दिन 4 : महाविद्या भुवनेश्वरी
तत्त्व : शिवत्व/ ईशित्व

मेरे गुरुदेव कहा करते हैं, “सारी महाविद्याओं को एक जन्म में साधना मुमकिन नहीं है। हर एक महाविद्या की साधना अत्यंत वृहद होती है। साधक का सर्वस्व स्वाहा हो जाता है एक महाविद्या को साधने में। पर वास्तव में अगर साधक एक ही महाविद्या को पूरे मन, कर्म और वचन से साध ले तो उसी एक देवी में उसे सारी देवियों का ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है। रामकृष्ण जी ने पूरी ज़िन्दगी लगाकर केवल काली को ही सिद्ध किया। वामदेव ने केवल तारा को। पर दोनों को ही सम्पूर्ण प्राप्ति हो गयी।”

जब आप किसी एक महाविद्या को तत्त्व से आत्मसात करते हैं, तो सारे भेद मिटने लगते हैं। साधक-साधना-साध्य ही जब एक होने लग जायें तो महामाई के रूपों में भेद कैसे रह जाएगा! फिर आपको छिन्नमस्तिका जैसे उग्र रूप में भी कमला की सौम्यता ही दिखेगी! धूमावती के धूसर वैधव्य को ललिता का लाल रंग सुहागन कर जाएगा! महाविद्या की इस लीला को वही जान सकता है जिसने तबियत से किसी एक महाविद्या को गहराई से धारण किया हो … चाहे ज्ञान से, चाहे साधना से, चाहे ध्यान से या चाहे शुद्ध प्रेम से।

भुवनेश्वरी यानी 14 भुवनों की ईश्वरी या साम्राज्ञी। तीसरी महाविद्या त्रिपुरसुंदरी ‘श्रीमहाराज्ञी- श्रीमत सिंघासनेश्वरी’ नाम से ललिता सहस्रनाम में वर्णित है। तंत्र शास्त्रों के अनुसार दोनों ही महाविद्याओं का स्थान मणिद्वीप ‘श्रीनगर’ है। दोनों ही महाविद्याओं को मूलप्रकृति आद्याशक्ति महामाया कहा जाता है।
त्रिपुरा को प्रकृति की अधिष्ठात्री कहते हैं और भुवनेश्वरी को शाकम्भरी, यानी कि वनस्पति, फल-फूल, अन्न की देवी। महामाई त्रिपुरा जहाँ श्रीमाता के रूप में सृष्टि का पालन करती हैं वहीं भुवनेश्वरी मइया को साक्षात देवी अन्नपूर्णा है। दोनों के आयुध भी लगभग बराबर हैं।
अब आप बताइये, क्या एक ही सिंघासन में दो देवियाँ बैठकर राज चला सकती हैं? क्या अब भी कोई स्पष्टीकरण की आवश्यकता है कि गंगाधर ही शक्तिमान है?

राजराजेश्वरी ही भुवनेश्वरी हैं!

भण्डासुर के वध के लिए निराकार महामाया आदिपराशक्ति ने साकार ललिताम्बिका महात्रिपुरसुन्दरी का स्वरुप धारण किया। पाश, अंकुश, तीर और धनुष लिए मेरी त्रिपुरा। भण्डासुर का काम तमाम करने के बाद कामेश्वर-रुपी महादेव का हाथ पकड़कर Evening Walk करते हुए अपने घर वापस जाती हैं, मणिद्वीप।
सिंघासन पर बैठ पूरे टशन में अपने बालों पर हाथ फेरती हैं और धनुष-बाण रखकर वर मुद्रा और अभय मुद्रा धारण कर लेती है। तभी महादेव कहते हैं, “हम भी! हम भी कपड़े बदलेंगे, वरानने!” और महादेव अपने कपड़े बदलकर भुवनेश्वर महादेव बन जाते हैं।

