प्रिय मित्रों, मेरे साथ बने रहने के लिए बहुत धन्यवाद। पिछले पोस्ट में मेने आपको धृतराष्ट्र और संजय के वार्तालाप के विषय में बताया था। यह पोस्ट उसी का अगला भाग है।

दुर्योधन को पता है कि महा प्रतापी पितामह भीष्म द्वारा उसकी सेना आरक्षित है,और पांडवों की सेना भीम द्वारा। उसे लगता है कि वह तो बड़ी ही आसानी से पांडवों को हरा सकते हैं। यहां उसे घमंड हो रहा है। वह पांडवों की सेना को कमतर आंक रहा है।

दोस्तों, अगर चुनौती और समस्या को देखकर बिना उसका आंकलन किए हमें लगता है कि हम जीत जाएंगे, तो यह  विश्वास या आत्मविश्वास तो हो सकता है, परंतु घमंड नहीं। और अगर घमंड हुआ, तो फिर यह हमारे पतन (हारने) की शुरुआत है।

दुर्योधन गुरु को कहते हैं कि हमें पितामह भीष्म की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि उनके हारने का मतलब है- कौरव सेना का हारना।

इसी प्रकार हमें भी जितना हो सके, अपनी सबसे बहुमूल्य वस्तु को बचा कर रखना चाहिए। जब तक कि हम अपनी समस्या का हल ढूंढ ना निकालें।

पितामह भीष्म ने भयानक शंख भेरी के साथ ही युद्ध आरंभ होने की घोषणा कर दी, जिससे दुर्योधन प्रसन्न हो गया। युद्ध भयंकर होते हैं, मनोरंजक नहीं। और यह तो इतिहास का सबसे भयानक युद्ध आरंभ हुआ था। पितामह भीष्म के शंख बजाते ही दोनों ओर से भयंकर नगाड़े, ढोल, नरसिंघे, शंख, इत्यादि बजे उठे। जिससे चारों दिशाओं में बड़ा ही भयानक कोलाहल गूंज उठा।प्रथम अध्याय: अर्जुन विषाद योग- भाग २ 2

हर चुनौती, युद्ध अपने किस्म के हालात लाती है। हमें फिर उन सब के लिए तैयार रहना चाहिए।

दोनों ओर के महारथियों ने अपने-अपने महाशंखों को बजाया। यह शंख ध्वनि अपनी-अपनी सेनाओं के मनोबल को बढ़ाने और ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज  करने के लिए की गयी थी।

आज के समय में अगर हम किसी भी परिस्थिति में फंसते हैं, तो अपने आप को उत्साहित करने के लिए कोई संगीत सुनते हैं, या कोई प्रेरक संवाद सुनते हैं, कुछ भगवान को याद करते हैं, कुछ अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेते हैं। सभी अपने-अपने तरीके से प्रेरणा लेते हैं, और अपनी समस्या से निपटने के लिए तैयार होते हैं। सच्चा योद्धा तो वही होता है, जो हमेशा युद्ध या हर परिस्तिथियों के लिए तैयार रहता है।

शीघ्र फिर भेंट होगी।

To be continued..

ॐ श्री कृष्णार्पणमस्तु।

 

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Chanchal Om Sharma

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