||नमस्ते||

आप सभी को दिवाली को पहले ही हार्दिक शुभकामनाएं।

दिवाली का त्यौहार हम सबके जीवन में एक अलग महत्व रखता है हर एक व्यक्ति की अलग-अलग यादें इस पर्व से जुड़ी रहती हैं। हम सब ने अपने बचपन से ही दीपावली को बहुत प्रेम से देखा है और इस त्यौहार को ह्रदय में अंकित कर के हृदय के एक गहरे कोने में सदा के लिए बसा लिया है। कुछ यादें jobइस त्यौहार से जुड़ी हैं वह हमें खुश कर देती हैं लेकिन कई बार कुछ यादों से किसी के जाने का गम भी जुड़ा रहता है।
यूं तो त्यौहार के दिन सब इकट्ठे होते हैं लेकिन कई बार हर एक परिवार में ऐसा नहीं हो पाता। किसी को घर से बाहर रहकर दीपावली को मनाना पड़ता है हर एक व्यक्ति दीपावली पर घर नहीं आ सकता। हर एक परिवार दीपावली पर पूरा नहीं हो सकता।
तो मेरी दीपावली की कहानी आप सब के साथ में साझा करना चाहता हूं।

मेरी दीवाली

तो कहानी शुरू होती है बचपन से जब से मुझे याद है कि हां यह दीपावली है। दीपावली का त्यौहार मेरे लिए त्योहार था अपने भाई बहनों के साथ मिलकर बैठकर खूब खाने का, पटाखे चलाने का, खूब मस्ती करने का और हां मां मैया की सफाई में हाथ बटाने का। हम बचपन से मां के साथ काम में उनकी सहायता करते आ रहे हैं। घर की लिपाई पुताई घर के कोने कोने की सफाई करके आनंदित अनुभव करते थे। पहले तो बचपन में 10 दिनों की छुट्टियां हुआ करती थी दीपावली पर, याद करता हूं कि काश वो बचपन के दिन में वापस आ जाएं।
मुझे आज भी याद है जब मैं छोटा था तो बहुत ही लाडला था सबका खैर अभी भी हूं सभी का लेकिन हां मेरी बुआ के बच्चे जो मेरे भाई बहन है उनका मैं बड़ा लड़का था। वह सब दीपावली से 2 दिन पहले ही आ जाते थे और मेरा घर तो उनका ननिहाल था और एक अलग ही आनंद उमंग जुड़ी रहती थी। हम देखते थे वह पीपल के पेड़ से नीचे के रास्ते को कि शायद वो आ गए शायद वो आ गए। बुरा लगता था जिस साल वह नहीं आते थे बहुत बुरा लगता था। हम रास्ता देखते रहते थे और वह नहीं आते थे हमारे लिए क्या था हमारे लिए तो दीपावली सिर्फ मस्ती के लिए थी। बहुत ही ज्यादा लगाव था अपने भाई-बहनों से।
लेकिन हर दीपावली एक सी तो नहीं हो सकती 5 या 6 लगभग दीपावली हम सब ने साथ मनाई लेकिन 2011 की जो दीपावली थी वह हमने साथ नही मनाई क्योंकि 2010 में ही अंत में दोनों बहने हम सब को छोड़ कर चली गई। उसके बाद तीन या चार दीपावली हमारी कुछ खास नहीं गई थी वो कहते हैं ना “तुम क्या गए जिंदगी से, जिंदगी में जीने का मजा ना रहा” हमारे लिए दीपावली का त्योहार तो केवल इकट्ठे होकर परिवार का पूरा होकर मजे करने का था। लेकिन उस घटना के बाद तीन या चार दीपावली हमने अच्छे से नहीं मनाई थे लेकिन क्या करें सब के जीवन में अलग-अलग घटनाएं होती हैं हर एक का जीवन एक सा तो नहीं हो सकता इसलिए स्वीकार करके आगे बढ़ना ही पड़ता है और बचपन में हमारे पिताजी बहुत सारे पटाखे, मिठाई, खूब सारे दीप ले आते थे। घर में जैसे जैसे हम बड़े होते हुए पिताजी को लगा बच्चा बड़ा हो रहा है तो कमाने के लिए बाहर चले गए। तो 2010 के बाद से लेकर 2016 तक हमने अपने पिताजी के साथ कोई भी दीपावली नहीं मनाई। हमारे पिताजी विदेश में रहते थे और जब छुट्टी आते थे तब दीपावली का त्यौहार नहीं आता था। अब क्या करें त्योहार तो इकट्ठे ही मनाने में मजा आता है अब मैं, मेरी माता जी, दादी जी, दादा जी हम तीनों मिलकर क्या मनाएंगे, अकेले आनंद नहीं आता था। तो हम भी अपने ननिहाल चले जाया करते थे कभी-कभी दीपावली को मनाने। तो दीपावली के साथ हमारी थोड़ी सी यादें हैं लेकिन जितनी भी दीपावली हमने मनाई है परिवार में इकट्ठे होकर बहुत अच्छे से हमने मनाई है।
