न जाने कितने ही लोग जीना चाहते हैं अपनी इच्छा को पूरा करना चाहते हैं, और न जाने कहां से मौत आती है और कुछ समय में ही सब कुछ समाप्त। निश्चित रूप से अकाल मृत्यु का मैं समर्थन नहीं करता। लेकिन इसका यह अर्थ कतई ना निकाला जाए की मौत कोई बुरी वास्तविकता है।ओर इन्सान को अमर होना चाहिए।

जरा कल्पना कीजिए क्या होता उनका जो अस्पतालों में पड़े हैं ऐसे रोगों के कारण जिसका कोई इलाज नहीं। क्या होता उनका जो निर्धनों के घर में जन्म लेते हैं और  आजीवन धनवान लोगों की सेवा कर किसी तरह अपना पेट पालते है। इन सब बातों को नकार भी दे तो शायद कुछ विशेष फर्क ना पड़े, लेकिन क्या हाल होता उनका जो जानते हैं की मौत निश्चित है लेकिन फिर भी इस कदर इकट्ठा किए जा रहे हैं मानो सदा के लिए यहां बसने वाले हो, जरा से फायदे के लिए जिनके हाथ किसी कि हत्या तक करने से डरते नहीं। ऐसे लोगों के लिए भी सच्चाई अमर होने की हो तो यह किस स्तर तक अपनी वासनाओं और इंद्रियों की तृप्ति के लिए गिरेंगे और उसके लिए संसाधनों को इकट्ठा करेंगे इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

यदि मृत्यु ना होती तो हिटलर और औरंगजेब जेसे लोग आज भी जिंदा होते और अब तक तो शायद पूरी पृथ्वी का ही सर्वनाश कर चुके होते।

मृत्यु जीव को ईश्वर का दिया वरदान है। क्योंकि बड़ी से बड़ी पीड़ा, चिंता, कष्ट अथवा दरिद्रता का अंतिम और सौ प्रतिशत सटीक समाधान मौत है। इस तकलीफ का अंत कोई नहीं कर सकता उसका सदैव के लिए निराकरण मौत कर डालती है। इस विश्व में ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसका इलाज मृत्यु के पास ना हो। मृत्यु नश्वरता का अंतिम पड़ाव है जहां पहुंचकर जीव को परम सत्य से मिलना ही पड़ता है चाहे इस संसार से प्यार करो अथव नफरत करो। बस एक समय से अधिक यहां रुक नहीं सकते। और ना ही कुछ भी साथ ले जा सकते, शिवाय अपने अच्छे बुरे कर्मों की कमाई के।

इसीलिए कम से कम मेरा तो यही विचार है कि मृत्यु ईश्वर का वरदान है नश्वर देहधारीयो के लिए।

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Ravindra Vaishanav

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