सब लोग जान रहे हैं कि पिछले साल भर  में किसी खतरनाक वायरस ने पूरी दुनिया समेत भारत में तबाही मचाई है।हमारी यानी हम मनुष्यो की सारी उपलब्धियां, सारी व्यवस्था, सारा ज्ञान विज्ञान,तकनीक एक तरह से घुटने टेकता नजर आ रहा है इस प्रकृति की विनाशक नीतियों के आगे। मैने साल भर पहले एक पुस्तक पढ़ी थी इस्कोन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद जी की”जीवन का स्रोत जीवन” इसमें उन्होंने अमेरिका,केलिफोर्निया,न्यू जर्सी जैसी विकसित देशों के दौरा करने दौरान वहां के बड़े बड़े वैज्ञानिकों से डिबेट किया।उन्होंने उनके सामने ये साबित किया, “भले ही आप शीर्ष कोटि के वैज्ञानिक हो लेकिन आपकी एक नियत क्षमता है।आप उसी श्री कृष्ण की रचना हो।आपके मस्तिष्क की एक सीमित क्षमता है लेकिन श्री कृष्ण की बनाई हुई प्रकृति आपके नियंत्रण से बाहर की चीज है।आप प्रकृति की ही दो या अधिक वस्तुओं को आपस में मिला कर एक नई वस्तु बना देते हो और कहते हो कि आपने आविष्कार कर दिया। आप एक भी प्राकृतिक वस्तु नहीं बना सकते।मान लो आप कहते हो कि हमने कृत्रिम हृदय बना दिया तो क्या उस नए हार्ट को अगर कोई अस्सी साल का वृद्ध अपने शरीर में अटैच कर ले तो फिर से उसकी आयु बढ़ जाएगी,क्या आप बिल्कुल एक नया ताजा प्राकृतिक गुलाब का पुष्प बना सकते हो” इस तरह के तमाम उदाहरण उन्होंने दिए और साबित किया कि इस प्रकृति का निर्माण कृष्ण ने किया है और वही इसका वास्तविक संचालन कर्ता है।

हमने एक समय ये भी पढ़ा था कि जब अल्बर्ट आइंस्टीन का एक इंटरव्यू लिया गया और रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि आप इतने बड़े वैज्ञानिक हो आपने अपने मस्तिष्क की क्षमता का कितना प्रयोग किया तो उनका जवाब था 9%,,,,उन्होंने कहा कि एक सामान्य मनुष्य अपनी पूरी क्षमता का मात्र 5%तक उपयोग कर पाता है।फिर उनसे पूछा गया कि क्या आपसे भी अधिक किसी ने अपनी मानसिक शक्ति का दोहन किया तो उनका जवाब था कि भारत के ऋषि मुनि अपने दिमागी शक्ति का लगभग 20%तक उपयोग करते हैं।

इन बातों को उदाहरस्वरूप देने का मेरा उद्देश्य ये है कि हम विज्ञान और तकनीक में भले ही खूब प्रगति कर लें पर अगर हम प्रकृति के नियमों का सही से पालन न करें तो हमें उसका दंड भोगना पड़ता है। जौ के साथ घुन भी पिस जाता है।प्रकृति के साथ कितना अन्याय इस स्वार्थी मनुष्य ने किया ये लिखने को विषय नहीं है।सब जानते हैं कि लाखों पेड़ काटे जाते हैं लाखों जानवर काटे जाते हैं।क्यू कि विकास पसंद लोगों की नजर में यही प्रगति का स्वरूप है।आज धरती की जनसंख्या लगभग आठ अरब होने वाली है।भारत लगभग एक सौ चालीस करोड़ के पास है।जमीन तो उतनी ही है पर जनसंख्या एक खास समुदाय के लोगो के द्वारा तेजी से बढ़ाया जा रहा।कुल मिलाकर इसका सबसे बड़ा असर प्रकृति के ऊपर पड़ता है।आंखो देखी घटना है कि जंगलों मे आग लगाकर जानवरों और पशुओं का सफाया किया जाता है ताकि वो उन जमीनों पर कब्जा कर सकें।खूब देखी है हमने ये सब।बकरी पालन मुर्गी पालन इसके होता है कि अंत में इसका हलाल किया जा सके।

  1.       खैर मेरा ये कहना था कि जब प्रकृति अपने ऊपर हो रहे अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर पाती है तो वो अपना विनाशक रूप दिखाती है।फिर हमारी सारी चालाकियां,सारे तर्क,सारी वैज्ञानिक उपलब्धियां एक कोने में रखी रह जाती है।हम सोचते हैं कि इंजेक्शन बनवाकर इसपर नियंत्रण कर लेंगे लेकिन तब तक विनाश का नया वर्जन आ जाता है।मानो उसने भी ठान ली है कि” तुम डाल डाल मै पात पात,” अब तो मेरी समझ से एक ही उपाय नजर आता है कि जिसने हम सबको बनाया हमें उसकी शरण में जाकर विश्व कल्याण के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इंजेक्शन,इलाज,मेडिकल फेसिलिटी,राजनीतिक और प्रशासनिक सहयोग,ऑक्सीजन आपूर्ति वगेरह सब ठीक है लेकिन इसके साथ ही एक कारगर उपाय ,जो हमने महापुरुषों के श्री मुख से सुन रखा है,,,,,वो है भगवद शरणागति,,,,,,क्यू कि दुनिया उसकी है तो आखिरी मर्जी भी उसी की चलेगी।

Pay Anything You Like

Ashu Harivanshi

Avatar of ashu harivanshi
$

Total Amount: $0.00