“बजाओ, महादेवी पधारीं है।” नारद जी ने अपनी स्वभाव के अनुसार चुटकी लेते हुए बोला 

महादेवी मुस्कुरा रहीं थी और सारे गण लज्जा से मुख नीचे की ओर करके खड़े थे क्यों कि आज उनका राज़ माँ के आगे खुल गया था। देवी, महादेव को अच्छे से जानतीं थीं कि महादेव सर्व स्वतंत्र थे और कुछ भी ऐसा नही कि जो महादेव को छिपाना या बताना पड़े। श्री नारायण के मुख पर भी एक बड़ी सी मुस्कुराहट थी।

वास्तव में नारद जी यहाँ महादेव के पास फिर से एक प्रार्थना लेकर आए थे। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि पहले की तरह महादेव से प्रार्थना करके मना लिया जाए और देवी से स्वीकृति लेने का काम महादेव स्वयं ही कर लेंगे। चिंतामणि गृह की हर एक चीज़ माँ की सेवा में थी जैसे वहाँ के पक्षी, कीट-पतंगे, घास, फूल, पत्ते, पेड़, वायु और दीवारें इत्यादि सब। यह माँ को सारी सूचना देते थे। तभी महादेव नारद जी के स्वभाव से परिचित उन्हें शिवपुरी ले गये ताकि गोपनीयता बनी रहे। लेकिन वहाँ महादेव ने श्री भगवान को हृदय से स्मरण किया और देखते ही देखते सारा दृश्य ही बदल गया और कुछ भी बात नही हो पायी

सारी बात को माँ ने मौन में ही जान लिया। गणों को और लज्जा का सामना ना करना पड़े तो माँ अत्यधिक प्रेम से बोलीं, “क्षमा कीजिए, मैं चिंतामणि गृह में आपकी प्रतीक्षा करती हुँ।“

गणेश और स्कंद माँ को लिपट गये और उन्हीं के साथ चल दिए। चलते चलते गणेश ने अपनी मीठी सी आवाज़ में शिवपुरी में अपना मोदकों का अनुभव माँ को बताना शुरू किया।

चिंतामणि गृह में माँ ने श्री नारायण और नारद जी का विशेष सम्मान किया। बातचीत का दौर शुरू हुआ तो पहल नारद जी ने की

“देवी, नारायण और मैं आप से विनती करने आए है कि…”

“केवल आप नारद। मैं, माँ जगदंबा और महादेव के दर्शन के हेतु ही आया हूँ” श्री हरि, नारद जी की बात को पूर्ण होने से पहले ही बोले, “होने को तो यह दर्शन अंतर्मन से भी किया जा सकता था लेकिन जो तन्मयता यहाँ आकर मिली, उस से वंचित रह जाता।” “और वैसे भी धरम युद्ध के बाद देवी गम्भीर अवस्था को प्राप्त थीं तो…”

“नारायण, आप मेरे भ्रात है, विषाद में तो मैं अभी भी हुँ। हर समय एक अपराध बोध में हुँ। दंड लोक में देखी दुर्दशा को भुला नही पा रही और महादेव के प्रति जो जघन्य अपराध हुआ है उसका परिणाम तो ना जाने क्या ही होगा!”

“देवी, बस आप से एक ही अनुरोध है कि भावनायें सागर की लहरों की भाँति अस्थाई होती है, कृपया इनमें बहे नही। भविष्य में यह आपको और भी कष्ट दे सकती है।”

“अभी आज्ञा दीजिए, आपका यह अमूल्य समय नारद के लिए है। इन्हें आप से कुछ विशेष वार्ता करनी है।” ऐसा कह कर श्री भगवान मुस्कुराते हुए अंतरध्यान हो गए।

“देवी, आप देवतायों पर कृपा कीजिए।”

नारद जी के वचन सुन कर माँ ने अपनी एक दृष्टि देवतायों की ओर भी डाली।

“क्या कृपा की जाए, नारद जी, युद्ध में जो देवता गण मृत्यु को प्राप्त कर चुके थे, अश्वनी कुमारों की सहायता से उनके ऊपर अमृत वर्षा करके उन्हें पुनः जीवित और स्वस्थ कर दिया गया है।”

