मुझे याद है , तब मैं बैंगलोर में जॉब के लिए गई थी । वह साल 2014 , जनवरी महीना था । अभी मुझे उस जगह का नाम याद नहीं , जहां पर स्वामी जी आने वाले थे । उस दिन शायद मैं कंपनी से जल्दी निकल गयी थी । मैं हि सबसे पहले वहां पहुंची थी , जहां स्वामी जी आने वाले थे । मैंने रिसेप्शनिस्ट से पूछा तो वो बोली , अभी तक कोई आया नहीं है ।

मैं इंतजार कर रहि थी । तब तक मैं वहि नजदिक एक देवी के मंदिर दर्शन के लिए गयी । जब मैं दर्शन लेकर वापस आ गई तो मुझे मेरी चप्पल कहिं पर दिखाई नहिं दि । मैंने बहुत ढूंढा पर मुझे मिल नहिं रहि थी । मुझे लगा मेरी चप्पल चोरी हो गई । मुझे टेंशन हो गयी । ओह , एक बडि सी गाडी वहां से निकल गयी और मुझे मेरी चप्पल दिख गई । उस गाडी के नीचे मेरी चप्पल थी । मुझे राहत मिली और मैं जल्दि जल्दि वापस जाने लगी । मैंने किसी को फोन करके पुंछा, आप लोग कहां है ? मुझे सुनाई दिया, हम लोग एअरपोर्ट से बस आ हि रहे है । मैं स्वामी जी का इंतजार करने लगी । वहां पर लोगों कि भीड जमा हो चुकी थी । मैं किसी को भी नहिं जानती थी । किसीने मुझे पुंछा, “आप स्वामी जी को कैसे जानती है ?” मैंने कहा , “मैंने YouTube पर उनके video देखे है । उनके बारे में पढ़ा है ।”

मुझे डर लगने लगा । तभी दरवाजे पर थोडा शोर सा सुनाई दिया । आह , स्वामी जी पधार रहे थे । उनका अलौकिक तेज देखकर मेरी आँखें दिप गई । वे किसी से पुंछ रहे थे , मैंने पहला वाक्य उनके मुख से सुना , “हमारी पादुका कहां है?” फिर वे आसनस्थ हुए । उनका पूजन किया गया । स्वामी जी ने थोडी देर सत्संग दिया । सत्संग समाप्त होने के बाद लोग उनको नमस्कार कर रहे थे । जब मैंने उनके पैर छुए तो उन्होंने मेरी तरफ देख के कहा , “अमृता?” मुझे आश्चर्य हुआ, स्वामी जी ने मुझे पहले कभी देखा नहिं फिर भी उन्होंने मुझे कैसे पहचान लिया । मैं मुस्कुरायी 😊

दुसरे दिन २६ जनवरी को स्वामीजीं का उन्नती सेंटर में सत्संग था । मैं आज भी जल्दि पहुंच गई थी । मुझे लगा अभी तक स्वामीजी आए नहिं इसलिए मैं बाहर किसी से बात करने लगी । अचानक सब लोग उपर के स्टेप्स की तरफ देखने लगे । मैंने देखा स्वामीजी प्रसाद जीं के साथ खडे थे । मैंने उनकि तरफ देखकर स्माईल किया तो उन्होंने भी स्माईल किया । थोडी देर तक मैं उनकि तरफ देख रहि थी । फिर वे स्टेप्स उतरकर नीचे आने लगे । मेरे हाथ में फुल थे । मैंने उनके राह में फुल बिछा दिए । मैंने उनसे कहां , आईए स्वामीजी । उन्होंने मुझसे पुंछा , “Amruta, you are coming to meet me tomorrow right?” I said , “Yesterday I came, no 🤔.”  He said , “Okay.”  फिर स्वामीजीं का अंदर हॉल में सत्संग शुरु हो गया । अब वो सत्संग में क्या कह रहे थे वो मुझे याद नहिं है । मुझे वहां पर बहुत हि पॉजिटिव लग रहा था । तब उन्होंने हरे कृष्ण का किर्तन लिया था 😇🙏

दुसरे दिन सुबह नौ बजे मेरी स्वामीजीं के साथ पर्सनल मिटिंग थी । मैं सुबह जल्दि उठकर स्वामीजीं से मिलने के लिए निकल गई । मुझे जो address पता था मैं वहि पर पहुंची । वहां जाने के बाद मुझे पता चला स्वामीजी वहां पर नहिं है । वे किसी दुसरी जगह रहने के लिए गए है । मैंने पुंछा तो एक सज्जन व्यक्ती ने बताया , स्वामीजीं को कूलर या किसी चीज की तो ( माफ किजिए अब मुझे याद नहिं है ) रात भर बहुत आवाज आ रहि थी इसिलिए वे होटेल लेमन ट्रि में रहने के लिए गए है । मैंने उनसे address ले लिया । उन्होंने मुझे पुंछा, “आप के पास sufficient पैसे है ?” 🤔 Thank god मेरे पास sufficient पैसे थे । मैंने कहां जी मेरे पास sufficient पैसे है । मैं जल्दि में थी । मैंने ऑटो कि और होटेल लेमन ट्रि पहुंच गई ।

नौ कब के बज चुके थे । मुझे डर लग रहा था , अगर स्वामी जी से मैं नहिं मिल पायी तो ? मैंने होटेल में एंट्री कि । वहां पर कुछ लोग बैठे थे । वहां प्रसाद जी भी थे । मैंने उनसे स्वामी जी के बारे में पुंछा । उन्होंने मुझे लिफ्ट से उपर जाने के लिए कहा । I was very lucky कि मुझे स्वामी जी के दर्शन हुए और उनसे बात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।

वापस होस्टेल आते दोपहर हो गई । शाम को फिर से स्वामी जी का सत्संग था । मुझे address पता था लेकिन मुझे exact location नही मिल रहि थी । मैंने कई लोगों से पता पुंछा लेकिन मुझे exactly वह सभागृह कहा है , वो मिल नहिं रहा था । सुबह से मेरी बहुत भाग दौड हुई थी । मेरे पैर भी दुखने लगे थे । मैंने सोचा , “अगर नहिं मिलता है , तो वापस चली जाती हूं ।” मेरे मन में यह विचार आया हि था तभी मुझे वह सभागृह दिखाई दिया । अभी तक स्वामी जी आए नहिं थे । थोडी देर बाद स्वामी जी आ गए और उनका सत्संग शुरू हो गया । मेरी तबियत ठिक नहि थी । मुझे लगा घर जाकर आराम करूं । मैं थोडी देर बाद होस्टेल चली आई ।

अगले दिन स्वामी जी के सत्संग का तिसरा और आखरी दिन था । जब मैं वहां पहुंची तब सत्संग शुरु हो चुका था । अंत में स्वामी जी ने लोगों को प्रश्न हो तो पुंछने को कहा और उन्होंने “जय अंबे हरे” किर्तन शुरु किया । मेरा मन बहुत हि भर आया । मेरे आंखों से अश्रू बहने लगे । मुझे बहुत हि रोना आ रहा था । किर्तन समाप्त होने के बाद स्वामी जी चले गए । मैं बस स्टोप पर बस का इंतजार करने लगी । बहुत देर के बाद मुझे बस मिली । होस्टेल आते आते रात हो चुकी थी ।

इन तीन दिनों में मुझे स्वामी जी के प्रत्यक्ष दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मुझे लगा जैसे मेरे पुरे जीवन का सार्थक हो गया और यहि मेरे जीवन के सबसे अनमोल क्षण है । जिनको मैंने आज भी संभाल कर रखे है ।

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