बोध परिभाषित हो नहीं सकता,
मैं अहंकार निरर्थक प्रयास में संलग्न है.

बोध किसी का निजी अनुभव हो नहीं सकता,
मैं अहंकार अपना जताने में संलग्न है.

बोध कोई उपाधि हो नहीं सकती,
मैं अहंकार बुद्ध की उपाधि पाने में संलग्न है.

बोध कोई प्रकाश या अंधकार नहीं,
मैं अहंकार प्रकाशित करने में संलग्न है.

बोध किसी व्यक्तित्व को नहीं घटता,
मैं अहंकार व्यक्तित्व सजाने में संलग्न है.

बोध हमेशा निसंग है,
मैं अहंकार संघ बनाने में संलग्न है.

बोध अनाम है,
मैं अहंकार नित नये मजहब बनाने में संलग्न है.

बोध अक्रिय में घटता है,
मैं अहंकार उसको क्रिया बनाने में संलग्न है.

बोध मूक है.
मैं अहंकार वाचाल बनाने में संलग्न है.

बोध कोई कुतूहल नहीं, बोध मुमुक्ष की आकांक्षा नहीं,
बोध तो स्वयं ही परिभाषित है कण कण में,
अहंकार निरर्थक संलग्न है.

ऐसा ना कोई आया धरा पे, जो बोध को परिभाषित कर पाए,
बोध तो घटता है शून्य में, अहंकार शून्य में समाने दो

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