“अब उनका का जीवन पहले से अधिक विलासपूर्ण हो चुका है क्यों कि अब स्वर्ग और अन्य लोकों के खो जाने का उनका भय ख़त्म हो चुका है और दयाभाव की जगह उनके अहं में वृद्धि हो रही है। वे भूल चुके है कि मैंने उनकी रक्षा किस प्रकार की है और उन्हें उनका स्थान पुनः कैसे मिला है? वे धर्म के आड़ में सोच रहे है कि अगर देवी हम पर कृपा ना करतीं तो किस पर करतीं।”

 “अब भी देवता गण अपना स्थान प्रबल बनाने के लिए ना तो किसी प्रकार का कोई तप के रहे है और ना ही कोई परिश्रम। केवल स्वार्थ में ही जीवनयापन कर रहे है और निरर्थक राजनीति और सत्ता में फँसे हुए है।”

“देवतायों ने मिल कर स्तुति करके मेरी उग्र ऊर्जा को जाग्रत किया। लेकिन आज अगर कोई विषाद में है तो वो केवल मैं हुँ। देवता गण अपना जीवन पूर्ण रूप से व्यतीत रहे है। महादेव के साथ एक एक क्षण उत्सव के समान व्यतीत होना चाहिए, लेकिन आज स्तिथि यह है कि मेरे और महादेव के मध्य केवल मेरी दुर्बल मानसिकता है।” 

“एक क्षण के लिए मुझे, आज भी लगता है कि शायद मैंने ठीक नही किया, लेकिन दैत्यों के राज में बहुत अराजकता थी। कम से कम देवता गण अपने ही व्यसनों में ही बहुत व्यस्त है, उनके पास समय नही है किसी को तंग करने का। सृष्टियों का काम सुचारू रूप से चलता रहे, उन से इस से ज़्यादा अपेक्षा करना ठीक नही। परंतु लोकपालों ने दंड लोक की प्रकृति के क्रम को किस आधार पर नष्ट किया? मैं उनके इस कृत्य से रूष्ट हुँ।”

“देवी, मैं यही आप से प्रार्थना करने आया था कि दंडलोक की सहायता मत कीजिए, वहाँ के सृष्टि क्रम में अगर सुधार होगा तो फिर से कोई नया रक्तबीज पैदा होगा, फिर कोई दुराचारी शुम्भ-निशुम्भ पैदा होंगे और फिर से कोई आपकी उग्र ऊर्जा…” कहते कहते नारद माँ का गम्भीर मुख देख कर मौन हो गये।

“क्या देवतायों में स्वयं की रक्षा करने का शौर्य नही है? क्या वे केवल अमरत्व, उच्चपदाधिकार और ऐश्वर्य के लिए है?”

“जगदंब मात, दैत्यों को अभयदान और असम्भव मृत्यु का वरदान भी तो महादेव ही देते है। और फिर दैत्य सबसे पहले स्वर्ग पर ही आक्रमण करके देवतायों को वहाँ से भगा देते है और फिर सृष्टि क्रम को नष्ट करते है। अपने सदगुणों के कारण देवता सदैव दुर्बल रहते है।”

“नही देवी, जब कोई और विकल्प नही रहता तो विवश होकर मुझे यह वरदान मुझे देना पड़ता है।” महादेव चुप्पी तोड़ते हुए बोले जो कि काफ़ी देर से मौन हो नारद जी और देवी का संवाद सुन रहे थे।

“अनेकों ही ऐसे उदाहरण हैं जब मुझे ऐसा करना पड़ा।”

“हाँ, यह ज़रूर है कि मेरा प्रेम है दैत्यों के साथ है क्यों कि वास्तव में वे जो भी प्राप्त करते है, परिश्रम के बल पर प्राप्त करते है। और जो भी पूर्ण वहिष्कृत है, मेरा झुकाव स्वाभाविक रूप से उसी की ओर ज़्यादा  रहता है।”

