महादेव ने जो निर्देश दिए थे, उनका स्मरण नंदी को अब हो रहा था। नंदी को याद आ रहा था कि शत्रु को कभी भी निर्बल नही आंकना चाहिए और इस दैत्य से आरम्भ में शांतिपूर्वक वार्ता करनी चाहिए थी, शायद कुछ और निष्कर्ष निकलता। लेकिन नंदी इस दैत्य से क्षणों में ही परास्त हो चुका था।

दैत्य, नंदी की गर्दन पर अपने नाखून गढ़ा कर बोला, “क्या तुम्हें अब भी मेरा परिचय चाहिए, तो सुन।”

पराजय में जय! 2

“मैं चिंतामणि गृह के मोक्ष वन में रहने वाला एक बाघ था। एक दिन वन से इधर-उधर टहलता हुआ, गिरिगंगा के तट पर जल पीने गया। वहाँ मैंने कुछ लोगों को जल में कुछ सामान फेंक कर भागते देखा। जब मैंने उन लोगों का पीछा किया तो देखा कि मानसरोवर झील में महोत्सव मनाया जा रहा था। सारे नगर को झील पर उपस्थित देख कर, मैं नगर में विंदास होकर घूम रहा था। घूमते घूमते मैं चिंतामणि गृह के राजमहल में जा पहुँचा। और वहाँ पर पहुँच कर मेरे आश्चर्य की कोई सीमा नही थी क्यों कि वहाँ एक भी पहरेदार नही था, जो मुझे रोकता या डरा कर भगा देता। महल के एक एक कक्ष में घूमता हुआ, मैं महादेव के अंतरंग कक्ष में जा पहुँचा। वहाँ मैंने महादेव के दिव्य कुंडल, रुद्राक्ष मालाएँ और बाघछाल देखी। जैसे ही मैं उस बाघछाल के ऊपर बैठा तो मेरा आधा स्वरूप एक बाघ से अर्धपुरुष में परिवर्तित हो गया। और जब मैंने कुंडल और मालाएँ पहन ली तो मेरा मुख मंडल और सम्पूर्ण देह एक दिव्य पुरुष की भाँति हो गयी। और बुद्धि में भी विकास हुआ।” “अभी मैं जा ही रहा था कि मैंने देखा, महादेव अंदर तेज़ी से आ रहे थे। महादेव ने तुम्हें बुलाया और पूछा कि क्या तुमने पूजा की थाली और सामग्री जल में विसर्जित कर दी थी? और तुम उत्तरहीन हो गए थे।”

“मैंने महादेव और तुम्हारा संवाद सुना। और बिना कोई आवाज़ किए चुप-चाप, पीछे के मार्ग से मोक्ष वन चला गया था। उसके कुछ दिन बाद मैंने महादेव को श्मशान में यज्ञ करते और समाधि में बैठे देखा। उनके स्वरूप से सम्मोहित हो मैं प्रत्येक रात्री उनके दर्शन करने के लिए वहाँ जाने लगा। उनके दर्शन मात्र से श्मशान में ही मुझ में सहज ही वाणी का ज्ञान और ध्यान उत्पन्न हो गए। अब मैं एक दिव्य पुरुष की देह में था और लगातार महादेव और माँ जगदंबा के बारे में सोच रहा था। कभी कभी तुम्हारे लिए भी मन में विचार उत्पन्न होता कि महादेव ने एक मूर्ख बैल को अपनी सेवा में कैसे रख लिया? अगर उनको अपनी सेवा में पशु ही रखने है तो उनकी सेवा में तो कोई मुझ जैसा कोई बुद्धिमान, साहसी और चतुर होना चाहिए। उनके सेवकगण से तो कुछ ओर अपेक्षाएँ होनी चाहिए। होना तो यह चाहिए कि तुम्हारे जैसे मूर्ख की जगह, उन्हें मुझ जैसे बलशाली सिंह को अपना वाहन बनाना चाहिए। लेकिन क्या वास्तव में महादेव त्रिलोकी के नाथ है? क्या वो मेरे स्वामी बनने के योग्य है? और मेरा यह दिव्य पौरुष किस काम का, जब तक इसका प्रदर्शन सारे लोकों में ना किया जाए।”

“इसी औचित्य से मैंने पहले भी एक बार आक्रमण किया था। निःसंदेह महादेव एक महान सिद्ध पुरुष है। लेकिन उनका ऐसे इतना साधारण और वैरागी होकर रहना उनके हित में नही है। उनकी इतनी करुणा उन्हीं के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। वासुकि और तुम्हारे साथ आज युद्ध करके मेरी सारी शंका दूर हो गयी।।”

“तुम अभी महादेव और माँ जगदंबा के सामर्थ्य बारे में जानते ही क्या हो?” नंदी ने छटपटाते हुए कहा

“त्रिलोकी के नाथ बने रहने के लिए, सामर्थ्य के साथ साथ, बुद्धि और चतुर्य की भी आवश्यकता होती है। मुझ जैसे सिंह पुरुष को अपना दास बनाने के लिए, उसे रण में जीतना पड़ता है। सो तुम जाओ और मेरा संदेश, देवी पार्वती और महादेव को सुना दो। मैं उन्हीं की कथित संतान हुँ। अगर वह मुझे रणभूमि में परास्त कर देते है, तो मैं उनका दास बन कर आजीवन भर उनकी सेवा करूँगा और अगर मेरे पौरुष से हार जाते है तो वे दोनो चिंतामणि गृह को छोड़ कर कहीं और निवास करे।”

