सभी ॐ स्वामी परिवार के सदस्यों को मेरा प्यार भरा नमस्कार। आज अपनी एक बहुप्रतीक्षित कहानी लिखने जा रहा हूं जो 17 मई के शाम के वक्त की संघर्षपूर्ण कहानी है ।अक्सर मेरा मन प्रकृति को बेहद ही करीब से देखने के लिए मचलता रहा है और अपनी इस इच्छा की पूर्ति के लिए मैं करीब 40 दिन से हिमालय के दुर्गम और अत्यंत ऊंचे स्थान पर रह रहा था और वहां के ग्लेशियर, झड़ने ,नदियां ,पर्वत शिखर और जंगलों में घूम घूम कर उसकी वास्तविकता से खुद को परिचय करा रहा था। मैं जैसा कि पहले बता चुका हूं कि कभी-कभी जोखिम मोल लेकर भी किसी सच्चाई के तह तक जाना मुझे अच्छा लगता है ।मैं जानता हूं कि जिस रास्ते पर चलकर के मैं गया था वहां जाना हर कोई नहीं चाहेगा क्योंकि जो मार्ग खतरे से भरा हुआ होता है उस मार्ग पर सहज ही लोग चलने के लिए तैयार नहीं होते। तो अब मेरी वह संघर्ष पूर्ण कहानी पढ़ने के लिए तैयार हो जाएं
बद्रीनाथ से 20 किलोमीटर पहले पांडुकेश्वर का क्षेत्र है जहां मैं पिछले 40 दिनों से रह रहा था और अकेले ही कई ऐसी जगहों पर चला जाता था जिस जगह की भयावहता की वजह से वहां के मूलनिवासी भी वहां कभी नहीं जाना चाहते थे ।कई बार पहाड़ की कुछ स्त्रियों ने मुझे रोका और कहा कि बेटा उधर मत जाओ। उनका यह मना करना मेरे लिए मन में एक कौतूहल पैदा कर गया ।मैं सोचने लगा कि वह दूर घने जंगलों की तरफ दिखती हुई ऊंची ग्लेशियर की पहाड़ी और उधर जाने से मुझे उस स्त्री ने मना क्यों किया । 16 मई की रात जब मैं सोने के लिए गया तो बेड पर यही विचार मेरे मन में बार बार आ रहा था कि मुझे उस तरफ घने जंगलों में पहाड़ियों की तरफ जाने से क्यों रोका गया। फिर मैंने मन ही मन निश्चय किया कि कुछ तो बात होगा जो मुझे मना किया गया और जैसा कि मेरा स्वभाव है कि जहां हर कोई नहीं जाना चाहता है उस जगह जाकर के बेहद करीब से प्रकृति के रहस्य को जानने की हमेशा हमारी ख्वाहिश सही है।
अब अगले दिन 17 मई को दिन भर में विचार करता रहा और शाम होते ही निर्णय ले लिया कि मुझे उसी तरफ चलना है जिधर जाने से उस पहाड़ी वाली स्त्री ने मुझे मना किया था ।मैं पहाड़ की पगडंडी पर ऊपर चढ़ने लगा ।पगडंडी या चढ़ते चढ़ते ऊंचाई बढ़ने लगी और मेरे सांस फूलने लगे धीरे-धीरे वह छोटी वाली पगडंडी गायब होती गई और जंगल बेहद ही घना होता चला गया ।एक तरफ शाम गहराता जा रहा था और रात की आगोश में समा रहा था और दूसरी तरफ मेरा भी जुनून था कि सबसे टॉप वाली पहाड़ी पर चढ़ना ही चढ़ना है ।बेहद ही खतरनाक रास्ता था ।कहीं भी अगर पत्थर पर जरा भी पैर फिसल ले तो सीधे हजारों फुट गहरी झरने के तीव्र वेग से बहते हुए जल में गिरना सुनिश्चित था ।लेकिन फिर भी हिम्मत कर कर आगे बढ़ता जा रहा था अब शाम थोड़ी और धुंधली हो रही थी। रात के आगमन की सूचना मिल रही थी चलते-चलते जंगल और भी घना होता चला गया ,मैं बिल्कुल ऊंची ऊंची पहाड़ की तरफ बढ़ता जा रहा था जिधर जाने से उस स्त्री ने मुझे मना किया था ।मन में थोड़ा बहुत डर का भी समावेश हो चुका था लेकिन किसी भी चीज के तह तक जाने की मेरी जिद मुझे उस तरफ लिए जा रही थी ।अब जंगल इतना घना हो चुका था कि जंगल की जो कटीली झाड़ियां थी वह मेरे शर्ट में स्वेटर में और पेंट में चुभने लग गए थे।l कई कांटे तो मेरे स्लीपर को छेद करके मेरे पैर में भी घुस चुके थे। कई बार पत्थर की ठोकर से बचा और कई बार पत्थर से पैर फिसलते फिसलते बचा एक जगह तो पैर फिसल गया और कूद कर के नीचे खड़ा हो गया। लेकिन मरने से बच गया ।अब थोड़ी और चढ़ाई कठिन होती जा रही थी ।ठंड के माहौल में भी मैं पसीने से तरबतर हो गया था मेरी सांसे जोर-जोर से चल रही थी। इतना ही नहीं अब यह सोच कर कि मैं परेशान हो गया कि रात होने वाला है और मेरा लक्ष्य मुझे अभी तक मिला नहीं । मैं जितना ऊपर चढ़ता ऐसा लगता कि पहाड़ और भी ऊंचा हुआ जा रहा है। मुझे लगता कि अभी तो मैं इतना सा पहाड़ देख कर आया यह खत्म क्यों नहीं हो रहा है। लगातार में चढ़ाई कर रहा था मेरी सांसे बहुत तेज चल रही थी ,पसीने से तरबतर हो गया था ।