प्यारे Os.me परिवार को सुप्रभात।

ज्यादा कुछ कहने को तो वैसे भी मेरे पास नहीं होता😁, इसीलिये एक बार फिर कुछ कविताओं संकलन आपके समक्ष प्रस्तुत है। उम्मीद करता हूँ कि आपको अच्छी लगेंगी।

यह हँसी, यह खुशी

यह हँसी, यह खुशी,
चौराहे पर जाती मिली,
कि चार दोस्त, एक साइकिल पर,
मूँगफली लेने आये, दस रुपये की।

यह ठहाके, यह कहकहे,
बाजार में होते दिखे,
कि नई खुली उस दुकान से,
वह महिला खरीद चुकी है,
अपना दुपट्टा कई दफे।

यह कारनामे, यह वाकये,
मंदिरों में होते दिखे,
कि नारायण को समझाकर बातें दो-एक,
वह व्यापारी, वैरागी से कहने लगा अनेक।

 

सब तुम्हारा ही है

मेरी कश्ती में है हौसला बहुत,
कि उससे मिलने को बेक़रार,
किनारा भी है

कई सपने मेरे, इस सपने तले,
टूटकर चूर हुए है,
अब तुम जान ही लो,
यह शख्स हत्यारा भी है

महलों में रहता हूँ तो क्या,
मन के किसी कोने में,
एक खुश बंजारा भी है

अधिक समेटो मत ख़ुशियाँ जहां की,
सारे जहाँ के दुःख का,
कुछ हिस्सा हमारा भी है

सागर पार माल-असबाब को,
बांटकर कहाँ रखोगी,
सब तुम्हारा ही है

मेरे ही साथ जाने की,
ये जिद ही पागलपन है,
पहले मौत से तो पूछ लो,
उसे ये गंवारा भी है!

 

दीवारों से निकली ईटें

बच्चों को खुशी है,
दीवारों से कुछ ईंटे,
छत तक जाने के लिये,
निकाली गई हैं।

दीवार को दुख नहीं,
फख्र है कि ये ईंटें,
बच्चों के लिये ही,
उसने संभाली हुई हैं।

छत को आश्चर्य है,
कि कैसी नई-नई तरकीबें,
उस तक जाने के लिये,
बना ली गई हैं।

पाठक तो आनंदित है,
कि ऐसी सुंदर-सुंदर कल्पनाएं,
कुछ समय बेचकर, कवि द्वारा
कमा ली गई हैं।

 

जलते दिये से जब ये पूछा कि

जलते दिये से जब ये पूछा कि
‘क्या ख्याल है तुम्हारा
सूरज के बारे में,’
हँसा वह, बहुत हँसा
हवा संग बहने लगा,
साथ रख अपनी काया का,
वापस आ कहने लगा,
“एक दिया है वह भी”
‘क्या एक दिया है सूरज!’
“हाँ एक दिया है, है लेकिन,
विशाल, आधारहीन, कायारहित,
इस अखिल ब्रह्मांड के,
अंधकार की प्रचंडता को,
वह भी कब कर पाता है,
समाप्त!”

 

एक घटना घटी है

एक घटना घटी है,
घर से कुछ घर दूर,
एक परिवार सुन रहा है,
गर्जन काल का भयावह, बहुत क्रूर,
घटना बहुत अजीब है, बतलाएं कैसे?
मृत्यु अंतिम सत्य है, झुठलाएं कैसे!
जो हुआ था सब अदृश्य था,
हमने न देखा, न ही स्पृश्य था,
बताया जाता है कि ऐसा होता है,
सहसा आकर यम व्यक्ति से कहता है-
‘चल अब, समय पूरा हुआ,
क्यों, अब यहाँ रहता है’?
सुना है, अटल यह है, विधि का विधान है,
अविरल चलते संसार का एक यही समाधान है,
पर, प्राण जब देह से अलगाव कर,
मंद-मंद भी उठते होंगे,
तब प्राणी जग के हो भयभीत,
क्या खुद में नहीं सिमटते होंगे?
नियम हैं, किन्तु हैं बेहद क्रूर,
काया समीप, व्यक्ति खो जाता, कहीं, दूर!

अंत तक पढ़ने के लिये शुक्रिया। अपने विचार अवश्य बताइयेगा।

कोटि-कोटि धन्यवाद🌹🙏

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Amit

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