“मुझे तुम पर दया आ रही है। महादेव का इतना महा-प्रसाद और आशीर्वाद प्राप्त होने पर भी तुमने अपनी पशु प्रवृति को रत्ती भर नही त्यागा। तुमने करुणा और सद्गुण अपनाने की जगह अपनी क्रूर प्रवृति को इतना बल दिया कि आज तुम स्वयं मृत्यु का आवाहन कर बैठे।” नंदी ने उसके नाखूनों से अपनी गर्दन को छुड़ाते हुए कहा।

“नंदी, तुम यह कहते हुए शोभा नही देते क्यों कि तुमने मुझ से परास्त होकर अपने महादेव के सम्मान को ठेस पहुँचायी है। तुम्हारी जगह मैं होता तो अपने प्राण यहीं त्याग देता! अब जाओ, एक परास्त दूत भाँति मेरा यह संदेश महादेव के पास देकर आओ।” ऐसा कह कर उसने नंदी को एक घूँसे के प्रहार से दूर फेंक दिया और स्वयं अदृश्य हो गया।

नंदी और वासुकि, घायल अवस्था में बहुत ही शर्मिंदगी से महादेव के पास सभा कक्ष में पहुँचे। वहाँ पर पहले से ही माँ जगदंबा, देवी वामकेशी, गणेश और स्कंद आदि सभी विराजमान थे। सभी को नंदी और वासुकि के परास्त होने का समाचार मिल चुका था और यह एक गहन चिंता का विषय था। क्यों कि नंदी और वासुकि को परास्त करना इतना सरल नही था और दूसरे वे दोनो सेना नायक थे।

“फिर क्या हुआ अगर परास्त हो गए? विजय के साथ साथ पराजय को भी प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए। पराजय, विजय को प्राप्त करने की प्रथम सीढ़ी होती है।” महादेव के श्री मुख से ऐसा सुन कर नंदी और वासुकि दोनो महादेव के चरणो में शीश रख कर बच्चों जैसे रोने लग गए।

“क्षमा कर दीजिए, महादेव। परंतु अगर यह पराजय केवल निजी होती तो कोई दुःख नही होता। लेकिन हम आपके प्रतिनिधि बन कर गए थे, हम ने आपके नाम को परास्त किया है।”

“एक क्षण के लिये भी ऐसा मत सोचो। आज पराजय हुई है, कल विजय हो जाएगी। आप लोग कायरों की तरह प्राण बचा कर भाग कर नही आए। सो विषाद का त्याग करो।” महादेव ने प्रेम से दोनो के ज़ख्मों को स्पर्श करते हुए कहा

नंदी ने उदास मन से आक्रमण की सारी बात सारी सभा में सुनाई।

“बाघासुर को सेवा में भी लेंगे और इस महा अपराध के कारण दंड भी देंगे।” महादेव ने मुख पर एक बड़ी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा

“महादेव! आप पशुपतिनाथ भी हो!” सहसा माँ जगदंबा के मुख से महादेव के लिए निकला, “आज से आपको मैं एक नये नाम के साथ सम्मानित करती हुँ। पशु ही एक ऐसी योनि है जिन्हें सेवा में भी रखा जाता है और अपराध होने पर दंड भी दिया जाता है। लेकिन आपने इस उग्र पशु का त्याग ना करके, बल्कि उसको अपनी सेवा में लेने का निर्णय लिया है। पशुपतिनाथ की जय हो!!”

“परंतु नंदी की सेवा को विराम और बाघासुर को सेवा का पुरस्कार? ऐसा क्यों, बाबा?” स्कंद ने प्रश्न किया

“नंदी की सेवा को कभी भी विराम नही दिया जाएगा। मेरा वाहन सदैव नंदी ही रहेगा। यह सत्य है कि एक सेवक में बुद्धि और साहस होना आवश्यक है लेकिन सेवा करने के लिए सबसे अधिक  विनम्रता होनी चाहिए। नंदी और वासुकि में वे सभी गुण विद्यमान है जो कि एक सभ्य सेवक में होने चाहिये। मैं इनकी स्वामी भक्ति से अति प्रसन्न हुँ।”

पराजय में जय! 3

“बाघासुर को भी अति विशिष्ट सेवा प्रदान की जाएगी। वह देवी जगदंबा का वाहन होगा और देवी जगदंबा ‘सिंहवाहिनी’ के नाम से भी प्रसिद्ध होंगी।” “बाघासुर ने हर क्षण यही सोचते हुए व्यतीत किया है कि कब उसे मेरी और देवी जगदंबा की सेवा प्राप्त होगी। जब उसकी बुद्धि एक ही विचार को सोचते-२ उग्र हो गयी तो उसने आक्रमण करके हमें आगाह किया और ईर्षा में उसने नंदी और वासुकि को अपमानित करते हुए उन्हें अकारण आघात पहुँचाया। बाघासुर को यह सेवा उसके अगले जन्म में उसके चित्त की शुद्धि के बाद प्राप्त होगी। वह फिर से इसी सिंह योनि में जन्म लेगा, प्रवृति भी सिंह की होगी लेकिन बिना द्वेष के। अभी तो इस महापराध के लिए उसको मृत्यु दंड भोगना होगा।”

To be continued…

सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके।

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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