“नही महादेव, मैं अतिथि नही, घर की सदस्य बन कर रहना चाहती हुँ।”

“अवश्य देवी, समय आने पर आप से आपकी मुख्य सेवा ले ली जाएगी। परंतु अगर फिर भी आपका मन है तो आप अपनी माता पार्वती से प्रार्थना कर सकती है।”

पास में बैठी माँ जगदंबा सारी बात मौन होकर सुन रहीं थी। आज देवी वामकेशी का व्यवहार और शब्द उन्हें थोड़ा अजीब लग रहे थे। माँ जगदंबा में और महादेव में किसी ने अंतर करने की बात सोची भी नही थी, जब कि देवी वामकेशी के शब्द कुछ ओर ही संकेत दे रहे थे।

माँ जगदंबिका तो प्रसन्नवदना माँ थीं। उन्होंने सोचा ‘सभी की मनोदशा, सारे समय एक समान नही रहती। जब महादेव सारी परिस्तिथियों और सबकी मनोदशा सम्भालने के लिए सक्षम है, तो मेरे मन में ऐसा भाव तक नही आना चाहिए। अगर मुझ में भाव आएगा तो संकल्प उत्पन्न होगा और वह बहुत दूर तक जाएगा। सो महादेव जो भी निर्णय ले, मेरे लिए वही सर्वोपरि है।’

“जैसे आपकी आज्ञा, आशुतोष। देवी वामकेशी को आपकी जो भी सेवा प्रिय लगती है, वही प्रदान की जाएगी।” माँ ने प्रसन्नता से अपनी स्वीकृति देते हुए कहा

माँ के ऐसे प्रेम पूर्वक वचन सुन कर देवी वामकेशी को मन में एक जीत और ग्लानि की एक हार महसूस हुई। जीत इसलिए क्यों कि महादेव की सेवा चुनाव करने का अवसर मिल गया और हार इसलिए कि जिन माँ जगदंबा को वह मन ही मन अपना शत्रु मान रही थी, उनका हृदय कितना विशाल था। बिना एक क्षण की देरी किए उन्होंने प्रसन्नता से महादेव की सेवा देवी वामकेशी को प्रदान कर दी। अगर यही प्रार्थना वे केवल माँ जगदंबा से करती तब भी उन्हें सेवा तो ज़रूर मिल जाती।

अगले दिन ही सारी सेवायों से अवगत करवाने के लिए माँ ने देवी वामकेशी को संदेश भेजा। भोजन सम्बंधित सेवा, देवी वामकेशी कर नही सकती थी क्यों कि इसके लिए पाक कला सीखनी पड़ती और समय उसी में व्यतीत हो जाता। महादेव के बाघछाल इत्यादि की सेवा साल में एक-दो बार होती थी। यह सेवा अत्यधिक कठिन भी थी और इसके साथ अन्य दुष्कर चुनौतियाँ भी थीं। इसलिए देवी वामकेशी ने इस सेवा को भी स्वीकार नही किया। देवी वामकेशी ने महादेव के स्थल की बुहारी(Cleaning service) की सेवा को चयन किया।

माँ ने देवी वामकेशी को यह सेवा सहर्ष प्रदान करते हुए कहा, “इस सेवा से आप केवल अपना भाव अर्पित नही कर रहीं बल्कि कहीं ना कहीं मेरी मदद भी हो रही थी। मैं जानती हूँ इस दिव्य सेवा को करने का आपका अनुभव बहुत ही चमत्कारिक होगा।” माँ जगदंबा की बात सुन कर देवी वामकेशी केवल मुस्कुरा दी। क्यों कि देवी वामकेशी के लिए यह सेवा कम और महादेव से बात करने का  अवसर अधिक था।

बुहारी की सेवा करते हुए देवी वामकेशी केवल अवसर की ताक में रहती थीं कि महादेव से कुछ अनुय-विनय कर सके। लेकिन महादेव अपने स्थल पर उस समय या तो उपस्तिथ ही नही होते थे या फिर अपने मुख्य गणों के साथ होते थे। और अवसर ना मिलने की वजह से देवी वामकेशी की चिंता बढ़ती ही जा रही थी। उन्हें लग रहा था कि जैसे समय बहुत तीव्रता से निकल रहा था और शायद कहीं ना कहीं उनकी आशा मरती जा रही थी। अपने ही भीतर के द्वंद्व के कारण से उन्होंने अक्सर बोलना बंद कर दिया था और कभी कभी रसोई घर में भी भोजन के लिए नही जाती थीं। महादेव सब कुछ देखते हुए भी मौन थे। शायद किसी उचित क्षण की प्रतीक्षा में थे।

