भाषा का मुझे बहुत ज्यादा  ज्ञान नहीं है और ना ही मुझमें अपने विचारो को सही ढंग से प्रकट करने की कला है। इसीलिए मैंने अभी तक इससे पहले कोई भी ब्लॉग पोस्ट नहीं किया था। लेकिन उस दिन जब रामायण घर में पढ़ रहे थे तब याद आया की स्वामीजी ने भी अपने भागवत कथा वाली वीडियो में एक लाइन कहीं थी –

कवि ना होऊ न ही वचन प्रबिनू, सकल कला सब विद्या हिनू।

कवित विवेक एक नहीं मोरे, सत्य कहूं लिख कागद कोरे।

बस इन्हीं लाइन को अपना जानकर कुछ लिखने की कोशिश करने जा रही। Please शब्दों पर ध्यान ना देते हुए भाव को समझने की कृपा करिएगा।जो भी मै लिखने जा रही वो सिर्फ मेरा अपना मत है, मेरा सत्य है। जैसा मै दुनिया को देख और समझ पा रही। बस उसे ही आपके सामने रखने जा रही हूं। हो सकता है आप मुझसे पूर्ण रूप से सहमत ना हो।

मै आज श्लोक के भाव पर कुछ बोलना चाहती हूं। हम अधिकतर किसी भी श्लोक , मंत्र, या स्तुति के भाव पर ध्यान देने के बजाय उच्चारण,राग, सुर को तवज्जो देते है ।कोई  श्लोक का उच्चारण कर रहा तो कैसे कर रहा है?,राग सुर से पाठ के रहा की नहीं। कोई अच्छे से पाठ कर रहा तो वहीं श्रेष्ठ है और इसके विपरीत जो इन कलाओं में निपुण नहीं है उन्हें हम कम आंकते है।

कुछ लोग जब  श्लोक पाठ करते है तो कितना अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते है। अपने आप को विशेष समझने लगते है। घमंड का भाव आ जाता है।  क्या सच में इसमें ऐसा कुछ विशेष महसूस करने वाली बात है ?

इन श्लोकों का अर्थ समझने पर मालूम होता है कि हम तो भगवान से विनती , याचना,प्रार्थना कर रहे। गिड़गिड़ा रहे है कि है भगवान मुझ जैसे महापापी,महादुष्ट, दुराचारी, कुबुद्धी, मूढ़, नीच को क्षमा कर अपने शरण में जगह दे दो। दया करो। करुणा करो। इन श्लोकों में या तो हम भगवान से याचना करते है या उनका यश गान करते है।

तो फिर इसमें घमंड या फक्र महसूस करने वाली कौन सी बात है?

अगर कोई बालक रो रहा हो तो क्या उसके मां बाप उससे ये बोलेंगे की  तुम अच्छे ढंग से सुर से रो नही तो हम खुश नहीं होने वाले।  दूसरों का भी ध्यान इसी में होगा उस समय की बालक रो रहा है।

मै बस यही बोलना चाह रही कि जब भी हम कोई भी श्लोक पाठ करते है तो उसका अर्थ पहले समझ लेना चाहिए। भाव समझ आता है इससे ।और पता चल जाता है कि वास्तव में क्या बोल रहे है भगवान से।आखिर पता चल जाता है कि कर क्या रहे है वास्तव मे। फिर अभिमान अपने ही आप गायब हो जाता है।

स्वामी जी हमेशा जब भी किसी मंत्र या श्लोक का उच्चारण करते है तो उसका अर्थ जरूर समझाते है। जिससे पता चलता है कि अच्छा इसका मतलब ये है। इसी से मेरा ध्यान मंत्रो के उच्चारण से पहले अर्थ समझने की ओर गया और तब फिर इन श्लोकों  के पीछे का भाव समझ आना शुरू हुआ।नहीं तो पहले मै खुद गाने जैसा बिना कोई भाव के गाया करती थी।

कोई इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना please। यह बस मेरा अपना मत है। क्योंकि खुद ब्राह्मण परिवार से होने के कारण बचपन से मंत्र,श्लोक,स्तुति सुनते आ रही हूं। घर में हरकोई कुछ ना कुछ भजन या स्तुति करते ही रहते है। हो सकता है उन सबको को वो जो बोल रहे उसका अर्थ पता हो लेकिन मुझे नहीं पता था।  इससे पहले मैंने कभी किसी से अर्थ जानने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि मुझे लगता था ये बस ऐसे ही है,ऐसे ही  इसको गाया जाता है करके। और बस बहुत अच्छे ढंग से ही पढ़ना सीखना चाहती थी। मगर जब भाव समझ आया तो फिर समझ आया की इनकी तो कोई जरूरत ही नहीं है।

भगवान के लिए है ये सब श्लोक, तो उनके ही लिए ही हमें गाना चाहिए । दूसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं।

धन्यवाद।

 

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Abha Pandey

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