अब कुछ वर्षों से मैं जब से श्री स्वामी जी और अन्य संतों को मैंने सुना हमारे लिए दीपावली का महत्व बदल गया दीपावली का त्यौहार बन गया एक समर्पण का त्यौहार, एक सेवा करने का त्योहार है एक ऐसा त्यौहार जिसमें मैं अपने घर की सफाई नहीं अपने अंतःकरण की भी सफाई करूंगा जैसे कि पहले मैं भी ऐसे कोई खास दीपक नहीं लाता था लेकिन जैसे-जैसे बुद्धि विकसित होती गई हमारा मन ने जो कहा कि हमें सहायता करनी चाहिए अपने पुराने कपड़ों को दे देना चाहिए किसी को तो वह हम करने लगे उससे मेरे अंतःकरण, मन को बड़ी ही शांति मिलती थी तो अभी तक मेरे पास लगभग 200 से 300 तक हो चुके हैं मिट्टी के दीपक और इस साल भी मैंने अपने पापा को कहा है कि आप और दीपक ले आना बहुत आनंद आएगा और जैसे कि कुछ पूजा के लिए जो दीपक हैं वह हम नया तेल और घी डालकर जो पूजा के लिए हैं वह देवी मां को अर्पित करते हैं। लेकिन जैसे पूरे घर को रोशन करना है तो हमें लगता है कि नया तेल इस्तेमाल करना यह ठीक नहीं है तो हम क्या करते हैं की पूरी साल में जो भी हमने तला हुआ खाना बनाया उस से तेल बचता है उसे इकट्ठा करके बोतलों में भर देते हैं और उस तेल को इस्तेमाल करते हैं जिससे पूरा घर रोशन किया जाए। इससे कोई भी चीज बर्बाद नहीं जाती है चीज और लेकिन हां जैसे पूजा के लिए हमें नया तेल चाहिए तो वह हम नया ही इस्तेमाल करते हैं देवी मां की पूजा के लिए आरती के लिए तो और हम कुछ वर्षों से हवन भी कर रहे हैं और जैसे हमारे दादा जी पहले हवन करते थे दादाजी के जाने के बाद हम हवन करते हैं। तो इस तरह से यह परंपरा परिवार में चली आ रही है हवन की दीपावली के रात की और दीपावली का त्योहार हमारे लिए इसलिए भी खास है क्योंकि इस दिन हमारे ननिहाल में तेरी मां का एक छोटा सा मेला लगता है। इस मेले में हम हर साल जाते हैं और क्योंकि हम सारा काम दीपावली से 1 दिन पहले और बाकी का दीपावली की सुबह कर लेते हैं और दिन में अपने ननिहाल में जाते हैं और ननिहाल में खूब मस्ती करके देवी मां का आशीर्वाद प्राप्त करके हम अपने घर को शाम को वापस आ जाते हैं और अपने घर में दीपावली का आनंद लेते हैं।
अब हमारे लिए दीपावली का त्यौहार इसलिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हमें अपनी मां के हाथ का खाना भी मिलता है और अपनी नानी मां के हाथ का खाना मिलता है और दो दो मां के हाथ का खाना मिलना हमारे लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
अभी आज तो मैं आनंद ले रहा हूं, नानी मां का प्यार मिल रहा अपनी मां का प्यार मिल रहा है लेकिन कभी सोचता हूं जब ये नहीं रहेंगे तो तब यह दीपावली दीपावली रहेगी? दीपावली तो दीपावली ही रहेगी लेकिन मेरे लिए दीपावली दीपावली नहीं रहेगी। यह सोचा हूं कि 1 दिन ऐसा भी आएगा जब यह प्रेम हमें प्रकट में नहीं मिलेगा तो आंखें भर आती हैं और जुबां रुक जाती है लेकिन फिर चिंता से मुक्त होने के लिए चिंता हरणी देवी मां को याद कर लेता हूं। एक न एक दिन तो सबको ही जाना है इसलिए सब कुछ स्वीकार करके हमें आगे बढ़ना है यही तो दीपावली का त्यौहार सिखाता है। हर एक दीपावली एक सी नहीं हो सकती हर एक दीपावली को कुछ ना कुछ नई सीख मिल सकती है।
आशा करता हूं आपको मेरी दीपावली अच्छी लगी होगी।
जगनमाता सब पर कृपा करें।
||धन्यवाद||

 

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Abhishek Sharma

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