पहले राक्षस होते थे सींगो और बड़े बड़े दांतों वाले जिन्हे देखकर कोई भय खाता था।आज राक्षस होते हैं सुंदर चमकते चेहरे वाले जो बहुत पढ़े लिखे होते हैं,उन्हे दुनिया भर की जानकारी होती है,उन्हे समाज में बहुत इज्जत होती है उनका रुतबा रहता है।वो ब्यूटी पार्लर्स भी जाते हैं ,जो दो इंच की जीभ को स्वाद प्रदान करने के लिए एक बेहद ही वीभत्स जीव हत्या करने कोई गुनाह नहीं समझते।जी हां बात कर रहा हूं उन्ही लोगो की जो छोटे से प्लेट में मसाला लगी हुई जानवर का मांस नोच नोच कर खा रहे होते हैं और सोचते हैं कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला।
कई बार जब ट्रेन में सफर में होता हूं तो भूखे रहना पड़ जाता है क्यू कि हर जगह ये नियम बन गया कि तामसिक और मांस जैसा अशुद्ध आहार ही मिलेगा क्युकी ज्यादातर लोग इसे पसंद करने लगे हैं।ये जो स्वाद के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले लोग होते हैं उनकी वजह से प्रकृति को कितना बड़ा खतरा है कैसे बताऊं।लोग तर्क देते हैं कि फसलें भी तो खाने के लिए काटी जाती है फिर जानवर क्यू नही।कैसे समझाऊं कि क्लोरोफिल और हीमोग्लोबिन में कितना अंतर है।प्रकृति ने जिस वस्तु की रचना जिस कार्य के लिए की है बस वही उपयुक्त है।भारत में पहले मांस भक्षण इतना नहीं होता था जब अरबिस्तान के मुसलमानो का यहां आक्रमण हुआ फिर यहां के हिंदुओं का धीरे धीरे विचार बदला और वो भी….बस बताना ये चाहता हूं कि आप खुद को कितना बड़ा भी ज्ञानी कह लो लेकिन अगर नियम के विरुद्ध चलते हो तो आपको ही नहीं पूरी दुनिया को खतरा है।आप कहते हो हम क्या खाएं क्या नहीं ये हम निर्णय करेंगे तो सच कहता हूं फिर आपमें और जंगलों में घूमने वाले आदिवासियों में कोई अंतर नहीं।जो काम वो मजबूरी में कर रहा वही आप शौक से कर रहे हो।
आध्यात्मिक तौर पर समझाऊं तो लोग नहीं समझेंगे।आप जानते हो जहां किसी पशु की बेवजह हत्या की जाती है वहां निगेटिव शॉक वेव्स तेयार होते हैं।ये तरंगे वातावरण में अपनी भयावह रूप से फैल जाती है।पशु की जब निर्मम हत्या हो रही होती है तो वो सर्वाधिक भय और क्रोध में होता है।उस समय उसके एड्रिनल गलेंड्स से जो हार्मोन्स निकलता है वो बेहद ही विषाक्त होता है और उस पशु के रक्त में मिल जाता है।आपके सामने प्लेट मे सजी जो भी राक्षसी भोजन आता है उसके पीछे के कहानी देख लो तो शायद आपका ह्रदय पिघल जाए।कैसे एक मनुष्य राक्षस की तरह जी रहा।उसका रक्त दूषित हो रहा क्रियाकलाप दूषित हो रहे।क्या करेगा कोई नया गवर्मेंट आकर। जब मन और तन दूषित हो तो सात्विक परिवर्तन संभव नहीं है।
क्या आप जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की एक सबसे बड़ी वजह मांसाहार है।कैसे ये समझा रहा हूं।दुनिया भर में हर रोज लाखों जानवरों की हत्या हो रही।उन्हे पालने के लिए उनके भोजन के लिए जंगलों को काटा जा रहा और फिर बाद में जानवरों को काट कर उससे इन मांस खाने वाले नर पशुओं के स्वाद की पुष्टि की जा रही।फिर तो ओजोन परत में छिद्र होगा और अल्ट्रावायलेट किरणें सीधे आएंगी और ग्लेशियर पिघल कर अपना रौद्र रूप दिखाएगा।इस तरह के लोगो का चारित्रिक पतन हुआ रहता है जो ज्यादा मांस खाते हैं।अध्यात्म से दूर दूर तक वास्ता नहीं रहता।बस पशुओं की तरह पेट और भोग के लिए जीना एकमात्र उद्देश्य रह जाता है।
कोई कहता है कि मैं अमुक से प्रेम करता हूं या करती हूं और अगर वो मांस खाने वाला है तो उसका प्यार झूठा है।प्रेम का दायरा इतना संकुचित नहीं हो सकता कि आप किसी एक से प्रेम करो और दूसरे जीव की हत्या करके भोजन करो।मनुष्य की आंतें इस प्रकार निर्मित हुई है कि वह शाक को पचा सके।ये जितनी भी भयंकर प्राकृतिक आपदाएं आती हैं उनके कारणों में एक सबसे बड़ा कारण है कि असहाय पशुओं की इतनी अधिक संख्या में निर्मम हत्या।मांस खाना अगर एडवांस होने की निशानी है तो फिर आपमें और उस आदिमानव में क्या फरक रह गया।वो मजबूरी में खाते थे आप शौक से खाते हो।भारत जैसे देश में जहां गोपाल श्री कृष्ण गौ सेवा करते वहां आज लाखों गाएं काटी जाती है।कोई संवेदना नहीं रह गई बस भोग भोगने का एकमात्र लक्ष्य रह गया।न अपने स्वास्थ्य की चिंता न विश्व की परवाह।याद रखना जो भी प्रकृति के नियम के विरुद्ध चलता है उसे उसका फल भोगना पड़ता है।क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होती है।उन मूक पशुओं की चीख को कभी अपने प्रियजन से जोड़कर देखो क्यू कि जिन्हे आप काट कर खा रहे हो उन्हे भी जीने के लिए बनाया था मेरे श्री कृष्ण ने।उनकी आह व्यर्थ नहीं जानेवाली याद रखना,आज इतना ही जय श्री राधे 🙏🙏

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Ashu Harivanshi

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