सबसे पहले , स्वामीजी के चरण कमलों में मेरा प्रणाम,

मेरे पास शब्द नहीं है जिनसे मैं आपकी कृपा के लिए धन्यवाद कर  सकूँ।

आज मेरी पहले लेवल की दीक्षा को पूरे दो साल हो गए है ।  मुझे तो ते भी नहीं पता के मैं आपकी कृपा का पात्र  बनने के लायक भी थी या नहीं। परन्तु आपने मुझे इस लायक समझा इसके लिए बहुत  बहुत धनयवाद। जितना मैं देख और समझ पाई  वो सिर्फ आपका प्यार वो भी बिना किसी उम्मीद के और कृपा तो अनंत ।

आज से मैं आपके लिए कुछ लिए कुछ लिखने के लिए प्रेरित हुई हूँ।  अगली आने वाली कुछ पोस्ट में मैं अपनी जिंदगी के  कुछ अनुभवों को साँझा करूंग। 

उम्मीद करती हूँ  की आप सब उनकी  कृपा के कुछ पलों को पढ़ते हुए आनंदित मह्सूस करेंगे और शायद आपकी कुछ मदद करेंगे।

स्वामीजी,

आपने  अपनी कृपा दृस्टि से मुझे अपनी कृपा का पात्र समझ कर 2016 में अपने पास बुलाया और उसी  दिन से मेरी जिंदगी ने 365  डिग्री  बदलाव आ गया।  और वो पहली यात्रा ने मेरे जीवन का दृश्टिकोण ही बदल कर रख दिया।  पहली बार आश्रम  से आने के बाद , अब मुझे बस एक बात के अलावा कुछ और बचा नहीं था।  मैं बस उनसे एक ही बात कह रही थी,

” स्वामीजी, अब जिसको भी मेरी जिंदगी में लाना है, भेजना है, सब पूरा हो जाए ।  मेरा जिसके साथ भी कार्मिक, भौतिक , आर्थिक या धार्मिक जो कोई भी लेन देने  है वो पूरा करना है और मैं उसको पूरी निष्ठां के साथ पूरा करूंगी।  बस आपसे एक विनती है के आप  मेरा सब कुछ ले लेना जो की वास्तव में मेरा नहीं है परन्तु मुझे अपने आप  से कभी भी दूर मत करना।  जिंदगी में कितने भी उतार चढ़ाव आए परन्तु मेरा ध्यान आपके चरणों में लगा रहे।

उस दिन से आज तक मेरी जिंदगी में बहुत कुछ हुआ परन्तु स्वामीजी ने कभी किसी पल में साथ नहीं छोड़ा।  क्यूंकि वो हमेशा अपना वादा निभाते है।

आज मैं अपनी जिंदगी के एक एपिसोड (2016नवंबर ) का एक अनुभव आपके साथ सांझा करना चाहती हूँ  जिनसे मेरा विस्वास उनके प्रति और पक्का होता गया।

नवंबर 2016 में अचानक कपडे धोते हुए मुझे डिस्क की समस्या हो गई जिसकी वजह से न मैं बैठ सकती थी, न चल पा रही थी और ना ही सो पा रही थी ।

एक रात जैसे कैसे निकली।  अगले दिन अस्पताल में जाकर जब टेस्ट करवाए तब डॉक्टर ने कहा क स्लिप डिस्क हुआ है।  अब आपको बेड रेस्ट करना होगा ।  आपको बहुत  दिक्कत होगी और उस समय मेरे साथ मेरे कुछ दोस्त थे जो की थोड़ा परेशान हो गए।  तो मैं थोड़ा हसने लगी उनको लगा सायद मुझे सदमा लगा है इसीलिए आसामान्य व्यवहार कर रही हु।  और सायद उनको मैं नहीं बता पा रही थी क मन ही मन मैं ईश्वर को धन्यवाद कह रही थी।  की अब कुछ समय के लिए बस आप और मैं होंगे।  थोड़ा समय  मैं इन सब जिम्मेवारियों से आज़ाद हो कर आपके साथ कुछ समय बिता सकती हूँ।

