“प्रेम न बाड़ी उपजे ,प्रेम न हाट बिकाय ,राजा पिरजा जेहिं रुचे सीस देय लय जाय”

कबीर दास की ये पंक्तियां कितनी सार्थक और सटीक अर्थ बताती हैं। प्रेम में होना है तो अपना सीस अर्थात दुनिया भर के लेबल्स और झूठी पहचान को पीछे छोंड़ना होगा।

इन पंक्तियों का अर्थ जितना ही सरल है,अमल में लाया जाए तो उतना ही मुश्किल। हम जाने-अनजाने कितने ही झूठे आवरण डाल के चलते है …मैं ये…. मैं वो…मेरी इतनी पहुच फला फला जबकि सच  है सब अनित्य है सब कुछ क्षण भंगुर है।  मोरारी बापू के प्रवचन सुनते समय उन्होंने एक बात कही ,”अगर ईश्वर की सच्ची भक्ति चाहिए तो जाओ पहले किसी से सच्ची मोहब्बत करो” अहा!..कितना गहरा चिंतन है,किसी से मोहब्बत होने पर सब कुछ अच्छा लगता है धूल-धुंआ, धूप-छांव सुविधा-असुविधा स्थित-परिस्थित से परे केवल अपने प्रेमी से मिलने की तड़प बनी रहती है। प्रति क्षण एक जागरूकता रहती है कि प्रियतम ने खाया की नही, फला काम किया कि नही और न जाने कितने ही मान मनव्वल अनवरत चलते रहतें है। प्रेम का भाव दुनिया के श्रेष्ठतम भावो में से है। थोड़ा निराशाजनक बात ये है कि सांसारिक प्रेम में एक दिन फूल स्टॉप आ ही जाता है क्यों कि समय के साथ समर्पण का आधार बदल जाता है। सौभाग्य से मैं दोनों ही तरह के प्रेम का भागी रहा हूँ इएलिये अपने निजी अनुभव से कहता हूं कि, सांसारिक प्रेम की आग ज्यादा दिन तक नही जलती यद्यपि सांसारिक प्रेम हो या ईश्वरीय दोनों में शुद्धता और समर्पण का भाव होना नितांत आवश्यक है। प्रेम का आधार है करुणा, सहानुभूति, केयर और सबसे महत्वपूर्ण है समर्पण… पूर्ण समर्पण। इन सद्गुणों से भरा मनुष्य आस्तिक हो या नास्तिक ,सिद्ध हो या साधारण उसके पास आने पर मन स्वतः ही शांत और चित्त निर्मल हो जाता है। मुझे ये विचार आते ही अपने दादी माँ की और स्वामी जी की छवि सामने आ जाती है, इतनी करुणा और वात्सल्य की हिंसक पशु भी करुण हो जाय।

विपश्यना के शिविर में मैंने शांति की उस अवस्था का एक छोटा अनुभव पाया उस शांति के लिए मैं और लालायित हो गया मुझे अब किसी भी कीमत पर वह अनुभव वापस वही चाहिए था इस चक्कर मे मैं ध्यानी की जगह जिद्दी ध्यानी बनता जा रहा था।बाहर पशुवत होकर अंतर्मन में शांति की खोज कर रहा था कितनी बड़ी मूरखता थी  ,घन्टो ध्यान करने के बाद भी न के बराबर अनुभव होते। मैंने एस. एन.  गोयनका जी के प्रवचनों को फिर बड़े ध्यान से सुना कि आखिर चूक कहां हो रही है। बहोत चिंतन के बाद मैंने देखा कि मूल को छोड़ कर मैं शाखाओं को पानी दे रहा हूँ। मैने स्वामी जी का संकल्प(resolve) वाला vedio देखा और छोटे-छोटे संकल्प के माध्यम से अपने को वापस ट्रैक में लाने की कोशिश की और अभी प्रयास में हूँ😊

स्वामी जी के चरणों मे समर्पित💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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Satyam Tiwari

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