गुजरात राज्य में स्थित जुनागढ नजदिक गिरनार पर्वत श्री दत्त महाराज जीं का अक्षय निवास स्थान है । दस हजार सिढ़ियां चढने के बाद स्वयंभू दत्त पादुकां के दर्शन होते है । यहीं पर कित्येक साधू संतों को दत्त प्रभू ने साक्षात दर्शन दिए है । अनादिकाल से कित्येक सिद्ध योगी गिरनार कि गुंफाओं में साधनारत है । बाबा किनाराम अघोरी , वासुदेवानंद सरस्वती टेंबेस्वामी महाराज , रघुनाथ निरंजन , नारायण महाराज इन जैसे संतों को यहि पर प्रत्यक्ष दत्त दर्शन का लाभ हुआ है ।

गिरनार श्री दत्त प्रभूं कि तपोभूमी है । इसी शिखर पर उन्होंने बारह हजार वर्ष तक तपश्चर्या कि । उनके पैरों के गुरू शिखर पर मौजुद चरणकमल के निशान दत्त भक्तों के लिए प्रेरणा स्त्रोत है । जब दत्त प्रभू यहां पर तपस्या कर रहे थे , उस वक्त बाकी गावों में पानी कि गंभीर समस्या थी । माता अनुसूया ने दत्त प्रभूं कि तपस्या भंग कर दि तो उन्होंने अपना कमंडलू जोर से नीचे फेंका । वह जिस जगह गिर पड़ा वहां साक्षात गंगा प्रकट हुई । वहि स्थान आज कमंडलू कुंड से प्रसिद्ध है । आज भी वहां पर हर समय पानी रहता है । गिरनार के सामने दातार पर्वत है । दातार पर्वत के सामने जोगिनी का पहाड है । कहा जाता है इस पहाड पर ६४ योगिनीयों का वास है । दत्त शिखर पर अंबाजी , गोरक्ष , नवनाथ , महाकाली , अनुसूया , रेणुकामाता , भैरव और कित्येक अनेक देवताओं का वास्तव्य है । गिरनार का जंगल बाघ , सिंहों का जंगल है ।  यहां पर बहुत सारे औषधी वनस्पती मौजुद है । गिरनार के शुरवात में भवनाथ मंदिर है । यहां पर मुंगी कुंड है । शिवरात्री के दिन यहां १० से १२ लाख लोग इकठ्ठे होते है । इस कुंड में कुछ साधु स्नान के लिए जाते नजर आते हैं परंतू बाहर आते नहिं दिखते ऐसे वहां के लोग बताते है ।

गिरनार कि चढाई शुरु करने के बाद दो हजार तीनसौ सिढ़ियों के पास राजा गोपीचंद और राजा भर्तरीनाथ इन सिद्ध योगीयों की गुंफा है । इसी गुंफा में उन्होंने तपस्या कि । राजा भर्तरीनाथ अपनी पिंगला रानी के वियोग में वन में भटक रहा था तब गोरक्षनाथ जीं ने असंख्य पिंगला उसके सामने प्रकट कर उसका भ्रम दूर किया और राजा को इस गुंफा में तपस्या करने को कहा । 

साधारण तीन हजार आठसौ सिढ़ियों पर नेमिनाथ भगवान जीं का प्रसिद्ध जैन मंदिर है । काले पाशाण की उनकी मूर्ती बहुत हि आकर्षक है । इसी स्थान पर वे सातसौ साल तक साधना कर रहे थे और यहि उनका समाधीस्थल है । 

चार हजार आठसौ सिढ़ियों पर अंबाजी का जागृत स्थान है । ५१ शक्ती पीठों में से यह एक है । माता की सुंदर मूर्ती के दर्शन के बाद आगे का सफर आसान लगता है ऐसा हर किसी का अनुभव है । 

आगे के पर्वत पर सबसे उंचा गोरक्षनाथ जीं का स्थान है । उन्होंने यहि घोर तपस्या की थी । देखा जाएं तो गुरू का स्थान उंचा होता है किंतु गोरक्षनाथ जीं ने दत्त प्रभूं से प्रार्थना कि थी , आपके चरणों के दर्शन मुझे हमेशा होते रहे । दत्त प्रभू ने यह स्वीकार किया । इसिलिए गोरक्ष शिखर गुरू शिखर से थोड़ा उंचा है । इस शिखर से गोरक्षनाथ दत्त चरणों के दर्शन करते रहते है । यहि पर दत्त महाराज जीं ने प्रज्वलित कि अखंड धुनी है । इस धुनी में पिपल के पेड कि लकडियां डाली जाती है । यह धुनी हर सोमवार को अपने आप से प्रज्वलित होती है । यह एक दैव दुर्लभ देणगी है ।

गिरनार को रेवताचल पर्वत भी कहा जाता है । महाशिव रात्री को यहां पांच दिनों का उत्सव होता है । मुंगी कुंड में होने वाला सिध्दों का स्नान यह इसका आकर्षण है । स्वयं शिवजी इस कुंड में स्नान के लिए आते है ऐसी भावना है । प्रभू श्रीराम जीं का और पांडवों का वास्तव्य इस पर्वत होने के दाखले पुराणों में है । गिरनार हिमालय से भी प्राचीन होने का संदर्भ मिलता है ।

गिरनार परिक्रमा को अनन्यसाधारण महत्त्व है । हिंदू संस्कृती में प्रदक्षिणा का महत्त्व है । नर्मदा परीक्रमा और गिरनार परीक्रमा वैशिष्ट्यपूर्ण मानी जाती है ।

गिरनार परिक्रमा के बारे में अधिक जानकारी –

https://www.thethumpingnomad.com/blog/girnar-parikrama-junagadh

 

🙏 जय गिरनारी 🙏

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