मेरा स्वेटर पूरा पसीने से भीग गया लेकिन फिर भी मेरा जिद कम नहीं हो रहा था। अब एक ऐसा स्थान आया जहां ग्लेशियर पिघल कर के झरना नीचे की तरफ आ रहा था ।और एक खंडहर जैसा मुझे कुछ नजर आया। उस सबसे ऊंचे पहाड़ के करीब खंडहर के सामने जाते ही अचानक मेरा सर भारी हो गया सांसे मेरी जोर-जोर से चलने लगी। मुझे लगा कि शायद अब शरीर में जान नहीं बचा और दिमाग भी काम नहीं कर पा रहा था ।शरीर थक कर चूर हो चुका था और वहां का माहौल बिल्कुल खौफनाक मुझे दिख रहा था। इस बात को मैं ही समझ सकता हूं कि कैसा नजारा था मैं थोड़ा डर गया था ।जंगल इतना घना था कि ना आगे बढ़ पा रहा था ना दाएं या बाएं ।इसके साथ ही खंडहर जैसा माहौल था बड़ी -बड़ी गुफाएं थी और ढलती हुई शाम थी।जंगलों में तेंदुआ,भालू और बाघ के होने की पूरी सम्भावना थी।मेरे रहने वाली जगह के पास ही आश्रम के कुत्ते को कुछ महीने पहले बाघ ने मार दिया था। कुल मिलाकर के एक डरावना सा माहौल बन गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या करूं क्या ना करूं। एक बार फिर साहस किया एक मोटी सी जंगली लता को पकड़कर पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश की कुछ दूर तक तो ऊपर चढ़ा लेकिन फिर लगा कि नीचे उतरना चाहिए क्योंकि आगे रास्ता बंद था ।जंगल और भी घना हो चुका था नीचे उतरते समय एक पत्थर पर पैर रखा वह पत्थर अपनी जगह से हिल चुका था। अब मैं समझ गया कि पहाड़ से नीचे गिरना मेरा तय है। मैंने पत्थर से पैर उठाया और पूरी ताकत से उस झाड़ी की लता से लटक गया और उस लता के सहारे फिसल फिसल कर किसी तरह 5 फुट नीचे उतरा। नीचे उतरने के बाद कुछ देर बैठ गया।सोचा कि उसके मना करने के पीछे जरूर कोई कारण होगा।मुझे जल्दी निकलना चाहिए।रात हो जाएगी तो कुछ भी हो सकता है। चुपचाप अपने प्रभु को याद किया और कहा मेरे में कोई शक्ति नहीं बची है न दिमाग काम कर रहा है ना शरीर काम कर रहा है। अब तो कुछ आप ही करो भले ही यह कितना भी खौफनाक जगह हो मुझे नहीं पता। इस जगह का क्या रहस्य है उस औरत ने मुझे यहां आने से मना किया था पर मैं जिद करके आ गया। लेकिन इसके बावजूद भी एक बात तो है कि आप मेरे प्रभु हो और आप हर जगह हो।तुलसी दास की बात,* प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना* अब आप ही कुछ करो मेरे अंदर तो ताकत नहीं बची और शाम लगभग घना हो चुकी थी।कुछ क्षण प्रार्थना की हमने उसके बाद न जाने कहां से मेरे शरीर में उत्साह आ गया मैं उछल कर खड़ा हो गया और एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर कूद कूद कर दूसरे रास्ते से वापस आना शुरू कर दिया। जब लगभग 1 किलोमीटर नीचे उतर चुका तो अपने ईश्वर को धन्यवाद दिया फिर मुड़कर उस ऊंचे पर्वत शिखर जो देखा जिसपर मै कोशिश करके भी नहीं जा सका। अब मुझे उस खंडहर नुमा घर की याद आती है। लेकिन दावे के साथ कह सकता हूं कि कोई कमजोर दिल वाला अगर उस माहौल में शाम के वक्त अकेले चला जाए तो शायद उसका हार्ट फेल कर जाएगा ।मैं तो यही कहता हूं मुझे अपनी ताकत नहीं मेरे प्रभु की दी हुई ताकत ने बचाया वरना मैं उस दिन शायद वापस नहीं आ सकता था। यह घटना मेरे जीवन की सबसे यादगार घटनाओं में एक बन गई।वहां से नीचे उतरते वक्त जब जंगल का घना पन थोड़ा कम हुआ तो मैंने दो वीडियोस भी बनाया और उसे अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड कर दिया। मेरी इस खतरनाक कहानी को पढ़ने के लिए जोखिम बड़े कहानी को पढ़ने के लिए आप सब का धन्यवाद। मेरे दिमाग में ये प्रश्न अब भी कौंध रहे हैं कि इतनी ऊंचाई तक जाकर भी सामने दिख रही चोटी तक क्यू नहीं जा पाया,,,,,,,,उस खंडहर नुमा जगह पर मेरा शरीर और दिमाग शिथिल क्यू हो गया,,,,,,, वही खंडहर जिसकी फोटो हमने लगाई हुई है,,,,,,,,,,मुझे इस रहस्यमय यात्रा की याद हमेशा बनी रहेगी।

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Ashu Harivanshi

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