मैं एक पेड़ का पत्ता थी जो अलग हो गई, जब वापस किसी रूप में इस बार पेड़ से जुड़ुंगी तो पत्ता नहीं बनना चाहती। पेड़ की जड़ों मे लिपटी मिट्टी बनना चाहती हूँ जो कभी अलग ना हो, हमेशा पेड़ के चरणों में ही रहे ।

मैं एक फूल का कांटा थी, पर इस बार उसकी खुशबू बनना चाहती हूँ जो हमेशा फूल में ही समाई रहे ।

मैं एक दिया की बाती थी, पर मुझे नहीं बनना बाती फिर से. . . बाती की अलग पहचान तो है पर कोई वजूद ही नहीं दिये के बिना।
आशा है इस बार मिट्टी बनने की जो कभी दिये से अलग नहीं ।

इंतज़ार बहुत लबां है, कभी बहुत मीठा ऑर कभी बहुत दर्द भरा भी, नहीं पता कब आएगी वो घड़ी दोबारा पेड़ से फूल से दिये से मिलने की।
बस प्रार्थना यही है शिवजी अब जो मिलूं  तो हमेशा के लिए . . . फिर कभी ना बिछड़ू । 

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Sneh

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