मम्मा… !

कितना मीठा अहसास था इस आवाज़ में, एक teenage बेटी की energy और जोश से भरी प्यारी सी पुकार. एक अरसे बाद गूंजी थी इस कमरे में — सुन्दर सा, सभी ऐशो आराम भरा, सजा हुआ ये ड्राइंग रूम. जहाँ, एक उदास सा चेहरा लिए, मैली मैली आभा ओढ़े, कभी कभी कोई आ कर बैठ जाता है, अपने अपने कमरे से निकल कर|. शायद थोड़ी उदासी कम करने की उम्मीद लिए

आज थोड़ी देर के लिए लगा की अब से यहाँ भी ज़िन्दगी का आना जाना शुरू हो गया है…

Thank you God for everything — फ़ौरन धीरा के subconscious ने react किया.

“मम्मा देखो कितना अच्छा match बन गया. ये नीली waves वाली, खुली-खुली सी टॉप, white shorts – परफेक्ट ‘beach look’. और ये चप्पल तो सब जगह फिट हो जाती है, हर dress के साथ. है न?”

और उसी जोश में मस्त, बिना किसी जवाब का इंतज़ार किये, वो बाहर निकल गई, अपने दोस्तों से मिलने.

धीरा को ठीक जवाब देने आते भी कहाँ हैँ! अच्छा हुआ मौली जल्दी से चली गई, वरना माँ का ज्ञान का पिटारा खुल जाता😀😀😀

आज मौली का कहा शब्द ‘beach look’ धीरा को एक नया पिटारा थमा गया.

क्या चलता रहता है आज के teenage दिमाग में? कितना conscious हैं ये looks को लेकर! अभी तो normal look, स्पोर्ट्स look, party look, festive look, ethnic look, trendy look जैसे नित नए दिखावी looks से ही छुटकार नहीं मिला था, अब ये beach look और add हो गया list में.

अरे अभी से घबरा गई धीरा मैडम! अभी तो ज़िन्दगी ने कदम ही रखा है तुम्हारे घर में| अभी बिज़नेस look, bridal look , और न जाने कितने look आने बाकी हैं. कल यही मौली जब पढ़ लिख कर कुछ बन जायेगी तो ऐसे ही ढेरों looks आया जाया करेंगे तेरे घर भी. 😊अब अगर तुम पीछे रह गई हो looks की इस रेस में, तो मौली क्या करे.

मुझे तो लगता है आज के युग में हमारे हर तरफ दलदल ही दलदल है. कई तरह तरह की confusions और choices की दलदल.

Food (name) वैरायटी की — क्या बनायें क्या खाएं, white sauce या red sauce पास्ता, onion, वेजटेबल, chicken या mozzarella पिज़्ज़ा, sab, roll, puffin, tortilla… 😀

इमोशनल (रिलेशनशिप की) दलदल- BFF, BF, one-night stand, live-in, single, committed, single parent, single with kid… 😀

Social status की दलदल — kitty party, बर्थडे party, singles party, couples party, theme party… night out, one-month anniversary, two-month anniversary… और न जाने क्या क्या 😀

नित नया “day”- आज mother’s day तो kal father’s, फिर daughter’s day, कभी फ्रेंडशिप day, तो कभी वैलेंटाइन day…

Latest फैशन की दलदल – branded कपड़े, branded जूते, branded purse, branded accessories…

Updated टेक्नोलॉजी की दलदल – 5G, iphone, latest models…

प्रोफेशनल (करियर में ) दलदल – night shifts, changing jobs every now and then, meeting targets in everything, no sincere commitment, call centres are offering all non sense to reduce attrition rate…

पोलिटिकल दलदल – इसे अभी के लिए discussion से बाहर ही रहने देते हैं.

ये looks की दलदल तो महज़ एक छोटा सा trailer है. आज के teenager के लिए तो हर दो कदम पर एक नई दलदल मुँह खोले खड़ी मुस्कुरा रही है की देखती हूँ कैसे बचते हो मुझसे.

आज का millenial बच्चा… बेचारा… बहुत कठिन दौर से गुजर रहा है. हर जगह choices का दलदल, नए मोड़, नए sign boards…

अपने 1980-85 के सीधे सादे दौर में इतने distractions थे ही कहाँ, वरना कम तो कोई भी नहीं होता teenage में. नैन मट्टका हो या फिल्मों से फैशन अपनाना, दोस्तों संग घूमना हो या अपनी मरजी चलाना, क्या नहीं करते थे हम सब.

Emotions पर बात करें? या छोड़ दें? शायद अभी के लिए काफी है. कभी किसी और कहानी में जिक्र करेंगे, अपनी अपनी emotional हरकतों का 😀

अरे हाँ, जब चाऊमीन नई नई introduce हुई थी दिल्ली की गलियों में तो घर में सबसे पहले कौन लाया था? और कौन almost daily खाता था, घर की रोटी सब्जी छोड़ कर 😊

ये सब तब जब complications काफ़ी कम थे, चीजें आसान थीं.

मतलब teenage तो एक सी ही होती है हर युग में, बस थोड़ा रूप बदलता रहता है. वरना जोश और दीवानगी की कमी कहाँ थी तब भी… और अच्छाई और बुराई दोनों साथ साथ चलते रहते हैं काफी आगे तक समय के साथ थोड़ा रूप बदल कर. और जब teenage जाती है, थोड़ी maturity आना शुरू होती है तो रास्ते भी साफ़ होने लगते हैं और मोड़ भी समझ आते हैं.

Now, on a very different note —

एक और बात, हमारे अंदर भी तो एक दलदल हर वक्त गिज गिज करती ही रहती है — दिमागी दलदल, विचारों की दलदल.और हम उसके इस कदर आदी हो जाते हैं की यही ज़िन्दगी या कहें intellect कहलाने लगती है. अपने को और दूसरों को समझने की भी तो एक दलदल ही होती है. इतनी गहरी की उसकी शुरुआत तो शायद कई साल नहीं, कई जन्मों पुरानी होती है. हाँ अगर कहीं ये गिज गिज महसूस होना शुरू हो जाए तो व्यक्ति एक नई यात्रा पर निकल पड़ता है.

वरना तो इसकी ऐसी आदत लग जाती है कि पता ही नहीं चलता कि वाकई किसी दलदल में फंसा हुआ है हर शख़्स.

हाँ, एक अच्छी बात ये है की एक बार महसूस करने के बाद यदि इस दिमागी दलदल को किसी ने साफ़ करने की ठान ली – हिम्मत से, मेहनत से, भले किसी का सहारा और सहयोग ले कर या ख़ुद से, और अपने को सही से सुखा लिया तो बाकी की हर तरह की दलदल खुदबखुद सूख जाती हैं. फिर न कोई looks की न status की, न ही food की और न ही days की, न social, न intellectual, न ही कोई और confusion बचती है. सबका मूल तो दिमाग में ही है न

हम चाहें तो हर दलदल से सही सलामत बाहर आ सकते हैं.

है न?😊

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