गृहस्थ सन्यासी!!

है गीता का उपदेश निराला
श्री कृष्ण ने जो था बतलाया
कर्म ही पूजा कर्म ही भक्ति
पाता मानव कर्म से ही मुक्ति।

तन भले धन में किन्तु
रहता वो निरासक्त मन से ।

संबंध वो निभाता सारे किन्तु
रहता घिरा सिर्फ श्री हरि के बंधन में ।

भावनाएं उसे भले भटकाए
क्षण भर के लिए चाहे रुलाए किन्तु
अस्थायी प्रत्येक वस्तु यहां
रहता उसे ध्यान यह सदा अपने चित्त में ।।

चाहे वो पूजा करे ना करे
माने ना माने किसी देव को
लेकिन
फल की आशा से ऊपर होती उसकी हर परिभाषा!

और
प्रत्येक कर्म उसका
उसमे छुपी हर भावनाएं
समर्पित होती इस प्रकृति को !!

स्वत: हकदार हो जाता वो
उस वास्तविक अनंत सुख का,

कर्मयोगी बन जगमगा जाता
कितनो के ही जीवन को
वास्तविक सन्यासी कहलाता वो ।।

Kyaa hum bna pa rhe swayam ko 

#grahasth_sanyasi 
Jai shree hari 😊

A household monk

A unique message from Geeta
Said by Shreee Krishna
Work is worship, it’s only devotion
A human attains enlightenment only from his karma( deeds).

Body may be engaged in attaining money
But mind resides in lotus feet of Shree Hari

He performs all family duties
But attaches himself only with His Lord
Such is a Household monk!

Emotions may divert his mind
May make him cry for a while
But temporary is every substance
This mindfulness retains in his mind.

Wheather he do prayer perform rituals or not
Beleive in a diety or not
But his mind remains above all materialistic desires.
And dedicate all his deeds in Shree Haris lotus feet
Such is a household monk!

 

Jai shree radhe krishna ❤️❤️

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Darshita Porwal

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