मैं कौन हूं ?

जब भी यह प्रश्न मेरे मन में आता है , मेरा मन अधिक गहराई में इसके बारे में चिंतन करना शुरू कर देता है । सचमुच मैं कौन हूं ? मेरी असली पेहचान क्या है ? मैं कहां से आयी हूं ? मुझे कहां जाना है ? इस जनम में जो labels मैंने अपने उपर लगाए है , क्या वहि मेरी पेहचान है ? जो सुख मुझे सुख लग रहा है क्या वहि असली सुख है ? फिर क्यों मैं ईश्वर के चिंतन में ध्यान लगाती हूं ? क्या पाने के लिए मेरा मन हर वक्त प्रयास करता है ? कैसे प्राप्ती होगी उस शाश्वत सुख की ? यह प्रश्न कई बार मेरे मस्तिष्क में तांडव मचाते हैं और मैं इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्न करती रहती हूं ।

कुरूक्षेत्र में जब अर्जुन अपना गांडिव नीचे रखकर हाथ जोडकर श्रीकृष्ण के सामने विषिण्ण अवस्था में खडे थे , तब श्रीकृष्ण ने उनको तुम यह शरीर नहीं , तुम आत्मा हो ये समझाने के लिए पूरी भगवद्गीता की रचना कि । श्रीकृष्ण कहते है , हे पार्थ तुम क्यों शोक कर रहे हो ? तुम जिनको मारोगे वे तो पहले से हि मर गए हैं । ये तो आत्मा है जो शाश्वत है ।

मुझे भगवद्गीता का श्लोक याद आ रहा है ,

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 23)

अर्थ : आत्मा को न शस्त्र  काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।)

यहां श्रीकृष्ण ने जिस आत्मा की बात कि है वो मैं हि हूं ।
मैं आत्मा हूं यहि मेरी असली पेहचान है । इस आत्मा का जब परमात्मा से मिलन होगा तभी इसे शाश्वत सुख कि प्राप्ती होगी । युगो युगों से मैं आत्मा अनेक रूप लेकर जन्म ले रहा हूं । अपने कर्मों का हिसाब चुकता कर रहा हूं । कभी मैं स्त्री रूप में आता हूं तो कभी पुरूष रूप में । हर जन्म में मैं कर्मों के बंधन में बंध रहा हूं । अपनी वासनाओं कि पूर्तताओं के लिए मैं हर प्रकार का कष्ट उठा रहा हूं । मोह के जाल में मैं पूरी तरह से कैद हो चूका हूं । मुझे अपना हित किसमें है वो समझ नहिं आता । स्वयं के सत्य से मैं अपरीचित हूं ।

मैं आत्मा , इन सबसे परे होना चाहता हूं । मैं आत्मा ,  परमात्मा से मिलना चाहता हूं । मैं आत्मा , अपना असली अस्तित्व जानना चाहता हूं । मैं आत्मा , जन्म म्रुत्यु के चक्र से मुक्त होना चाहता हूं ।

मैं आत्मा , प्रेमस्वरूप हूं ।

मैं आत्मा , शांतस्वरूप हूं ।

मैं आत्मा , आनंदस्वरूप हूं ।

यहि मेरी असली पेहचान है ।

🌷 ॐ शांति 🌷

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Amruta

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