तुम किसी से प्रेम करते हो तो
समझो कि खुद से प्रेम नहीं करते हो।

जब भी आप कहते हो कि आप किसी के प्रेमी हो तो आप उसका हर हाल में  सही हो  वो करने की कोशिस करते हो, पर सच मे उसके लिए क्या सही है ये नही सोचते है, और अपने विचारों को उन पर आरोपित करने की कोशिश करते है, और दुख के भागी होते है।

और अगर आप किसी एक से केवल शुरुआत उस पुर्ण प्रेम तक पहुचने के लिए करते है तो अच्छा है परंतु हम इस प्रेम के असफल होने की दशा में वही फस के रह जाते। है।

जब भी आप सच मे प्रेम में होंगे वास्तविक रूप से आपको सामने या आप मे कोई अंतर नहीं दिख सकता है।

जब शब्दों में कुछ कहा न जा सके,

जब जो सुना गया हो वो सुनने की आवश्यकता न रहें।

जब जो खाया जा रहा हो उसके स्वाद की आवश्यकता न रहें।

जब स्पर्श में स्नेह व दर्द की आवश्यकता न रहे।

ऐसे अनंत प्रेम के भाव से जब

कुछ कहा जायेगा,

कुछ सुना जाएगा,

कुछ स्वाद लिया जाएगा,

कुछ स्पर्श किया जाएगा,

वो पूर्ण रूप से प्रेम की अभिव्यक्ति होगी।

“पाया कहे सो बावरा खोया कहे सो कूर।

पाया खोया कुछ नही ज्यो का त्यों भरपूर।।”