अख़बार पढ़ते पढ़ते लगा,  क्यों पढ़ रही हूँ?

आध्यात्म पथ पर इसकी क्या जरूरत है?

पूरा अखबार ‘लोगों ‘ की ही तो कह रहा है, क्योंकि वही इसे पढ़ते, या कहें की पढ़ पाते हैं. अब जब जानवर, पक्षी , पेड़ पौधे, जीव जंतु पढ़ ही नहीं सकते तो भला उनकी कौन लिखे, और क्यों?

Covid 19 ने चूंकि इंसानों को लपेटे में लिया है तो सीधी सी बात है कि हर जगह उनकी बात ही होगी. 

बात ये है कि आध्यात्म पथ पर बस इंसान को ही सर्वे सर्वा नहीं न समझा जाता.   

वह भी मात्र “है “,

जैसे इतनी बड़ी सृष्टि में बाकी सब जीव हैं. फ़र्क है तो यह की केवल इंसान को ही अपना पेट भरने के लिए कमाना पड़ता है, और अन्य सब जीवों की व्यवस्था ईश्वर ख़ुद करता है 

तो इंसान पर विपदा आने पर इतनी हाय तौबा क्यों

तभी दबी भावना ऊपर आने की कोशिश करने लगी. मैंने उसे भी शब्द देने की ठानी – वह कह रही है

‘हर individual की अहमियत होती है ‘. होती ही है. देखो अपने चारों और. भावनाएं ही तो बिकती हैं केवल – entertainment इंडस्ट्री में, fashion industry में, और….. और………. आप सब जानते ही हैं कहाँ कहाँ 

इन भावनाओं ने ही तो सब कुछ इतना complicated कर रखा है, और तो और mental illness, नाम से एक category बन चुकी है  Govt. reserved seats की list में. और उसकी दवाइयों ने एक पूरी नयी industry या कहो नोट छापने की मशीन ही बना डाली. 

भावनाओं में बहते बहते इंसान न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. 

आज अगर मात्र भगवद गीता का gist ही सभी तक पहुँच जाए न, तो ये हाय तौबा पूरी नहीं तो आधी से ज़्यादा कम हो जाए, at least चीजें manageable तो ज़रूर ही हो जाएँ. 

देखिए जो essential होता है न  वो easily manageable भी होता ही है चूँकि दुनिया बनाने वाला बहुत शानदार, बुद्धिमान रचनाकार है. गड़बड़ सारी complexities में है, जिसे आप luxuries शब्द से भी सम्बोधित कर सकते हैं. Air and Water are most essential, and they are free for all. Food, basic food, is very economical. Shelter do needs some extra efforts, I agree.

But

Simple is always beautiful 

It was beautiful 

It will always be….

बस यही सब सोचते सोचते मैंने अखबार को रखा side पर और मन की बात लिखने बैठ गई 😊

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