नंदी के भीतर भी कुछ द्वंद्व चल रहा था। उसे पूर्ण जानकारी थी कि जगतजननी किस बात को लेकर परेशान थीं। और उसे यह भी पता था कि देवी वामकेशी, माँ जगदंबा की ही अंश थी। इसलिए वो सदैव गहरी सोच में रहता था। लेकिन एक आज्ञाकारी सेवक जैसे उसने कभी भी अपने मुख से कोई भी रहस्यमयी बात का ज़िक्र ना तो माँ को किया और ना ही महादेव को। परन्तु  नंदी, शंख से १०० कदम दूर रहता  था। उसे लगता था कि हर समस्या का आरम्भ शंख की मूर्खता से ही होता था। चाहे वो फिर महादेव और माँ के बीच की ग़लतफ़हमी हो या फिर अधूरे जल प्रवाह के कारण देवी वामकेशी के अवतरण का हो और अंत में उसकी एक घोषणा के कारण देवी वामकेशी के व्यवहार में परिवर्तन आना, एक बड़ी अशांति का आगमन था।

एक सुबह शंख, महादेव के लिए एक विशेष प्रकार के इत्र की धूप बना कर लेकर आया और महादेव के स्थल पर यहाँ-वहाँ लगा रहा था। जिस से सुगंध तो कम आ रही थी लेकिन धुआँ बहुत हो गया था। अत्यधिक धुआँ होने के कारण, अभी वायु में भारीपन आ गया था। वहाँ बुहारी करती हुई देवी वामकेशी ने उसको थोड़ा कहा भी कि ज़्यादा धुआँ करना ठीक नही। तो उसने इतराते हुए उत्तर दिया, “चिंता ना करे, देवी। मैं महादेव को आप से ज़्यादा जानता हुँ।” यह सुन कर देवी चुप हो गयी। वासुकि और २-३ सेवक गणों ने भी उसको समझाया। लेकिन उसका उत्तर था, “भक्त और महादेव की बात है। इसलिए आप मुझे, मेरे मन का भाव पूर्ण कर लेने दीजिए।” सभी जन शंख की दो टूक बात सुन कर चुप हो गये।

इतनी देर में नंदी वहाँ आ गया और सुबह की प्रणाम करने के लिए महादेव की प्रतीक्षा करने लगा। महादेव जैसे ही आए तो सभी अपनी अपनी बारी के अनुसार प्रणाम अर्पित कर रहे थे। नंदी का प्रणाम करने का ढंग सबसे भिन्न था। सबसे पहले वह महादेव की खड़ाऊँ से अपनी पीठ पर दो बार ज़ोर से प्रहार करता और फिर दण्डवत प्रणाम करके अपने अनजाने अपराधों के लिए मन में क्षमा प्रार्थना करता था। उसका ऐसा विश्वास था कि ऐसा करने से वह अपने सारे अपराधों का दंड स्वयं को दे रहा था।

जैसे ही नंदी की बारी आयी तो नंदी ने अपनी शक्ति अनुसार स्वयं की पीठ पर महादेव की खड़ाऊँ से ज़ोर से प्रहार किया। लेकिन खड़ाऊँ का प्रहार नंदी की पीठ पर नही हुआ और उसको लगा कि शायद गल्ती से उसका हाथ हवा में ही रह गया। इस बार उसने दुगुनी शक्ति लगा कर अपनी पीठ पर फिर से प्रहार किया। इस से पहले नंदी कुछ बुद्धि लगाता कि शंख के ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आयी, “हाय! मर गया। बचायीये महादेव।”

वास्तव में खड़ाऊँ नंदी की पीठ पर ना लग कर, पीछे खड़े शंख के सिर पर ज़ोर से लग रहीं थी जो कि नंदी के एक दम पीछे, सट कर खड़ा था। और नंदी की प्रणाम करने की इस अद्भुत प्रथा से पूर्णतः अनभिज्ञ था। शंख को लगा कि शायद नंदी, उसको क्रोध वश पीट रहा था।

द्वन्द 2

और दूसरी तरफ़ नंदी को समझ में ही नही आ रहा था कि वो क्षमा महादेव से माँगे या शंख से…

“क्षमा कर दो शंख, बिल्कुल पता ही नही चला।” नंदी ने हाथ जोड़ कर क्षमा माँगी और इसी बीच नंदी अपनी दण्डवत प्रणाम भी करना भूल गया था।

“नंदी, मुझे भी पता ही नही चला। आपसे अनजाने में हुआ है, सो जाने दीजिए।” शंख ने सिर को दबाते हुए औपचारिकता से कहा

यह सब दृश्य देख कर महादेव और अन्य सभी उपस्तिथ लोग बहुत ही हँसे। और वासुकि ने शंख की धूप और धुएँ की सारी कहानी महादेव को कह सुनाई।

यह सारा दृश्य देख कर देवी वामकेशी भी बहुत हँसी। और कुछ क्षण के लिए वो अपनी चिंता का कारण भी भूल गयी। हँसी, ईश्वर का दिया हुआ बहुत सुंदर उपहार है। लेकिन अपनी बात को लगातार सोचते हुये, उसी दुःख ने उन्हें फिर से घेर लिया। और मन में सोचा कि चाहे कुछ भी हो जाए, बिना समय व्यर्थ किए अब तो महादेव से अपने अस्तित्व के बारे में बात करनी ही होगी।

To be continued…

सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके।

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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