निःस्वार्थ सेवा 2

“माँ, यह मोदक को बहुत ही स्वादिष्ट बने है। मुझे लगता है ऐसे मोदक मैं पहली बार खा रहा हूँ।”

“नही भाई, ब्रह्मांड का ऐसा कोई मिष्ठान नही है जो अभी तक तुम ने नही खाया। याद करो, हम ने पहले भी यही वाले मोदक बहुत बार खाये है।”

“कितना अच्छा लग रहा है, इतने दिनों  बाद एक साथ बैठ कर भोजन करना। जब गणेश और कार्तिक का विवाह कर देंगे तो वधुयों से और भी विस्तृत परिवार हो जाएगा।”

“विवाह बाद में करेंगे, पहले इन्हें एक निपुण योद्धा की भाँति युद्ध नीति और अन्य विद्यायों में प्रशिक्षित करेंगे। भिन्न भिन्न प्रकार की विद्यायों में सशक्ता ही एक युवक का वास्तविक परिचय होता है। महाभिषेक के बाद गुरु वृहस्पति से इनकी शिक्षा आरम्भ करवा देंगे।”

“मैं चाहती हूँ कि दोनो बालकों की शिक्षा का उत्तरदायित्व आप लें। आप से बढ़ कर और कौन शिक्षक हो सकता है।”

“वाराणने, मुझ से शिक्षा प्राप्त करने के लिए दोनो बालकों को वही सब पड़ाव पार करने होंगे, जो अब तक अन्य जन करते आए है। तभी मैं इन्हें सर्वयोग्य बना पायूँगा। पुत्र होने के नाते इनके लिए किसी भी नियम की कटौती नही हो सकती। और मुझ तक पहुँचना इतना सरल नही है।”

“पिता जी ठीक कह रहे है, मैं एक शूर योद्धा बनना चाहता हूँ। जैसे बाबा मार्गदर्शन करेंगे, मैं वैसे ही अनुसरण करूँगा। मेरी विवाह में कोई रुचि नही है।”

“स्कंद, अगर तुम्हें एक बलशाली योद्धा बनना अच्छा लगता है तो तुम्हें ऐसी निपुण रणनीति की शिक्षा दूँगा कि मेरी अनुपस्तिथि में तुम चिंतामणि गृह तो क्या सम्पूर्ण ब्रह्मांड की देख-रेख भी करने के योग्य हो सकते हो। समय का कुछ भरोसा नही होता, वत्स।”

“और पुत्र गणेश, तुम्हें॰॰॰?”

“बाबा, युद्ध नीति सीखना तो अनिवार्य है ही। लेकिन मुझे कुशाग्रता से और निर्विघ्न कार्य सम्पन्न करना ज़्यादा अच्छा लगता है। कृपया आप मेरी दक्षता उसी में कीजिएगा। और”

“और क्या?”

“माँ, मुझे विवाह करना बहुत अच्छा लगता है। मैं दो विवाह करूँगा।” गणेश ने मोदक को ख़त्म करते हुए उत्तर दिया।

“दो? वो क्यूँ ?” महादेव ने खुल कर हँसते हुए पूछा

“क्यों कि अगर दो विवाह होंगे तो आहार भी दो-दो परोसे जायेंगे। भिन्न भिन्न प्रकार के मिष्ठान खाऊँगा। अगर एक भार्या उपस्थित नही है तो दूसरी तो होगी ही, आहार पूर्ति में बाधा नही आएगी।” गणेश ने थोड़ा सा शर्मा कर कहा

“भाई की सारी महत्वपूर्ण योजनायें आहार के आस-पास ही घूमती है।”

“मैं तो एक ही भार्या को ही हर समय प्रसन्न करने की चेष्ठा करता रहता हूँ और तुम००० इसके लिए तो तुम्हें श्री हरि से ही प्रशिक्षण दिलवाना पड़ेगा। वही एक मात्र ऐसे है जो सभी स्त्रियों को प्रसन्न करके रखते है।” महादेव ने एक व्यंग भरी मुस्कान से कहा 