सृष्टि में देखें तो यह ब्रम्हांड स्व-चलित है। इसे कोई चला नहीं रहा। बस इंजन on करना होता है। त्रिपुरा बन भगवती जब सृष्टि का काम ख़तम कर लेती है तो उसे Automatic mode में डाल देती है। फिर आराम से धनुष-बाण रखकर पालन करने के भाव में सिंघासन पर बैठ जाती है। अब महाराज्ञी है। सबकी संरक्षक। इसलिए अभय और वर मुद्रा धारण कर लेती है। बन गयी त्रिपुरा साक्षात भुवनेश्वरी – देवी भागवतम की सर्वोच्च शक्ति – त्रिगुणातीत महामाया, चंडिका, पराशक्ति, आद्या।

तो भुवनेश्वरी और कोई नहीं बल्कि सृजन का काम-धाम ख़तम करके फुर्सत में आराम से बैठी ललिताम्बिका ही है! तात्विक रूप से इस ब्रम्हांड में जो भी कुछ प्रकट होता है जो 3 गुणों से और 5 महाभूतों से निर्मित है। भुवनेश्वरी इन्हीं 3 गुणों और 5 महाभूतों की अधिष्ठात्री और नियंत्रक है। किसी भी चीज़ को नियंत्रित करने के लिए आपको उस चीज़ से थोड़ा ऊपर उठना होगा। परे होना होगा। पूरी कायनात, ग्रह, तारामंडल, आकाशगंगायें, ब्रम्हांड से लेकर पिंडांड तक सब इनके आधीन हैं। इसलिए महाविद्या त्रिपुरसुन्दरी – भुवनेश्वरी 3 गुणों से ऊपर हैं। गुणातीत है। इनका साधक भी इन्हीं की तरह गुणों से परे हो जाता है ।

मेरे स्वामी कहते हैं, “ईश्वर से ऐश्वर्य प्राप्त होता है। मनुष्य ऐश्वर्य नहीं दे सकता। ऐश्वर्य के साधन बस दे सकता है।”
ऐश्वर्य के और पदार्थों के माध्यम से मिलने वाले सुख-साधनों को वैभव कहते हैं। Material Things. Physical Beauty. Temporary Satisfaction.
ऐश्वर्य एक ईश्वरीय गुण है। यह वैभव से बहुत ऊपर है। वह आंतरिक आनंद के रूप में उपलब्ध होता है। Spiritual Things. Inner Beauty. Everlasting Contentment.

ऐश्वर्य दो प्रकार के होते हैं।
लघु ऐश्वर्य छोटी-छोटी सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने पर मिलता रहता है। सेवा, मदद, परोपकार से मिलता है। यह खुद से कमाया हुआ, सीमित आनंद देने वाला और सीमित समय तक रहने वाला ऐश्वर्य है।

भुवनेश्वरी वृहद ऐश्वर्य की स्थिति है। उसमें सृष्टि भर का ऐश्वर्य अपने अधिकार में प्रतीत होता है। साधक को विश्व का अधिपति होने की अनुभूति होती है। चेतना के स्तर पर होने वाली ब्रम्हांड की सारी आध्यात्मिक अनुभूतियों का आनन्द साधक को हर क्षण प्राप्त होने लगता है। उसे निरन्तर यही लगता है कि उसे विश्व भर के ऐश्वर्य का अधिपति बनने का सौभाग्य मिल गया है। साधक विश्वेश्वर-भुवनेश्वर महादेव हो जाता है!

