सरकार, आप भी गज़ब करते हैं!
हम ही से पूछ रहें कि हम क्या चाहते हैं!
वैसे तो माई-बाप हमारे तीनों काल
किसी मूवी की तरह
शून्य की TV पर देख लेते हैं|🤓

पर जो हम बोलें उनसे,
“प्रभु, मेरे गले में धरी
यह जीवन की रस्सी
बड़ा बवाल मचाती है|
चुभती है|
काटती है|
नोचती है|
घाव बन गया है, नाथ!
अहर्निश विषाद का मवाद
रिसता रहता है|
रहम मालिक! ज़रा रस्सी खूँटी से खोल दो|
बड़ा गईया-गईया feel आता है!”🐄

तो अलबेले सरकार हमारे मुस्कुरा दिए|

कभी देखा है उनको मुस्कुराते?
ठहरी नज़र उनकी
तुम्हें अंदर तक चीर जायेगी|
मानो सातों भुवनों का ज्ञान
समा गया हो उनमे!
उसपर से, बच्चों-सी वो निश्छल मुस्कान|
मानों भोलेपन की जीती-जागती परिभाषा हैं!
ज्ञान वाली नज़रों पर भोली-सी मुस्की|
स्वामी, गज़ब Paradox मचाये हुए हैं!
जब नज़रें उठा तुम्हें देखकर,
होठों के किनारे से हल्का-सा मुस्कुरायेंगे ना,
तो दिल धक् कर जाएगा|
साँसें थम जाएंगी|
ठगे से रह जाओगे|
भरी महफ़िल में,
खड़े ही खड़े नीलाम हो जाओगे|

उस एक नज़र के पीछे
ना जाने कितने प्रह्लाद, कितनी मीरायें,
कितने मार्कण्डेय तबाह हो गयें|
कितने सीधे-साधे लोग
घर-बार छोड़
नंदी हो गयें|
कहाँ तक टिकोगे तुम उनके सामने!!

बस! जब हमने मुक्ति की फ़रियाद की
तो तबाह कर देने वाली मुस्की मार दिए हमपर|
लुट गयें मेरे शब्द| लुट गया सब तर्क| लुट गया मेरा सबकुछ!

मिश्री घुली आवाज़ में
धीरे से पूछ लिए
वो ‘गब्बर सिंह’ सवाल|

आज भी जब आध्यात्म की दुनिया में
साधक-भक्त सोते नहीं हैं,
तो महामाई उनसे कहती है,
“सोजा बेटा, वरना सरकार वो ‘गब्बर’ सवाल पूछ लेंगे!”

हमारे सरकार पूछ डालें हमसे सवाल|
“आप क्या चाहती हैं?”
गंदे बाबा! हप्प!😞

आपको नहीं पता हम क्या चाहते हैं,
तो हमें कहाँ ही पता होगा?
ज्ञान| भक्ति| ध्यान| सेवा| सत्कार|
हमें कैसे पता होगा, बाबा, कि
इस आलसी मोटी बुद्धि को
किस मार्ग से दुबला करें|
ना! ये आप जानिये!

आप पैदा किये हैं इस बच्चे को
तो डायपर आप बदलिए|😒
हमको बस हमारी शहद वाली चूसनी चाहिए|
शहद वाली चूसनी…मेरे स्वामी!😍

आप चाहे कोई भी सवाल पूछ लें, प्रभु,
मेरा हर उत्तर बस ‘स्वामी’ होगा|
जानते हैं आप! फिर भी पूछियेगा ना?
गंदे बच्चे! 😘

मैं विकारों की मिट्टी से बनी गुड़िया,
तुम बेदाग़ सफ़ेद दुद्दू|
मिट्टी घुले भी तो कैसे दूध में!

लोग अक्सर पूछते हैं मुझसे कि
क्यों नहीं सवारती मैं इस देह को|
ख्याल रखती हूँ क्यूंकि
सरकार हमारे Health Conscious हैं|
पर सवारूँ क्यों उसे जो मुझे आपसे दूर करता है|
आपमें समाने में ये देह अड़चन बन रहा है|
भौतिक भी| आध्यात्मिक भी|
रूह सवारती हूँ| कर्म सवारती हूँ| मिज़ाज और conduct सवारती हूँ|
क्यूंकि ये देह को और उसकी अनुभूतियों को गलायेंगे|

बाहर के स्थूल देह से मुक्त हो भी जाऊं,
पर अंदर के सूक्ष्म विकारों से मुक्ति कैसे संभव है, स्वामी?

3 Idiots के चतुर के ‘स्तनों’ जैसे
ये “होते तो सबके पास है पर दिखाता कोई नहीं!”

भूत-चुड़ैल-पिशाच बन ये मुझ में ही रहते हैं|
दिखाई नहीं देते, प्रभु, बस डराते हैं|
आपकी रक्षा-कवच में यूं तो
मैं निर्भीक रहती हूँ दुनिया से,
पर अपने विकारो से डरती हूँ |
क्यूंकि मैं आपको खोने से डरती हूँ|

कहीं मेरे विकारों का एक दाग
आपकी गरिमा को लज्जित ना कर दे, प्रभु|
आठों प्रहार बस एक यही डर खाता है|

चुन-चुन के अपनी बाकी इच्छाओं को मार रही हूँ।      जैसे एक मम्मी बंदर अपने पुत्तर बंदर के जूँओं को मारती है।

आपको अहंकार गवारा नहीं|
और मुझे आपसे एक क्षण की भी दूरी|

कल्पों से अपने चाँद के लिए एक चकोर की ये प्यास…
नहा-धोकर, दो चोटी करके, गेरुआ फ्रॉक पहनकर बद्रिका में खेलने की आस…
साफ़ हो, रहना, ब्रम्हांड-अधिपति के मन के पास…

अभी शून्य बटे सन्नाटा हूँ मैं|
बुद्धि शून्य और चेतना में फैला सन्नाटा|
इस परम सन्नाटे से परम शून्य में जाना है|
विकारो की इस गुड़िया को,
दूध से धवल अपने स्वामी में समाना है|

#समर्पित💙

गुरूदेव का 'गब्बर’ सवाल 2

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Snigdha

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