मेरी हिन्दी

 लिखने को, एक अदब, एक अदा चाहिए।

निखरती है मेरी हिन्दी, अदा कुछ जुदा चाहिए।।

 

समा लेती है, सारी भाषा, सारे सुरों को खुद मे।

ये मेरी हिन्दी है, इसे न अक्षरों की खामोशी बेवजह चाहिए।

 

स्वरों का आँचल जब, भाषा के आँगन मे बिछाती है।

सारी भाषायें इसकी मीठी छाया में जगह पाती हैं।।

 

समेट लेती है, सारे शब्दों, सारे कायदों को खुद मे।

जब महादेवी मेरी हिन्दी से कविता बनाती है।।

 

कहानी किस्सों मे वो अपनापन वो मर्म तभी आता है।

जब मेरी हिन्दी से प्रेमचंद पूस की रात बनाती है।।

 

कला है ये भाषा से कहीं आगे जाती है।

भारतीय अंग्रेजों का भी आधा काम मेरी हिन्दी चलाती है।।

रचयिता : करमवीर