“यह एक व्यापक भ्रम है कि आप बहुत सीधे है। बात केवल इतनी है कि विष्णु अपने कार्य को ज़्यादा प्रचार कर के करते है और आप रहस्यमयी ढंग से करते हो।” माँ ने मुस्कुराते हुए महादेव को कटाक्ष किया

“यह आप नही कह सकतीं, वाराणने। मेरा जैसा पति सभी को प्राप्त हो, इसलिए भी समस्त नारी जाति आपकी पूजा करती है।”

माँ लज्जा से मुस्कुरा कर बोली, “सो तो है, आशुतोष। आप प्रत्येक सम्बंध को यथायोग्य सम्मान देते है।”

जीवन में केवल ऐसे क्षण ही स्मृति में रहते है, जो क्षण हम शांति से, प्रेम से और हल्की हँसी-ठिठोली करते हुए अपने प्रियजनों के साथ व्यतीत करते है।

महाराज हिमालय के घर से १००००८ दुर्लभ जड़ी बूटियाँ उपहार स्वरूप में आ गयी थी। महाराज हिमवान ने इस बार उपहार के साथ महादेव के लिए कुछ विशिष्ट पत्तियाँ भेजी थी, जिनके सेवन मात्र से ही करोड़ों वर्षों तक शरीर को अन्न-जल की आवश्यकता नही रहती थी। ताकि कैलाश पर जाने पर उनके जमाता को खान-पान हेतु कोई कष्ट ना सहना पड़े।

सेवक गणों की टोलियाँ अलग अलग उपटन बनाने के कार्य में जुट गयी थी। और यह कार्य एक दिन का नही था। जैसे जैसे समय निकट आ रहा था, सेवक गण रात रात भर बैठ कर विभिन्न प्रक्रियायों में इस महत्वपूर्ण कार्य को सुचारू ढंग से पूरा कर रहे थे।

१५ नित्याएँ लम्बी यात्रा के बाद न्यौता देकर आ चुकी थी। श्री हरि ने देवी लक्ष्मी के साथ और श्री ब्रह्मा ने देवी सरस्वती के साथ सहर्ष आना स्वीकार कर लिया था। आते ही विश्राम किए बिना सभी सखियाँ सेवा में फिर से जुट गयी। यह १५ सखियाँ नही थी बल्कि माँ की परछाईयां थीं। पहले सभी सखियाँ युद्ध में सहचरियाँ बनी, काली स्वरूप के बाद जब माँ स्वस्थ नही थी तो सब ने मिल कर दिन-रात ना देखते हुए माँ की अत्यधिक प्रेम से और अथक सेवा की। उसके बाद माँ की आज्ञा से दंड लोक की प्रकृति को संतुलित करने में भी पूर्ण कौशल दिखाया। माँ की सभी आज्ञायों का पालन बिना किसी किंतु-परंतु के किया। सखियों की ऐसी स्वामिनी भक्ति से माँ स्वयं को धन्य मान रही थी। माँ को अपनी इन १५ सखियों पर अत्यधिक प्रेम आया क्यों कि आज तक सखियों ने माँ की केवल निःस्वार्थ सेवा की थी और निःस्वार्थ प्रेम ही किया था। और माँ, महाभिषेक के पावन उत्सव पर अपनी इन सखियों को कुछ विशिष्ट उपहार देना चाहती थी।

माँ ने सभी सखियों को अपने भवन में आमंत्रित किया। जब सभी माँ के कक्ष में प्रविष्ट हुई तो माँ के अतुलनीय सुंदर स्वरूप को देख कर सभी दंग रह गयीं। माँ के सौंदर्य को देख कर उनके नेत्र वही ठहर गए थे। उन्हें लगा कि शायद माँ ने अपनी सौंदर्य सज्जा के लिए किन्हीं और सेविकायों को नियुक्त कर लिया है जो शायद उन से भी अच्छी सेवा करती हो। माँ ने मुस्कुराते हुए सभी को बैठने का संकेत किया।