बस एक बात का दुःख था मैंने आश्रम के लिए बुकिंग करवाई हुई थी दिवाली प्रोग्राम के लिए, वहां नहीं जा पाई।  परन्तु इसको मैंने जल्दी ही स्वीकार कर लिया ईश्वर की इच्छा समझ कर।  मैं यूनिवर्सिटी से वापिस अपने मम्मी -पापा के घर चली गई और अपना सारा समय एक कमरे में बिताने लगी और कोई चारा भी नहीं था परन्तु मैं बहुत खुश थी। 

दिवाली का दिन आया , उस दिन पूरा दिन मेरे दिल दिमाग में बस एक ही बात चल रही थी के काश आश्रम जा पाती फिर खुद को समझा रही थी।  संध्या के समय , जब आश्रम में ललिता सहतरनाम का पाठ होता है मुझे ऐसे अनुभव हो रहा था जैसे  कुमकुम का अभिषेक हो रहा हो।  मैं अपने घर में ही मंदिर के सामने बैठ कर पूजा करने लगी।  और यह क्या, मैंने अपने आपको आश्रम में ही पाया।  ऐसा लग रहा था के मानो सब कुछ मेरे सामने ही हो रहा हो।  मेरे आँखों से लगातार आँशु बह रहे थे।  बहुत सुन्दर अभिषेक हुआ।  और कुछ समय बाद जब सब पूरा हो गया जब मैंने अपनी आँखें खोली तो मैं खुद से ही हस रही थी और ईश्वर की कृपा का पात्र बना हुआ देख कर बहुत ही कृतार्थ अनुभव कर रही थी।  और उससे भी खूबसूरत बात जब मैंने अपने आसन के आस पास देखा तो वहां कुमकुम था।  यह सब देख  मैं भाव विभोर हो गई।  इससे ज्यादा हम ईश्वर से और क्या इच्छा रख सकते है? बस उसी पल में खो गई। 

उन्ही दिनों में से, एक दिन जब मैं बाथरूम में नहाने के लिए गई  तो वहां भगवान ने कैसे अपनी कृपा से मुझे बचाया वो साँझा करना चाहूंगी।

जैसे की मैंने पहले ही बताया के दर्द की वजह से न तो मैं निचे बैठ सकती थी तो पापा ने एक कुर्सी रखी थी जिसपे बाल्टी रख के उसमे पानी भर देते थे और मैं नहा लेती थी।  एक टब में पापा हमेशा रोड लगा कर रख देते थे गरम पानी के लिए।  उस दिन मैंने पापा से कहा के मैं खुद से पानी डाल लुंगी टब से बाल्टी में।  और मैं स्विच बंद करना भूल गई।  और जैसे ही मैंने टब में से मग से पानी निकालने लगी मुझे बहुत तेज बिजली का झटका जैसे महसूस होने ही वाला था।  उस एक पल में मुझे लगा के बस अब आज अंतिम दिन है और मैंने उसी समय उनको याद करके प्रणाम किया क्यूंकि वो रोड हाई वोल्टेज की थी और बच पाना आसान नहीं था। 

परन्तु यह क्या।  मुझे अचानक से ऐसे लगा जैसे एक आवाज़ आई ,” जसमीत, बी केयरफुल (संभाल कर ) और  कुछ ही पलों में मैंने खुद को उस टब से कुछ फ़ीट दूर पाया। मुझे कोई करंट नहीं लगा और मैं ऐसे दूर आराम से खड़ी थी। कुछ पलों क लिए मुझे कुछ समझ नहीं आया परन्तु उनकी उस आवाज़ से मुझे सब स्पष्ट समझ आ चुका था की कितने प्यार से उन्होंने मुझे बचा लिया एक खरोंच तक नहीं आयी न कोई बिजली का झटका।

मैंने आराम से उसी भाव में नहा के बाहर आई और मम्मी को बताया।  वो भी थोड़ी देर के लिए चुप रही मानो मन ही मन उनका धन्यवाद कर रही हो।

आज मैं जो भी हूँ बस उनकी कृपा की वजह से हूँ।  बहुत बार मन में होता है लिखूं परन्तु शब्द ही कम हो जाते है।

आज इतना ही।  शायद अब उसी भाव में जाने का मन हो रहा है।

Regards 

Jasmeet Om

 

 अगली पोस्ट में मिलते हैं।

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Jasmeet Kaur

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