चुनौतियां और तकलीफों से भरा हुआ होता है ।हर किसी को यही लगता है की दूसरों का जीवन मेरे से बेहतर है, दूसरों की जॉब मेरे से बेहतर है, दूसरों की फैमिली मेरे से बेहतर है दूसरों के लाइफ स्टाइल का तरीका मेरे से बेहतर है। मतलब हम पूरी जिंदगी एक दूसरे से अपनी तुलना करने में बिता देते हैं लेकिन सच यह है कि जब हम करीब से किसी के जीवन में जाते हैं तो मालूम चलता है कि उनके पास भी टेंशन का एक लंबा सा रजिस्टर पहले से भरा हुआ है।

               22 मई से एक दीदी मेरे से बात कर रही है जिनका नाम निशीथा है और उनको मेरा नंबर मेरे यूट्यूब चैनल से मिला था। उनका लक्ष्य तो अत्यंत ही महान है वह ईश्वर की प्राप्ति के लिए जीती हैं और कोशिश करती हैं कि उनका निरंतर भगवान का नाम जब चलता रहे और वह दिन-रात कलम से भगवान का नाम लिखते रहती हैं। उनकी आयु करीब 35 वर्ष की होगी। हमने तो आज तक पूछा भी नहीं पर उन्होंने बताया एक लड़की भी है 12 साल की। उनकी समस्या यह है कि वह शारीरिक और मानसिक रूप से इतनी ज्यादा तकलीफों में जी रहीहैं जिसका वर्णन सुनकर कोई भी दुखी हो जाए ।सर से लेकर के  पैर तक उनके शरीर में सिर्फ और सिर्फ बीमारी ही बढ़ी हुई है। वैसे तो मैं प्रयास कर रहा हूं किसी से भी व्यक्तिगत व्यवहार नहीं बढ़ाने के लिए क्योंकि मुझे वैराग्य की प्रैक्टिस करनी है ।इसलिए मैंने अपने सारे जान पहचान वालों को ब्लैक लिस्ट में डाल दिया पर इन्हें नहीं डाल पाता क्योंकि यह हमें कहती हैं कि भाई जब आपसे बात करती हूं तो एक हिम्मत सा मिलता है ।मेरे पास जो भी थोड़ी बहुत नॉलेज है मैंने जो कुछ भी किताबो में पढ़ रखी है उस  के आधार पर मैं इन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ करने के तरीकों को बताता हूं। पर सच्चाई यह है कि जब शरीर पूरी तरह से रोग से ग्रसित हो शरीर का एक भी अंग रोग से ,दर्द से भरा हो तो उस स्थिति में कुछ भी  सलाह काम नहीं करता ।चाहे आप उन्हें कितनी भी अच्छी से अच्छी सलाह दे दो कितना भी उसके लिए मोटिवेशनल बातें बोल दो। कितना ही उन्हें पॉजिटिव सोच रखने के तरीके सिखा दूं कितना ही उनका मनोबल बढ़ा दो लेकिन फिर बात जस की तस ही रह जाती है ।इसीलिए कभी-कभी लगता है कि रोग एक ऐसा कारण है जो सब कुछ रहते हुए भी इंसान को जिंदा लाश बना कर रख देता है ।वास्तव में उनसे बात करता हूं तो वह सिर्फ और सिर्फ आपकी बात ही करते हैं वो कहते हैं कि मेरे लिए प्रार्थना करो कि मैं जल्दी से मर जाऊं आप सोच सकते हो ना जो रात रात भर जागते हैं उन्हें नींद नहीं आती। पूरे शरीर में सुई चुभोने जैसी दर्द होती है । उन्हें कई तरह की बीमारियां हैं जिसके मैं यहां नाम भी नहीं लिख सकता और सबसे बड़ी बात है कि मस्तिष्क में एक अजीब सा डर उनको भरा हुआ रहता है ।कहीं ऐसा ना हो जाए कहीं वैसा ना हो जाए ।ना किसी से मिलती है ना घर से निकलती है ।हर किसी पर सबसे पहले उन्हें संदेह ही होता है ।बचपन में शायद कोई ऐसी घटना घट गई है जिसकी बदौलत उनके दिमाग में डर इस कदर बैठ गया है कि उन्हें किसी पर विश्वास नहीं होता ।पता नहीं कहां से उनको मेरा नंबर मिला और हमसे बात करती है तो कहती हैं आप पर विश्वास होता है पर मैं अब इस दीदी को कहां तक विश्वास दिला पाऊंगा एक बुक पड़ी थी हमने इसका नाम था the power of your subconscious mind by Joseph Murphy इस तरह की और भी बहुत सी पुस्तकें मैंने पढ़ी थी जिसमें यह बताया जाता है कि हम जो भी विचार पूरी दृढ़ता के साथ करते हैं वह हमारे अवचेतन मन में यानी सबकॉन्शियस माइंड में पूरी तरह से फिट हो जाता है और हमारे प्रैक्टिकल लाइफ में भी वैसी ही घटना घटने लगती है। अब क्योंकि इन्होंने इतना ज्यादा स्वयं के बारे में नकारात्मक चिंतन किया है इतना ज्यादा इन्हें डर का चिंतन करना पड़ा है इतना अधिक इन्हे समस्याओं का चिंतन करना पड़ा है रोगों का चिंतन करना पड़ा है कि मैं इन्हें लाख समझाऊं कि आप इसके विपरीत सकारात्मक चिंतन शुरू कर दो स्वास्थ्य के चिंतन शुरू कर दो, प्रसन्नता के चिंतन शुरू कर दो ईश्वर की कृपा के बारे में सोचना शुरु कर दो लेकिन इनसे यह बात अब नहीं हो पाती क्योंकि एक तो शरीर अत्यधिक रोगी है दूसरा मानसिक रूप से भी बहुत ही दुर्बल हो गए हैं। चुकी इनका लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति का है इसलिए इतने महान लक्ष्य में अगर मुझे इन से बात करने का सौभाग्य मिल रहा है तो मैं कर लेता हूं अन्यथा तो मैं अपनी बहन से भी बात नहीं करता आजकल।