निःस्वार्थ सेवा 3

सबसे पहले माँ ने अपना रत्न जड़ित माँग टिका उतार कर, उसे अभिमंत्रित कर कामेश्वरी देवी को पहना दिया और एक बीज मंत्र कामेश्वरी देवी के कान में उच्चारण कर उनकी माँग में अपना सिंदूर भी भर दिया। यह देख कर कामेश्वरी देवी ने घबराहट में कुछ कहना चाहा परंतु माँ ने मुस्कुराते हुए संकेत से उन्हें कुछ ना कहने के लिए कहा।

फिर माँ ने अपने मस्तक की माणिक्य की बिंदी उतार कर, अभिमंत्रित करके भगमालिनी देवी को लगा दी और उनके केशों में अपनी केश सज्जा में लगे चम्पा के पुष्प भी उतार कर लगा दिए। सभी देवियाँ मौन हो गयी लेकिन मुख पर एक किंतु लेकर बहुत हैरानी से देख रही थी। क्या हो रहा था, किसी की समझ में कुछ नही आ रहा था।

देवी नित्यकलिन्ना के नेत्रों में अपने दिव्य नेत्रों का काजल एक बीज मंत्र का उच्चारण करके लगा दिया और अपना कस्तूरी मणि जड़ित मुकुट भी पहना दिया।

देवी भारूँड़ा को नासिका का ऋंगार, नासिका का बहुत बड़ा हीरे का बिंदु प्रदान किया गया। इसकी चमक रात्रि के समय आलौकिक होती थी।

देवी वहनिवासिनी को अपने कंठ का मंगल सूत्र अभिमंत्रित करके पहनाया, इसके मोती काले रंग कर ना होकर सिंदूरी रंग के थे।

देवी महाव्रजेश्वरी को माँ ने माणिक्य और कुंदन से निर्मित बहुमूल्य अपने कर्ण कुण्डल अभिमंत्रित करके पहना दिए। दिन के पहर के साथ साथ इनका रंग और भार भी बदलता था।  

इसके बाद शिवदूति देवी को माँ ने अपने विशिष्ट कवच बाजूबंद जो कि विशेष प्रकार की धातुयों जैसे सोना, कांस्य और हीरे की कणी से निर्मित थे, अभिमंत्रित करके पहना दिए।

त्वरिता देवी को माणिक्य और हीरे से बनी अभिमंत्रित चूड़ियाँ पहना दी। इन चूड़ियों की खनक से वातावरण सहज ही ख़ुशनुमा रहता था।

देवी कुलसुंदरी को विशेष अँगूठी अभिमंत्रित करके पहना दी। यह अँगूठी महादेव ने माँ को उपहार में दी थी ताकि जब भी माँ महादेव की अनुपस्तिथि में महादेव के दर्शन करना चाहे तो  दर्शन कर सकती थी।

देवी नित्या को माँ ने सोने, माणिक्य और कुंदन से निर्मित अपने हाथफूल अभिमंत्रित करके पहना दिए। यह हाथफूल माँ को स्वर्ग की अप्सरायों ने मिल कर उपहार में दिए थे।

देवी नीलपताका को सोने और कुंदन से निर्मित सिंहमुख आकृति का कमरबंद अभिमंत्रित करके पहना दिया।

देवी विजया को माँ की अभिमंत्रित पायल पहनायी गयी, चलने पर इस पायल में से अति मधुर स्वर निकलते थे। यह माता मैना से प्राप्त हुई थी।

देवी सर्वमंगला को माँ ने हीरे से निर्मित गोलाकार अभिमंत्रित बिछुए दिए जो कि चरणों में एक दिव्य दर्पण का कार्य भी करते थे।

देवी ज्वलमालिनी को माँ ने अपनी दिव्य सुगंध से विभूषित किया, ताकि ज्वलमालिनी देवी जहाँ भी आगमन करे, सभी को माँ के आने का आभास हो।

और अंत में देवी चित्रा को माँ ने हीरे, स्वर्ण और मोतियों से बनी अपनी लाल चुनरी औढा दी।

इस प्रकार माँ ने अपना अतुलनीय ऋंगार और सौंदर्य अपनी विशिष्ट प्रिय सखियों में प्रसन्नता से बाँट दिया और माँ स्वयं ऋंगार रहित हो गयी।

To be continued…

           सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके। 

           शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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Sadhvi Shraddha Om

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