My obeisance to the lotus feet of Swamiji,
I thank SriHari Bhagwan,Swamiji for giving me an opportunity to write.
पक्षिराज गरुड़ 2नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्पक्षिराज गरुड़ 3

पक्षिराज गरुड़ 4

ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथं ॥

पक्षिराज गरुड़ 5

A Shlok on Garuda…

कुंकुमआंकीत वर्णनाय कुन्देंदु धवलाय च विष्णु वाहनमस्तुभ्यं पक्षिराजाय ते नम :

One who has the complexion of Kumkum, one who shines like the bright moon
I pray to the Vahana of Vishnu, who is the king of the Birds.

गरुड़ जी भगवान विष्णु का वाहन हैं। भगवान गरुड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है।पक्षियों में गरुड़ को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यह समझदार और बुद्धिमान होने के साथ-साथ तेज गति से उड़ने की क्षमता रखता है।
वेदों के अनुसार गरुड़ जी के दो पंख सामवेद के ही दो भाग है जिनहें ‌ब्रिहत और रथांतरा कहते हैं ।

कश्यप ऋषि एक वैदिक ऋषि थे। इनकी गणना सप्तर्षि गणों में की जाती थी। हिन्दू मान्यता अनुसार इनके वंशज ही सृष्टि के प्रसार में सहायक हुए।कश्यप ऋषि प्राचीन वैदिक ॠषियों में प्रमुख ॠषि हैं जिनका उल्लेख एक बार ॠग्वेद में हुआ है।

दक्ष प्रजापति को अन्य प्रजापतियों के समान ब्रह्माजी ने अपने मानस पुत्र के रूप में उत्पन्न किया था।दक्ष प्रजापति की कद्रू और विनता नामक दो कन्याएँ थीं। उन दोनों का विवाह कश्यप ऋषि के साथ हुआ। कश्यप ऋषि से कद्रू ने एक हजार नाग पुत्र और विनता ने केवल दो तेजस्वी पुत्र वरदान के रूप में माँगे। वरदान के परिणामस्वरूप कद्रू ने एक हजार अंडे और विनता ने दो अंडे प्रसव किये। कद्रू के अंडों के फूटने पर उसे एक हजार नाग पुत्र प्राप्त हुए, किन्तु विनता के अंडे उस समय तक नहीं फूटे। उतावली होकर विनता ने एक अंडे को फोड़ दिया। उसमें से एक अरुण नामक बालक उत्पन्न होता है जिसके शरीर के ऊपरी भाग के अंग पूर्ण रुप से विकसित हो चुके थे किन्तु शरीर का निचला भाग पूर्ण रुप से विकसित न हो सका था । इस कारण वह आधे शरीर का रह गया । उस बालक ने क्रोधित होकर अपनी माता को श्राप दे दिया कि माता, आपने समय से पहले शीघ्र ही अंडे को तोड़ दिया है जिसके कारण मेरा यह शरीर पूर्ण रूप से विकसित न हो सका इसलिये आपको पाँच सौ वर्षों तक अपनी सपत्नी की दासी बनकर रहना होगा। ध्यान रहे दूसरे अंडे को अपने से फूटने देना। उस अंडे से एक अत्यन्त तेजस्वी बालक होगा और वही आपको इस श्राप से मुक्ति दिलायेगा। इतना कहकर अरुण नामक वह बालक आकाश में उड़ गया और सूर्य के रथ का सारथी बन गया |

पक्षिराज गरुड़ 6

एक दिन कद्रू और विनता दोनों टहलने निकलीं की उनकी दृष्टि समुद्र मन्थन से निकले हुऐ उच्चैःश्रवा घोड़े पर पड़ी। कद्रू ने कहा कि उस घोड़े की पूँछ काली है जबकि विनता ने उसे सफेद रंग का बताया। इस पर दोनों में शर्त हुई कि जिसका कथन गलत होगा उसे दूसरे की दासी बनना होगा। दोनों शर्त मानकर पूँछ देखने चलीं। कद्रू ने चुपके से अपने पुत्रों को उस पूँछ से लिपट जाने की आज्ञा दी इससे पूँछ काली दिखाई पड़ने लगी। विनता हार मानकर कद्रू की दासी बन गयी।

