आपकी प्रेमपूर्ण व प्रशंसा से भीगी, भीनी- भीनी सुगंधित
टिप्पणियां ने मुझे यह पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित… नहीं-
नहीं…….मजबूर कर दिया है।
क्या एक स्त्री भी प्रशंसा की अधिकारी है ? 😯क्योंकि मुझे प्रशंसा सुनने की ज्यादा आदत नहीं है।😟आप सब ही प्रशंसा के अधिकारी है।😍😍
मैने एक सत्संग में सुना था कि किसी भी व्यक्ति के व्यवहार से ही उसके स्वयं के व्यक्तित्व का पता चलता है, न कि सामने वाले व्यक्ति के व्यक्तितव का।( हम इसका विपरीत समझते है)।
कुछ परिवारों में स्त्री की प्रशंसा को पाप समझा जाता है, यदि कोई दूसरा भी प्रशंसा करें तो उनको घूर कर रोक दिया जाता है।पता है, क्यों?
क्योंकि उनको लगता है कि प्रशंसा करने से वह व्यक्ति बिगड़ जाएगा। या उनके सिर पर सवार हो जाएगा ( इन्हीं शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं )।
माना जाता है कि .. गृहकार्य ( सुबह 5:00 से रात के 10:30- 11:00 बजे तक)तो उसकी जिम्मेदारी और कर्तव्य है व परिवार का अधिकार ।
स्त्रियों को दो समय का भोजन बनाने के अतिरिक्त काम ही क्या होता है, तब प्रशंसा किसलिए ?
कभी-कभी तो यह भी कह दिया जाता है कि तुमको हमारी प्रशंसा करनी चाहिए क्योकि यदि हम तुमसे विवाह करके अपने घर नहीं लाते तो तुम सड़कों पर धक्के खाती फिरती( घूमती )😢क्या वह सचमुच विवाह से पहले सड़कों पर धक्के खाती मिली थी?😦
 एक मत यह भी है कि स्त्री के किसी काम की प्रशंसा न करें बल्कि उसके प्रत्येक कार्य मे दोष निकालते रहने से वह डर कर सदैव आपकी आज्ञाकारी रहेगी।
बताइए …..किसी की प्रशंसा करने से बचने के लिए मनुष्य दूसरे का कितना दिल दु:खाता है।वह भी किसका….(शास्त्रमतानुसार स्त्री लक्ष्मी का स्वरूप होती हैं )हा हा हा…….
वैसे धन रूपी लक्ष्मी को बहुत सम्मान से अपने पास सुरक्षित रखा जाता है।वाह क्या बात है ।😎
क्या आपको नहीं लगता कि आध्यात्मिक उन्नति की बात करने से पहले अपने मानसिक उन्नति के लिए कुछ प्रयास करना चाहिए? मुझे नहीं पता कि मुझे यह पोस्ट लिखनी चाहिए थी या नहीं, परंतु यदि कोई ऐसा करता है तो मेरा विनम्र निवेदन है कि वह किसी में ईश्वर को देखे या ना ,परंतु उसको एक मनुष्य समझ कर उसके साथ उचित व सौहार्दपूर्ण व्यवहार अवश्य करें ,क्योंकि वास्तविक सम्मान आप तभी पाएंगे ।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखो मे पानी।।
मैथिलीशरण गुप्त की इस कविता का अर्थ मुझे अब समझ में
आया।
        ।। जय श्री हरि ।।🙏🙏