भुवनेश्वरी ही वो आकाश हैं जिसपर काल का नृत्य होता है। आकाश यानी Space. Quantum Physics के Dimensions. यानी जो भी घट रहा है मान लीजिये वो एक फिल्म है। इस फिल्म को एक परदे (Projector Screen) पर दिखाया जाएगा, ठीक? भुवनेश्वरी वो screen है जिसपर आपकी ज़िन्दगी और ब्रम्हांड के काल की फिल्म चलती है। कोई भी घटित होने वाली स्थिति भुवनेश्वरी के scope के बाहर नहीं घट सकती। प्रलय भी नहीं। सब इसकी screen पर होता है।

जब साधक का आतंरिक आकाश (Inner Space of Consciousness) महामाया के Cosmic Space में विलीन हो जाता है तो वो भुवनेश्वरी सिद्ध हो जाता है। ऐसे में ऐसा प्रतीत होता है कि आप ही मानो सृष्टि के कण-कण में धड़क रहे हो। छोटे से छोटा जीव, हर कीड़ा, हर मकौड़ा, हर पेड़, हर पत्ता, हर जानवर, हर इंसान, पूरी कायनात मानो आप ही का हिस्सा हों; मानो सबकुछ “आप” ही हो गए हों। इसी स्तिथि में रमन महर्षि और रामकृष्ण जीते थें। यही स्थिति परमहंस कहलाती है। यही अवस्था अवधूत है। यही है साक्षात शिव की अवस्था। देवी आत्मज्ञान देती नहीं है। वो स्वयं आत्मज्ञान है!

मेरे गिरूदेव के शब्दो में, 

महाविद्यायें एक साधिका की नज़र से... 2

 – अगर सत्य कहूँ तो , ओम स्वामी

 

भुवनेश्वरी की भूमिका में पहुँचा हुआ साधक भी लगभग उसी स्तर की भाव संवेदनाओं से भरा रहता है, जैसा कि भुवनेश्वर भगवान शिव को स्वयं अनुभव होता होगा।

इस स्तर पर पहुँचकर साधक ब्रह्मभूत हो जाता है। ब्राह्मी स्थिति में रहता है। इसलिए उसकी व्यापकता और समर्थता भी प्रायः परब्रह्म के स्तर की हो जाती है। उसके हर शब्द में स्वयं महामाई की ऊर्जा समाई होती है। वह वरदान भी दे सकता है और उसका श्राप भी प्रबल हो जाता है। वह सृष्टि भी कर सकता है और विध्वंस भी! पूरे अस्तित्व में बिखरे विभिन्न पदार्थों पर नियन्त्रण कर सकता है। भुवनेश्वरी को आत्मसात किये साधक को प्राप्त शिवत्व की यही स्थिति ईशित्व सिद्धि कहलाती है – महामाया अपने बच्चे को साक्षात ईश्वर में परिवर्तित कर देती है!

काली से निर्भीकता प्राप्त करने के बाद ही मनुष्य सही अर्थ में साधक बनता है। तारा से ब्रह्मज्ञान मिलते ही सारे भेद नष्ट हो जाते हैं। संस्कारों की परतें ब्रह्मज्ञान से गिर जाती हैं और साधक को त्रिपुरा से एकात्मता का बोध मिलता है। एकात्म – एक ही आत्म। साधक त्रिपुरा की कृपा से बाहरी रंग-रूप-आकार के परे जाकर वास्तविक सौंदर्य को देख पाता है।

भुवनेश्वरी की स्थिति उसे ईशित्व प्राप्त होते ही आभास होता है कि दिखाई देने वाला यह वास्तविक सौंदर्य मेरे ही भीतर से प्रवाहित हो रहा। चेतना के स्तर पर ब्रह्मांड की समस्त आनन्द – अनुभूतियाँ उसे प्रत्येक क्षण महसूस होने लगती हैं। साधक अब स्वयं वो आकाश (Cosmic Space) बन जाता है जिसपर सारे क्रिया-कलाप हो रहे हैं संसार के। अब वो कुछ नहीं कर रहा। अब साधक सृष्टा भी है और दृष्टा है। साक्षी-भाव के आते ही साधक की चेतना महादेवी की चेतना में विलीन हो जाती है। अहर्निश, आठो प्रहर अब भगवती स्वयं उसके साथ और उसमे विराजमान हो जाती है और साधक स्वयं शिव हो जाता है।

।। ॐ ह्नीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम: ।।

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