“नारद, आप ५००० मन्वनतर पहले की बात तो जानते ही होंगे! यदि नही, तो आज जान लीजिए।” महादेव ने बताना शुरू किया “तब इंद्र स्वभाव से आज वाले इंद्र ना होकर बहुत ही सज्जन और सुशील हुआ करते थे। उन में अहं और लोभ नाम मात्र का भी नही था। देवता और असुरों के मध्य अधिकारों को लेकर कोई ज़्यादा शत्रुता भी नही थी अपितु किसी किसी विशेष उत्सव पर सभी मिल बैठ कर खाते-पीते और आनंद उठाते थे। कोई भेद-भाव नही था।”

“नारद, तब समुद्र मंथन के दौरान इंद्र को दिव्य ऐरावत हाथी दिया गया और दानवों ने इसे सहर्ष स्वीकारा। समुद्र मंथन में से जितनी भी दिव्य चीजें निकली सभी देवतायों को दी गयी और देवी लक्ष्मी का पाणिग्रहण श्री हरि ने किया। दानवों को केवल अमृत की ही चाह थी क्यों कि उन्हें हमेशा से ही अपने अस्तित्व के स्थाई होने में एक शंका रहती थी।”

तांडव - प्रकरण 6 2

“जब मुझे विष पीने के लिए ब्रह्मा जी, श्री हरि और अन्य देवतायों ने स्तुति की थी तब मुझे यह आभास भी नही था कि अमरत्व केवल देवताओं के भाग में आयेगा, नही तो मैं तभी हस्तक्षेप करता। दानवों के हित के लिए कुछ अधिकारों की माँग करता तो कभी भी यह शत्रुता इतनी चरम सीमा पर ना होती। विष पीने के तुरंत बाद मैं अनंतकाल के लिए समाधिष्ट हो गया, क्यों कि उस विष को केवल विशुद्धि चक्र में ही रचाना था और उसी के चलते आने वाली पीडियों के कुंडलिनी जागरण के लिए विशुद्धि चक्र की संरचना में भी परिवर्तन करना पड़ा। जब कोई विशेष कार्य प्रकृति के क्रम में नही होता तो उसे प्रकृति के साथ जोड़ने के लिए विशेष प्रकार की क्रियाएँ और समय चाहिए होता हैं।”

उसी दौरान श्री हरि ने मोहिनी स्वरूप को त्याग कर धोखे से अमृत पी रहे राहु नाम के एक दानव का गला अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया। वही पर बैठे उसके बड़े भाई बाहुराज ने घोर विद्रोह किया जिस से देवता और दानवों के बीच संग्राम हुआ। शुम्भ-निशुंभ, बाहु के ही पुत्र थे। इंद्र और बाहु घनिष्ट मित्र भी थे लेकिन दुर्भाग्यवश इस संग्राम में इंद्र ने ही अपने परम मित्र बाहु की हत्या बहुत दानवीय ढंग से की”

“दानव युद्ध हार गये। पुरस्कार में इंद्र को अचूक वज्र और सम्पूर्ण सुविधायों और विलास से बनी रत्नजड़ित अमरावती प्रदान की गयी तो अहं में आकर इंद्र स्वयं को विशेष समझने लगा।  उसका हृदय और वर्ताव बिल्कुल बदल गया और थोड़े ही समय में उसका आचरण भी।”

तांडव - प्रकरण 6 3महादेवी को इतना गहरा रहस्य आज पहली बार पता चल रहा था। अपने आराध्य, गुरु और पति के लिए और भी सम्मान व प्रेम बढ़ गया। महादेव इतने सरल थे कि उन्होंने आज भी यह रहस्य विवशतापूर्वक ही खोला। देवी को दुःख लगा कि देवतायों की वजह से महादेव को विष पीना पड़ा और देवतायों की पुकार की वजह से शिव को उग्र काली स्वरूप से चोट खानी पड़ी, फिर भी महादेव ने अपनी करुणा का त्याग नही किया और ना ही किसी को दोषी ठहराया। दानव इतने भी अपराधी नही है, फिर भी देवी से उनका वध क्यों करवाया गया? इन्हीं विचारों से उनके नेत्र फैल गये और महादेव ने उनके विचार भंग करते हुए उनके मुख के आगे एक चुटकी बजाई। सत्य को जानकर नारद नेत्र नीचे करके बैठे थे।

“महादेव, अभी तो भविष्य के लिए निर्णय लेने का समय है।”

To be continued…..

           सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके। 

           शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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