सुबह सुबह जब बाहर निकलता हूं तो पहाड़ों की ऊंची ऊंची चोटियां गर्व से सर ऊंचा किए स्वागत करती है,अलकनंदा की संगीत सुनाती शोर तीव्र गति से गुंजायमान हो रही होती है,पहाड़ी हवाओं के थपेड़ों से चीड़ के पेड़ों की पत्तियां अठखेलियां करती नजर आती हैं,और कुछ ही समय में जब सूरज मुस्कुराते हुए निकलता है तो ऊंची चोटियों पर जमी बर्फ अद्भुत स्वर्णिम आभा लिए खिलखिला पड़ती है।इतना सुंदर और मनमोहक नजारा है प्रकृति का ,,,,ये वही प्रकृति है जो हमें फल,पुष्प,औषधि,ईंधन,जल,हवा क्या कुछ नहीं देती है।क्या गजब की व्यवस्था है ईश्वर की।हिमालय की उचाईयो में पाए जाने वाले पेड़ो की आकृति कुछ इस तरह होती है कि उस पर बर्फ गिरते ही फिसल जाएं।कितना बड़ा कलाकार है मेरा श्री कृष्ण जिसने प्रकृति की इतनी सुंदर व्यवस्था की है।
यहां सब कुछ लगभग नेचुरल ही है।कृत्रिमता पर निर्भरता नाम मात्र ही है।जब बर्फीली चोटियों से पिघलकर निकलती ताजे झडने की ओर उपर गया तो पाया कि उसी झडने के जल को बिना किसी यंत्र के पाइप लगाकर लोग अपने घरों में पानी की जरूरत पूरी करते हैं।झडने का पानी ही पाइप से इकठ्ठा करके पीने और अन्य कामों में लाया जाता है।इतना साफ पानी है और वो भी नेचुरल जिसमे पहाड़ों की जड़ी बूटियां भी मिली होती हैं।यहां के लोग पढ़े लिखे तो कम होते हैं पर दिल के साफ होते हैं।उसी इलाके में हूं जहां जोशीमठ के पास तपोवन में कुछ महीने पहले ग्लेशियर फटा था।ग्लोबल वार्मिंग तो एडवांस समाज की देन है न।यहां के लोग भले ही कम पढ़े हैं लेकिन कोई भी ऐसा काम नहीं करते जिससे प्रकृति में असंतुलन पैदा हो,जबकि हमने ऋषिकेश और हरिद्वार के साथ वाले जंगलों मे सैकड़ों जगह पर शराब की बोतलें,सिगरेट के डब्बे,चिप्स के फटे पैकेट,बिस्किट के पैकेट्स,पानी के बॉटल्स भरे पड़े देखे।ये सारे गन्दगी उन्ही लोगो ने फैलाए और फैलाएंगे जिन्हे हम पढ़े लिखे एडवांस सोच वाले प्रगतिशील मनुष्य कहते हैं।ये तथाकथित प्रगतिशील लोग प्रकृति का दोहन करना और उसे गंदा करके ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाना ही अपनी बुद्धिमानी समझते हैं।किसी भी तरह बस भोग लो सुख चाहे बदले मे प्रकृति को कितना ही नुकसान क्यों न हों।
तो प्यारे दोस्तों कुछ तो हमें अपने अंदर संवेदना जागृत करनी होगी।प्रकृति से हमें वो सब चीजें मिलती हैं जिन्हें हम पैसे से खरीद नहीं सकते।हमारी सबसे मूलभूत और सबसे आवश्यक वस्तु फ्री में मिलती है।पर अंतर देखो कि विकसित कहलाने वाले लोगों का और अविकसित कहलाने वाले लोगों का दोनों का इस मा प्रकृति के प्रति कैसा व्यवहार है।क्या करना है और क्या नहीं करना है ये सबको पता रहता है।आप बस प्रभू के एहसान को मानो कि उसने आपको बहुत कुछ दे रखा है पर उनकी दी हुई वस्तु का उपभोग तो करना है लेकिन लापरवाह होकर दोहन नहीं।नहीं तो जिस समय भी ये प्रकृति अपना रोष प्रकट करती है उस समय आपके तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों पर पानी फिर जाता है,आश्चर्य होता है जब हम कई दिनों तक पहाड़ों पर जगह जगह आग लगी हुई पाते हैं तो।हमने कुछ लोगों से पूछा तो पता चला कि लोग जान बूझकर आग लगाते हैं। सोचो कितनी हजार एकड़ भाग में जंगल जल गए कितने पशु पक्षी जल गए ये तो बस कुछ दिन पहले की बात है सब जानते होंगे। कैसी मानसिकता है लोगों की।फॉरेस्ट डिपार्टमेंट वाले भी क्या करेंगे ,वो कुछ नहीं कर सकते इतनी तेजी से और नुकीली पहाड़ियों पर फैले आग की विभीषिका का नियंत्रण उनके वश की नहीं।जबतक वर्षा नहीं पड़ती तबतक आग फैलती रहेगी और नुकसान करती रहेगी । इन पहाड़ों पर सुंदर झडने,विविध प्रकार के फल ये सब हमने खुद देखे हैं जिनको कोई उपयोग में ला सकता है।प्रकृति कभी अपने उपहारों की कीमत नहीं मांगती बस सम्मान चाहती है।अगर आप प्रकृति के प्रति संवेनशील हैं तो मेरे श्री कृष्ण के प्रति भी झुके हैं।ये आवश्यक है मेरे लिए,आपके लिए सबके लिए और इस ग्रीन प्लानेट के लिए भी।आज इतना ही 🌴🌴🌳🌳✨✨🌻🌻🌹🌹🌿🌿🙏

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Ashu Harivanshi

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