  • कुल मिलाकर बात इस जगह आ जाती है कि हमारे पास सुख-सुविधाओं का कितना ही भरमार क्यों ना हो अगर हमारा स्वास्थ्य गड़बड़ है तो सारी सुख सामग्री हमारे लिए बेकार साबित होती है ।हमारा नौकर मस्त खा पी  करके मस्ती से सो जाता है और उसे भोजन पच भी जाता है लेकिन जो घर के मालिक होते हैं उन विचारों को नींद की गोली खानी पड़ती है, या कोई इंजेक्शन लेना पड़ता है। सही कहा गया है कि पहला सुख निरोगी काया का होना होता है। मैंने इन्हें बहुत समझाया कि मैं अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा उत्तम विचार रखता हूं और खुद के दिमाग में अच्छी तरह से फिट कर रखा है कि आशुतोष बेहद ही स्वस्थ और प्रसन्नता से युक्त है और इस सोच का मेरे स्वास्थ्य पर बिल्कुल वैसा ही असर पड़ता है। तो अगर आप खुद के दिमाग में इस बात को डालते जाओ कि आप भी धीरे-धीरे स्वस्थ होते जा रहे हो ,प्रसन्नता से युक्त होते  जा रहे हो तो आप की यह स्वीकारोक्ति आपके लिए चमत्कारी ढंग से काम करेगी और इसके साथ ही आपका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता चला जाएगा। बात तो मैं उन्हें बिल्कुल ही दमदार समझा रहा हूं जो मैंने महान लेखकों की पुस्तकों में पढ़ा लेकिन मैं उनके दुख और दर्द को महसूस नहीं कर सकता क्योंकि जो 24 घंटे ईश्वर से अपनी मृत्यु के लिए प्रार्थना कर रहे हों उनके कष्ट को सिर्फ और सिर्फ वही समझ सकता है जिसके साथ यह समस्या है। अब मैं उन्हें कैसे गाइड करूं, क्या उनसे  बात करना छोड़ दूं,,,,,,, यह मुझे भी समझ नहीं आता। यद्यपि मैं खुद को बुद्धिमान समझता हूं लेकिन जीवन में कभी-कभी ऐसे मोड आ जाते हैं कभी-कभी किसी ऐसे इंसान से पहचान बन जाती है जिनकी मैं कोई सहायता भी नहीं कर सकता,न हीं उसे इस मुसीबत में जहां उनकी मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं रहती उन्हें छोड़ना चाहता। वैराग्य की प्रैक्टिस कर रहा हूं ताकि मेरे जैसे इंसान के लिए किसी से व्यावहारिक रूप से अपनापन बढ़ाना भी उचित नहीं और अगर उन्हें एकाएक ब्लॉक कर दूं तो यह भी शायद अंतरात्मा की प्रसन्नता के विरुद्ध होगा ।कभी-कभी ऐसा मोड़ आता है जब छोड़ दूं या उनका साथ निभाओ इस तरह के असमंजस में पड़ जाता हूं
  •       वास्तव में स्वास्थ्य का सुदृढ़ रहना हमारे लिए बहुत आवश्यक बन जाता है। मैं जानता हूं कि वह बीमारी की वजह से कितना अधिक कष्ट सह रहे हैं इस बात को समझ पाना मेरे लिए संभव नहीं। जिस पर बीती है वही जानता है कि पूरे शरीर में और मस्तिष्क में रोग हो जाने पर क्या कष्ट होता है ।इसीलिए आयुर्वेद कहता है कि मनुष्य को पहले से ही सचेत रहना चाहिए हर किसी को प्रकृति के नियमों का पता रहता है ।पर अगर हम जानबूझकर उस नियम का उल्लंघन करते हैं तो प्रकृति हमें दंड देती है। पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमने कोई प्रकृति विरुद्ध आचरण नहीं किया फिर भी हमारे पूरे शरीर में रोग हो जाते हैं और हमारा जीवन नर्क जैसा बन जाता है। इसका एकमात्र कारण हमारा प्रारब्ध होता है ।तुलसीदास जी कहते हैं *****हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ*** अर्थात यह चीज हमारे पूर्व जन्मों के कर्म के आधार पर बने हुए प्रारब्ध के अनुसार आता है ।और इसे ना चाहते हुए भी हमें भोगना ही पड़ता है हमें उसका तत्काल कारण समझ में नहीं आता पर इन चीजों का हमारे पिछले जन्म के कर्मों से पूरा पूरा वास्ता रहता है। अगर हमें कोई सलाह दे सके तो उनका स्वागत है। जय श्री हरि 🌲🌼🌿🌳🌳🌻🌻🌹🌹🌱🌴🌼🌾🌾

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Ashu Harivanshi

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