अब जा के समझ आया की क्यों  हर समय सांस के रुकने जैसा आभास हो रहा है  पिछले कई दिन से!!!!!!!!

चारों ओर झूठ का pollution जो फैला हुआ है. सच की साफ हवा आनी बंद जो हो गई है. गला तो घुटे गा ही…..

ये वो मौत है जो जीते जी ही आती है. इसके बाद शरीर नहीं आत्मा निर्जीव होने लगती है. सीधा तीसरे शरीर पर निशाना. स्थूल, सूक्ष्म दोनों को भेदते हुए सीधा कारण शरीर पर वार!!!!!!!  न आप मर पाते हैं और न ही पूरी तरह जीने की space ही मिलती है 

झूठ –  शायद कलयुग का एक बहुत clear cut स्वरुप जो दाखिल हो चुका है घर घर में. 

तो आज जा कर समझ आया क्यों पूरा  सांस नहीं आता. क्योंकि हँसे हुए तो एक जमाना हो गया.  मुस्कुराहट आती ही नही,  वह शुद्ध, pollution रहित मुस्कान जो जीने को खुशनुमा बनाती है…

ऐसी   विषैली  हवा में सांस लेना बहुत तकलीफ देता है. मजबूरी का कलयुगी रूप.  जिसे शायद कभी सपने तक में भी न महसूस किया था  आज उसे ही रोज़ दर रोज़ जीना बन जाता ज़िन्दगी की duty.

कितना प्यार था न सच से. कितना लगाव. सब छिन गया. चलो अब करो practice लगाव रहित हो कर जीने की . और  सीख लो हँसना फिर से… अपने ऊपर हँसना…..

😄😄😄😄