हमारे शास्त्र बड़े हैरतअंगेज और अद्भुत रहस्य से भरे हुए हैं। इसे समझना उतना ही मुश्किल है जितना कि किसी रॉकेट साइंस को समझना। उदाहरण के लिए गीता को ही ले लीजिए, बड़ा सरल और स्पष्ट ग्रंथ है। पर वास्तव में गीता बड़ा रहस्यमई ग्रंथ है। क्योंकि मनुष्य की मानसिक वास्तविकता से लेकर, बुद्धिमान से बुद्धिमान और मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति को भी ध्यान में रखकर बड़ा अदृभुतलेखन किया गया है। किसी चीज के लिए स्पष्ट हा नहीं है और किसी चीज के लिए स्पष्ट मना ही भी नहीं है। हिंसा और अहिंसा दोनों पहलू अपने आप में समय और परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं ना कि कोई पत्थर से खींची हुई लकीर के समान है। ऐसी बातें गीता में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। 

गीता ही नहीं हमारे अनगिनत शास्त्र ब्रह्म ज्ञान के विषय में भी कुछ ऐसी ही भ्रांति फैलाते हैं और  यदि भ्रांति ना कहूं तो कुछ मुश्किल तो है ही कि सामान्य व्यक्ति के लिए समझना। आज के परिपेक्ष विश्व में ब्रह्म ज्ञान की परिभाषा बताई जाए तो क्या हो सकती है।  तपस्वी से तपस्वी व्यक्ति भी आज चमत्कार करने में सफल नहीं है। यदि आग लगा दी जाए और उस पर किसी चरित्रवान  सीता जैसी स्त्री को भी बिठा दिया जाए तब भी वह जले बिना ना रहेगी क्योंकि वर्तमान विश्व में ऐसे तत्व उपस्थित है ही नहीं जो इतने सूक्ष्म स्तर में कार्य करते हो। प्रदूषण और वातावरण में फैली हुई विचारों की विषाक्तता के कारण जो कोई भी इस में सांस लेता है उसके मन मस्तिष्क में आसुरी तत्वों के सिवा और कोई उमंग उठती ही नहीं। बड़ा कठिन है आज के समय में सत्य के मार्ग पर चलना।

आज अनेकों अनगिनत संत ज्ञानी बने बैठे हैं बड़ी -बडी कथाएं और भागवत आयोजनों से लेकर बड़े-बड़े अनुष्ठानों तक के प्रयोग चलाए जाते हैं और प्राप्त होने को क्या है कुछ भी नहीं। अगर मिल भी गया किसी तरह ब्रह्म ज्ञान तो करोगे क्या उसका ,समर्थ गुरु रामकृष्ण परमहंस अक्सर कहा करते थे जिस दिन ब्रह्म ज्ञान मिल गया उस दिन दुनिया के दर्द से दिल फट जाएगा, ब्रह्म ज्ञान उतना सरल नहीं है जितना दिखता है और इतना मुश्किल भी नहीं है। आसान शब्दों में कहूं तो जिस दिन तुम मोह त्याग दोगे जिस दिन तुम अपने कपड़ों की परवाह त्याग दोगे, और जिस दिन तुम परवाह करना छोड़ दो कि कि लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं और सब कुछ छोड़ कर तुम सिर्फ उस मार्गो पर चलोगे जो तुम्हारी अंतर प्रेरणा से दिखाया जाता है सत्य का मार्ग, धर्म का मार्ग ,पीड़ितों और शोषितों कि  सेवा का मार्ग,

समझ लेना चाहिए कि ब्रह्म ज्ञान के द्वार खुल गए। एक ही अंतिम और परम सत्य यही है कि ना तुम साथ कुछ लेकर आए और ना तुम कुछ साथ लेकर जाओगे बस इतनी बात समझ ली तो मुझे नहीं लगता कि जीवन को किसी ओर ज्ञान की आवश्यकता है भी। क्योंकि मुसीबत वहीं से प्रारंभ होती है जहां इंसान स्वयं के विश्व को सदैव के लिए स्थिर समझने लगता है। जो वास्तव में प्रतिक्षण परिवर्तनशील है।

प्रणाम,

आपका शुभचिंतक रविंद्र  वैष्णव।