हर कोई मनुष्य अपने जीवन में एक दो या तीन बार मृत्यु के मुख में जाते-जाते बचता है। लगभग हर किसी के साथ ऐसी घटना कभी ना कभी अवश्य घटती है। मैं भी इस तरह की घटना का साक्षी रहा हूं ।वैसे इस पोस्ट में लगी हुई फोटो तो  तब की है जब मैं करीब 5 साल का था।लेकिन जब मैं करीब 1.5  या 2 साल का था, तो नानी घर जाते समय रास्ते में एक बार डूबने से मेरी मां ने मुझे बताया था। हालांकि इस घटना की याद मेरी मां को बिल्कुल नहीं होगी पर ईश्वर ने मेरी स्मरण शक्ति थोड़ी सुदृढ़ बनाई है इसलिए मुझे यह घटना अभी भी अपने मानस पटल पर अच्छी तरह से याद है।

                एक बार मैं अपनी दीदी और मां के साथ नानी घर जा रहा था ।रास्ते में बस से भी सफर करना पड़ता था और बस से उतरने के बाद कुछ दूर तक पैदल ही चलना पड़ता था, क्योंकि सड़क बेहद ही कच्ची हुआ करती थी। यह उस समय की घटना है जब मैं लगभग 2 वर्ष का था गर्मी के दिन थे और प्यास उस समय जोरो से लगती थी मुझे। मैं मां की उंगली पकड़ के साथ साथ चल रहा था, शायद इस इंतजार में कि थोड़ी देर के बाद कोई वाहन मिले और उसमें बैठ कर आगे की यात्रा पूरी हो ।इसी दौरान प्यास लगने की वजह से मेरी मां मुझे सड़क से थोड़ी दूर लगे एक चापाकल पर ले गई और हम दोनों भाई बहन को पानी पिलाना शुरू कर दी। उस समय मेरा छोटा भाई जो अभी आर्मी में सेना के तौर पर काम कर रहा है उसका जन्म नहीं हुआ था ।क्योंकि मैं बहुत नटखट था एक भी जगह आराम से नहीं बैठता था ।इसलिए पानी पीते ही मैं उस चापाकल के इर्द-गिर्द उछल कूद मचाने लगा। वहां बहुत ही स्लिपरी पक्की थी। फिसलना उस जगह के लिए बिल्कुल आम बात थी ।मैं चापाकल के हैंडल को पकड़ता हुआ उस जगह धमाचौकड़ी मचा रहा था और मुझे इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था की उसी पक्के  के पास एक बहुत ही गहरा गड्ढा था जिसमें चापाकल से निकला हुआ सारा पानी जमा होता था। गड्ढा इतना बड़ा था कि उसमें कोई बच्चा तो पूरी तरह से डूब ही सकता था । 1 मिनट ही बीते होंगे मेरा पैर फिसला और चापाकल के हैंडल से हाथ भी छूट गया और सर नीचे की तरफ होते हुए मैं सीधा उस गड्ढे में गिरा ।और गड्ढा इतना गहरा था की गिरते ही 2 सेकड के भीतर मेरे शरीर का तीन चौथाई हिस्सा पानी में डूब चुका था। यानी सर से लेकर घुटने तक मेरा शरीर पानी में जा चुका था अब घुटने से तलवे तक का भाग ऊपर पानी पर बचा था कि तत्काल मेरी मां की नजर मेरे पर पड़ी होगी क्योंकि उस वक्त में तो कुछ देख नहीं सकता था मेरा लगभग पूरा शरीर पानी में डूब चुका था। सिर्फ घुटने के ऊपर का भाग बचा हुआ था और मां ने झट से मेरे दोनों पैर का आखरी हिस्सा पकड़ा और ऊपर की तरफ खींच लिया बाहर निकला तो वह गंदा पानी मेरे पूरे बदन को पूरी तरह से भिगो चुका था ।लेकिन उस पानी को मैं पी नहीं सका था। निकालते ही यह समझ में आ गया कि 1 सेकंड की भी देर होती तो शायद मैं अंदर पानी में जा चुका होता ।और यहां तो कोई बचाने के लिए दूर-दूर तक तक था भी नहीं ।बस 1 सेकंड की और देरी होनी थी और मेरा पूरी तरह से डूब जाना सुनिश्चित था । मैं बाहर निकला या यूं कहो कि मां के द्वारा निकाला गया। बहुत चीख चीख कर रो रहा था फिर मुझे बगल पड़ी बाल्टी में पानी भरकर अच्छी तरह से नहलाया गया। कपड़े बदले और दूसरा कपड़ा पहनाया गया और उसके बाद फिर आगे की यात्रा शुरू हुई। यह घटना ननिहाल पहुंचने के बाद पूरी तरह से जंगल में आग की तरह फैल गई। हर कोई मेरे से इस घटना का जिक्र कर रहा था और मुझे जीवित देखकर उन्हें एक सुखद आश्चर्य हो रहा था।

ऐसी ही कई अन्य कहानियां जब मैं नदी में कई बार डूबते हुए बचा था, जब  तैरते हुए बहुत दूर निकल जाता  और मेरे कोमल हाथ बहुत थक जाते, अंदर से आवाज आने लगती कि अब मृत्यु बिल्कुल समीप आ चुकी है तो एन वक्त पर पर ईश्वर ने कोई ना कोई माध्यम बनाकर के डूबने से बचा लिया था ।कभी-कभी जब तैरते हुए बहुत दूर करे पानी में चला जाता और खूब सारा पानी पी लेता तो लगता कि अब मृत्यु निश्चित है लेकिन तभी कोई ना कोई ऐसा इंसान जो दूर जा रहा होता उसकी नजर मेरे पर पड़ती और वह आकर मुझे बचा लेता। आप सबके जीवन में भी कभी ऐसी घटना घटी होगी जब आप मरते-मरते बचे होंगे। ऐसा जरूर हर किसी के लाइफ में होता है।

         आज यूं ही बैठा था तो मां की थोड़ी याद आई तो सोचा उससे संबंधित घटना को शेयर कर दो ।हालांकि वह तो इस कहानी को पढ़ नहीं पाएगी और ना ही मैं उसे यह बता पाऊंगा क्योंकि हमारा मार्ग बदल चुका है ।श्रेष्ठतम लक्ष्य की उपलब्धि को हासिल करने के लिए कहीं ना कहीं हमें मोह युक्त रिश्तो का त्याग करना पड़ता है ।एक सन्यासी भी संसार में किसी भी सांसारिक मनुष्य को प्रणाम नहीं कर सकता अपने पिता को भी नहीं लेकिन शास्त्रों में उल्लेख है कि उसे मां को प्रणाम अवश्य करना पड़ता है। संसार में सिर्फ और सिर्फ एक ही रिश्ते हैं जिसे मां कहते हैं उनको प्रणाम करना सन्यासियों के लिए भी शास्त्र प्रमाणित है ।यह मेरा आलेख मेरे शरीर की मां को समर्पित है और उसके चरणों में मेरा भाव से प्रणाम। 🙏🙏💐💐🌹🌹🌼🌼🌴🌴🌻🌻🌹🌹💐💐

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Ashu Harivanshi

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