पक्षिराज गरुड़ 7

समय आने पर विनता के अंडे से महातेजस्वी गरुड़ जी‌ की उत्पत्ति हुई। उनकी शक्ति और गति दोनों अद्वितीय थी। अरुण भगवान सूर्यनारायण के सारथी बनें और गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन बनें और गरुड़ों के राजा हैं ।

एक दिन कद्रू ने गरुड़ से कहा कि तुम मेरी दासी के पुत्र हो इसलिये तुम मेरे पुत्रों को घुमाने ले जाओ। गरुड़ को इस पर बहुत क्रोध आया किन्तु उन्होंने उपमाता की आज्ञा मान ली। सर्पों को घुमाते हुए गरुड़ ने उनसे अपनी माता को दास्यता से मुक्त कर देने के लिये कहा। इस पर सर्पों ने कहा कि यदि तुम हम सर्पों के लिये अमृत ला दोगे तो हम तुम्हारी माता को दास्यता से मुक्त कर देंगे। तुरंत ही गरुड़ जी निश्चित करते हैं कि वह शीघ्र ही इंद्रलोक से अमृत प्राप्त कर आपनी माता को दास्यता से ‌मुक्ति दिलायेंगे। गरुड़ जी इन्द्रलोक में इंद्र सहित सभी देवताओं को परास्त कर अमृत घट प्राप्त कर लेते हैं ‌। गरुड़ के पराक्रम से प्रभावित होकर इन्द्र ने गरुड़ से मित्रता कर ली। मित्रता हो जाने पर इन्द्र बोले, “मित्र! आप इस अमृत घट को मुझे वापस दे दीजिये क्योंकी आप जिनके लिये इसे ले जा रहे हैं वे स्वभावतः बहुत दुष्ट हैं।” इस पर गरुड़ ने कहा, “मुझे पता है किन्तु मैं अपनी माता को दास्यता से मुक्ति दिलाने हेतु इसे उनके पास ले जा रहा हूँ। आप वहाँ से इसे वापस ला सकते हैं।
तभी उनकी भेंट भागवान नारायण (विष्णु) से हुई,
बोलो श्रीहरि भगवान की जय !!!

पक्षिराज गरुड़ 8

पक्षिराज गरुड़ 9

गरुड़ जी के पास अमृत घट थी परंतु अमृत सेवन करने का उन्हें यह विचार कदापि नहीं आया । वे केवल और केवल अपनी माता को दास्यता से मुक्ति दिलाने ‌हेतु अमृत प्राप्त कर लाए थे ।
भगवान विष्णु को गरुड़ जी की ‌यह बात बहुत अच्छी लगी ।भगवान नारायण ने गरुड़ के बुद्धि कौशल से प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा। इस पर गरुड़ ने सदा उनकी ध्वजा में बने रहने के‌ साथ ही में भगवान नारायण के वाहन भी बननें का वर माँगा । इसके पश्चात् गरुड़ जी‌ अमृत घट को सर्पों को देकर अपनी माता विनता को दास्यता से मुक्ति दिलाई।

पक्षिराज गरुड़ 10

इससे पहले की सर्प अमृत का सेवन ‌आरंभ करते,गरुड़ जी ने सर्पों से स्नान कर ‌पवित्र होने को कहा ।तत्पश्चात् अमृत घट को कुशासन पर रख कर सारे सर्प पवित्र होने के लिये स्नान करने चले गये। इसी बीच इन्द्र चुपके से उस अमृत घट को उठा कर ले गये। सर्पों ने देखा की ‌अमृत घट को इंद्र ले‌ गए और उस घट से कुछ अमृत के बूंद कुशासन पर गिर गये।सर्पों ने उन बूंदों को अपनी जि‌व्हा से लेने का प्रयास किया परंतु जिव्हा कुशासन को लग कर दो भाग हो गया । यही कारण है की सर्प की जिव्हा दो‌‌ भागों में बँटी हैं ।

इसके‌ अतिरिक्त ‌गरुड़ जी ने समुद्र मंथन ‌में भी‌ अपना योगदान दिया है मन्दराचल‌ पर्वत को वे स्वयं उठा लाए ।

श्रीहरि भगवान की जय,गोविन्द,गोविन्द,गोविन्द,नमो पार्वतिपतये हर हर महादेव,शम्भो🙏🏻🌷🌼🌺☘️💐

Pictures taken from Pintrest.
some information taken from Wikipedia,Hindi.webdunia.

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